वी. शांताराम : स्वाभिमानी और संपूर्ण फिल्मकार

Last Updated: बुधवार, 18 नवंबर 2020 (11:42 IST)
1921 में ने 'रुक्मणी हरण' में कृष्ण की भूमिका अदा की थी और 1990 तक फिल्म जगत में वे सक्रिय रहे। इसी से पता चलता है कि सिनेमा के माध्यम पर उनकी कितनी गहरी पकड़ थी। उम्र हो गई पर क्रिएटिविटी कम नहीं हुई।

18 नवम्बर 1901 को जन्मे शांताराम ने फिल्म विधा के हर रंग का गहरा अध्ययन किया था और इसी प्रक्रिया में अभिनय का ज्ञान भी अर्जित किया। अभिनय उनकी प्राथमिकता की सूची में बहुत बाद के क्रम में आता था। 'डॉ कोटनीस की अमर कहानी' और 'में उनकी यादगार भूमिकाएं रहीं।
शांताराम एक स्वाभिमानी फिल्मकार थे और संपूर्ण फिल्मकार थे, इसलिए उन्हें सितारों पर निर्भर रहना पसंद नहीं था। शांताराम को कई फिल्मों में अभिनय करना पड़ा क्योंकि सितारों के नखरे उन्हें पसंद नहीं थे और फिल्में केवल उनके निर्देशक होने के कारण ही बिक जाती थीं।

निष्ठा और समर्पण शांताराम के हर कार्य में श्वास की तरह स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत थे। एक अभिनेता के रूप में भी उन्होंने निष्ठा, आत्मविश्वास और संपूर्ण समर्पण से महत्वपूर्ण भूमिकाओं को परदे पर जीवंत कर दिया तब तक निर्देशक शांताराम को अनुशासित अभिनेता मिलते गए, परंतु जैसे ही अनुशासनहीनता नजर आई उन्होंने स्वयं अभिनेता का कार्य किया।

1943 में वे कालिदास के महाकाव्य शकुंतला भर फिल्म बनाना चाहते थे। यह उनकी महत्वाकांक्षी फिल्म थी। उन्होंने स्वयं दुष्यंत की भूमिका निभाई और यह पहली भारतीय फिल्म है जो न्यूयॉर्क में प्रदर्शित हुई।

शांताराम की फिल्मों की समालोचना लिखते-लिखते, के.ए. अब्बास ने सत्य घटना के आधार पर पटकथा लिखी। 'डॉ. कोटनीस की अमर कहानी' में शांताराम ने डॉ. कोटनीस की भूमिका बहुत ही सशक्त ढंग से निभाई। पात्र की महानता को शांताराम ने पर्दे पर साकार किया। देश-विदेश के पत्रकारों ने फिल्म तथा अभिनय को बहुत सराहा।

एक अभिनेता के रूप में 'दो आंखें बारह हाथ' का जेलर का पात्र बहुत बड़ी चुनौती था और शांताराम ने इस भूमिका के साथ न्याय किया। निर्देशक शांताराम, अभिनेता शांताराम की बहुत सहायता करते थे। शांताराम स्वस्थ और मजबूत शरीर वाले व्यक्ति थे और अभिनय के लिए उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी किया।

'दो आंखें' के क्लाइमैक्स में एक बैल पर काबू पाने के दृश्य सहज और स्वाभाविक थे। उन दिनों फिल्म पत्रकारिता आज की तरह घिनौनी नहीं थी अन्यथा शांताराम को 'ही मैन', 'मॉचो' इत्यादि कहा जाता।

1961 में शकुंतला को उन्होंने 'स्त्री' के नाम से पुन: निर्मित किया और दुष्यंत की भूमिका भी निभाई परंतु उम्र के उस दौर में प्रेम प्रसंग के दृश्य अस्वाभाविक लगे, इसलिए स्त्री के बाद उन्होंने अभिनय नहीं किया।

1921 और 1927 के बीच अनेक भूमिकाएं शांताराम ने की परंतु अभिनय क्षेत्र में 'कोटनीस' और 'दो आंखें बारह हाथ' अमर रचनाएं मानी जाएंगी क्योंकि उनमें अभिनेता रम गया और निर्देशक के विश्वास पर खरा उतरा।

यह अजीब बात है कि शांताराम ने प्रदीपकुमार, महिपाल और गोपीकृष्ण जैसे लोगों के साथ भी सर्वकालीन हिट फिल्में बनाईं। दरअसल शांताराम इतने कुशल निर्देशक थे कि पत्थरों से अभिनय करा सकते थे। 'कोटनीस' और 'दो आंखें' के विषय अत्यंत मानवतावादी थे और उनमें अभिनय की निपुणता से ज्यादा निष्ठा की आवश्यकता थी। नए विचारों में आपका विश्वास धर्म की तरह ठोस नहीं हो, तो अभिनय की तकनीक कोई मदद नहीं कर सकती।

शांताराम पात्र के विचार और चलने-फिरने का ‍एक निश्चित खाका तैयार करते थे और उसी के अनुसार अभिनय करते थे। माथे पर एक थिकन भी नहीं आ सकती थी, अगर वह पहले से तय नहीं है। शांताराम ने अभिनय में शरीर संचालन को महत्व नहीं देते हुए केवल चेहरे के भाव और आवाज पर जोर दिया। 'दो आंखें' में तो उन्होंने संवाद भी बहुत कम बोले हैं। दृष्टि का प्रभावोत्पादक प्रयोग किया है।

संयत अभिनय करने वाले शांताराम के निर्देशन में काम करने वाले दूसरे अभिनेता अपनी नाटकीयता नहीं छोड़ पाए थे। यह अजीब संयोग है कि शांताराम ने अपनी क्लासिक फिल्मों- आदमी, पड़ोसी, दुनिया न माने में अभिनय नहीं किया था। वे अभिनय के मामले में एक स्कूल बने रहे। यही वजह है कि उनसे प्रेरणा तो कई अभिनेताओं ने ली मगर उनकी नकल कोई नहीं कर पाया। दरअसल शांताराम का निर्देशक उनके अभिनेता को लील गया।
- जेपीसी
('नायक महानायक' से साभार)



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