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संकट में ईरान, एक डॉलर के बदले देने पड़ रहे हैं 90 हजार रियाल

Updated: शनिवार, 30 जून 2018 (18:47 IST)
भारतीय मुद्रा रुपए की हालत ऐसी कभी नहीं हुई जैसी अभी है। एक डॉलर के बदले 69 रुपए देने पड़ रहे हैं। जिन देशों की मुद्रा रुपया है सबकी हालत पतली है। पाकिस्तान, श्रीलंका, इंडोनेशिया और नेपाल के रुपए की सेहत भी ठीक नहीं है। हालांकि अमेरिकी डॉलर की तंदुरुस्ती की चपेट में केवल रुपया ही नहीं है, ईरान की मुद्रा रियाल तो बुरी तरह से पस्त हो गई है।


ईरान बहुत मुश्किल हालात में है। राजधानी तेहरान में लोग अपनी दुकानें बंद कर सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं। ईरान की मुद्रा रियाल अमेरिकी डॉलर के सामने आख़िरी सांस ले रहा है। ईरान के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कोई निर्णायक क़दम नहीं उठाया तो मामला हाथ से निकल जाएगा।

एक डॉलर मतलब 90 हज़ार ईरानी रियाल : ईरान के अनाधिकारिक बाज़ार में लोग 90 हज़ार रियाल देकर एक अमेरिकी डॉलर ख़रीद रहे हैं। इसी समय पिछले साल की तुलना में यह 110 फ़ीसदी की वृद्धि है। अगर आधिकारिक रूप से देखें तो एक डॉलर के बदले लगभग 43 हज़ार रियाल देने पड़ रहे हैं। आठ मई को जब अमेरिका ने ईरान से परमाणु समझौते को ख़त्म करने का ऐलान किया तब से ईरानी मुद्रा रियाल की क़ीमत में 40 प्रतिशत की गिरावट आई है।

ईरान पर फिर से अमेरिकी प्रतिबंधों का ख़तरा है। इस ख़तरे के डर से ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था और बाज़ार में भगदड़ जैसी स्थिति है। ईरान के निर्यात और आयात बुरी तरह से प्रभावित होने वाले हैं। अल-जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार इस हफ़्ते तेहरान के सेंट्रल मार्केट में दुकानदारों ने कई प्रदर्शन किए।

इस बीच ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि संकट की घड़ी में ईरानी शांति और एकता के साथ रहें। ईरान के सर्वोच्च नेता अयतोल्लाह अली ख़मेनई ने भी कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट का सामना कर रही है।

उन्होंने सरकार से कहा है कि जो ईरान की अर्थव्यस्था को अस्थिर करने में लगे हैं, सरकार उनका सख़्ती से सामना करे। अटलांटिक काउंसिल की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने मार्केट के ख़िलाफ़ जाकर एक डॉलर के मुक़ाबले 42 हज़ार रियाल की एकीकृत एक्सचेंज दर तय करने की कोशिश की। इसके साथ ही 100 अहम मनी एक्सचेंजर्स को गिरफ़्तार किया गया।

कहा जा रहा था कि ये मनी एक्सचेंजर्स अलग-अलग रेट पर रियाल के बदले डॉलर दे रहे थे, हालांकि सरकार की ये कोशिशें भी काम नहीं आईं। अटलांटिक काउंसिल की रिपोर्ट के अनुसार, मनी चेंजर्स ने आधिकारिक रेट पर डॉलर बेचना बंद कर दिया है। जब मनी चेंजर्स को एक डॉलर के लिए 42 हज़ार रियाल लेने पर मज़बूर किया गया तो इन्होंने कहना शुरू कर दिया कि डॉलर ख़त्म हो गया है। दूसरी तरफ़ सरकार आधिकारिक रूप से बाज़ार की मांग की तुलना में काफ़ी कम डॉलर की आपूर्ति कर रही है।

