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कभी गंगा में कूदकर देना चाहते थे जान, आज हैं सुरों के सरताज, कैलाश खेर के संघर्ष की अनसुनी दास्तां
जब भी भारतीय संगीत में सूफियाना और रूहानी आवाज़ का जिक्र होता है, तो एक नाम सबसे ऊपर उभरकर आता है— कैलाश खेर। अपनी बुलंद और अनूठी आवाज़ से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले कैलाश खेर 7 जुलाई को अपना जन्मदिन मनाते हैं। आज वे सफलता के जिस शिखर पर हैं, वहां तक पहुंचने का उनका रास्ता फूलों से नहीं, बल्कि कांटों से भरा था।
आज कैलाश खेर के जन्मदिन के इस विशेष मौके पर आइए जानते हैं कि कैसे एक 13 साल का लड़का घर से भागकर, बदहाली और डिप्रेशन के सबसे काले दौर को पार करते हुए 'पद्मश्री' विजेता और संगीत जगत का 'बाहुबली' बन गया।
महज 13 साल की उम्र में बगावत और घर छोड़ना
कैलाश खेर का जन्म 7 जुलाई 1973 को दिल्ली के एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। संगीत उन्हें विरासत में मिला था क्योंकि उनके पिता मेहर सिंह खेर एक पारंपरिक लोक गायक थे। बचपन से ही कैलाश के भीतर संगीत कूट-कूट कर भरा था और उन्होंने मात्र 4 साल की उम्र से गुनगुनाना शुरू कर दिया था।
लेकिन, परिवार नहीं चाहता था कि वे संगीत को अपना करियर बनाएं। संगीत के प्रति अपनी इसी दीवानगी के लिए उन्होंने 13 साल की मासूम उम्र में एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया— उन्होंने अपना घर छोड़ दिया। घर छोड़ने के बाद का सफर बेहद कड़ा था। दिल्ली में शास्त्रीय और लोक संगीत सीखने के दौरान अपना पेट भरने और म्यूजिक क्लास की फीस चुकाने के लिए वे छोटे बच्चों और विदेशी पर्यटकों को संगीत की ट्यूशन देने लगे। इससे उन्हें महीने के बमुश्किल 150 रुपये मिलते थे, जिससे वे अपना गुजारा करते थे।
जब टूट गया व्यापार और मन में आया सुसाइड का ख्याल
संगीत की डगर पर संघर्ष करते-करते थक चुके कैलाश ने साल 1999 में अपने एक पारिवारिक मित्र के साथ मिलकर एक्सपोर्ट का बिजनेस शुरू किया। किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, यह बिजनेस पूरी तरह डूब गया। कैलाश ने अपनी जिंदगी की सारी जमा-पूंजी इस व्यापार में गंवा दी।
इस भारी वित्तीय नुकसान ने उन्हें गहरे डिप्रेशन में धकेल दिया। जिंदगी के उस अकेलेपन और हताशा के दौर में उन्हें लगने लगा कि उनका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है। निराशा के इसी चरम पर उन्होंने ऋषिकेश में गंगा नदी में कूदकर आत्महत्या करने का प्रयास किया।
एक अंजान शख्स का 'थप्पड़' और बदल गई जिंदगी
कैलाश खेर ने अपने इंटरव्यूज में इस खौफनाक घटना का जिक्र करते हुए बताया था कि जब उन्होंने गंगा नदी में छलांग लगाई, तो घाट पर मौजूद एक अंजान शख्स तुरंत पानी में कूदा और उन्हें बाहर खींच लाया। बाहर निकालने के बाद उस शख्स ने कैलाश से पूछा, "जब तैरना नहीं आता तो नदी में क्यों कूदे?" जब कैलाश ने रोते हुए अपनी आपबीती और मरने की इच्छा बताई, तो उस शख्स ने उनके सिर पर ज़ोर का एक थप्पड़ मारा और उन्हें डांटा।
उस एक थप्पड़ ने जैसे कैलाश को नींद से जगा दिया। उन्होंने खुद को एक कमरे में बंद रखा, आत्ममंथन किया और यह समझ गए कि ईश्वर ने उन्हें किसी बड़े मकसद के लिए जिंदा रखा है। इसके बाद उन्होंने अध्यात्म और पहाड़ों में वक्त बिताया, लेकिन नियति उन्हें मुंबई खींच लाई।
'जंगल से जिंगल' और फिर रातों-रात बने स्टार
साल 2001 में खाली जेब लेकर कैलाश खेर मायानगरी मुंबई पहुंचे। मुंबई में शुरुआती दिनों में उनके पास रहने का ठिकाना नहीं था, उन्होंने रेलवे स्टेशनों तक पर रातें गुजारीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। पेट पालने के लिए उन्हें जो भी काम मिला, उन्होंने स्वीकार किया। इस दौरान उन्होंने कोका-कोला, पेप्सी, सिटीबैंक और होंडा जैसे बड़े ब्रांड्स के लिए करीब 1,000 से ज्यादा रेडियो और टीवी जिंगल्स गाए।
साल 2003 में फिल्म 'अंदाज' के गाने 'रब्बा इश्क ना होवे' से उन्हें पहला बॉलीवुड ब्रेक मिला। लेकिन उनकी किस्मत का सितारा चमका कम बजट की फिल्म 'वैसा भी होता है' के गाने 'अल्लाह के बंदे हंस दे' से। इस एक गाने ने देश में ऐसा तहलका मचाया कि कैलाश खेर रातों-रात स्टार बन गए। इसके बाद 'तेरी दीवानी', 'सइयां', 'अर्जियां' और बाहुबली-2 का 'जय जयकारा' जैसे गानों ने उन्हें अमर बना दिया।