कम ब्याज दर : सेंट्रल बैंक ऑफ़ ईरान की तरफ़ से 15 फ़ीसदी से कम ब्याज दर रखने के कारण भी नीतिगत स्तर पर नाकामी मिली है। हाल के सालों में ईरानी बैंकों ने 25 फ़ीसदी ब्याज दर की पेशकश की थी ताकि जो अपनी मुद्रा डॉलर में रखना चाहते थे उनका सामना किया जा सके। कहा जा रहा है कि कम ब्याज दरों के कारण लोगों ने व्यापार के लिए डॉलर को ही चुना। हालांकि मसला केवल यही नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक जो सबसे बड़ी वजह है वो ये है कि सेंट्रल बैंक के पास विदेशी मुद्रा की भारी कमी है और ईरानी पर्यटकों में डॉलर की मांग में कोई कमी नहीं आ रही है। अटलांटिक काउंसिल की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान तेल और गैस के निर्यात से सालाना क़रीब 50 अरब डॉलर का राजस्व हासिल कर रहा है। इसमें से सात अरब डॉलर तेल की राष्ट्रीय कंपनियों के पास चला जाता है ताकि वो गैस और तेल की खोज जारी रख सकें।

इसके साथ ही इस राशि का इस्तेमाल ये उपकरणों और नवीनीकरण के मद में भी करते हैं। इसके साथ ही क़रीब 9 अरब डॉलर ईरानी पर्यटकों को मुहैया कराया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक़, तस्करी में 12 से 20 अरब डॉलर की राशि चली जाती है। मतलब हर साल तेल और गैस के निर्यात से आने वाले 50 हज़ार डॉलर में से 28 से 36 हज़ार डॉलर देश से बाहर चले जाते हैं।

अमेरिकी गुस्से का कोई जवाब नहीं : इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ने आठ मई को परमाणु समझौते को रद्द किया तो इसका बड़ा मनोवैज्ञानिक असर देशी और विदेशी निवेशकों पर पड़ा। लोगों ने अपनी पूंजी ईरान से वापस लेकर दुबई और इस्तांबुल में लगाना शुरू कर दिया।

निवेशकों के मन में ईरान की अर्थव्यवस्था में अस्थिरता का डर बुरी तरह से घर कर गया है। ईरान के पहले उपराष्ट्रपति ईशाक़ जहांगीरी को सुधारवादी माना नेता माना जाता है। उन्होंने कहा है कि ईरान को सीधे अमेरिका से बात करनी चाहिए। ईशाक़ ने कहा है कि ईरान गंभीर 'इकनॉमिक वॉर' में जा रहा है और इसका नतीज़ा बहुत बुरा होगा।

उन्होंने कहा है कि ईरान को इस संकट से चीन और रूस भी नहीं निकाल सकता है। उनका कहना है कि अमेरिका ही इस संकट से ईरान को निकाल सकता है। अरमान अख़बार ने लिखा है कि ईरान आने वाले दिनों में और मुश्किल में होगा।

इस अख़बार ने संयुक्त राष्ट्र में ईरान के पूर्व राजदूत अली ख़ुर्रम के बयान को छापा है जिसमें उन्होंने कहा है, जिस तरह अमेरिका ने इराक़ में सद्दाम हुसैन की सरकार को उखाड़ फेंका था उसी तरह से ईरान के लिए भी अमेरिका ने योजना बनाई है। अमेरिका ने इराक़ में यह काम तीन स्तरों पर किया था और ईरान में भी वैसा ही करने वाला है। पहले प्रतिबंध लगाएगा, फिर तेल और गैस के आयात को पूरी तरह से बाधित करेगा और आख़िर में सैन्य कार्रवाई करेगा।

आख़िर विकल्प क्या है? : ईरान के भीतर ही आवाज़ उठ रही है कि हसन रूहानी कुछ ठोस क़दम उठाएं। ईरान के जानेमाने अर्थशास्त्री सईद लायलाज़ ने अल-जज़ीरा से कहा है, सरकार विदेश जाने वाले ईरानियों को डॉलर ख़रीदने के लिए सब्सिडी देती है। इस सब्सिडी को तत्काल ख़त्म किया जाना चाहिए। सरकार की नीति के अनुसार, विदेश जाने वाले हर ईरानी बाज़ार की दर से आधी क़ीमत पर 1000 डॉलर ख़रीद सकता है।

सईद ने कहा, हर साल एक करोड़ से एक करोड़ 20 लाख के बीच ईरानी विदेश जाते हैं और ये 15 अरब डॉलर से 20 अरब डॉलर तक खर्च कर आते हैं। इस सब्सिडी के कारण डॉलर की मांग कभी कम नहीं होती। मैं ये नहीं कह रहा कि सरकार ईरानियों के विदेशी दौरे को सीमित कर दे पर सरकार सब्सि़डी देना तो बंद कर ही सकती है। हमें नहीं पता कि सरकार इस पर कोई फ़ैसला क्यों नहीं ले रही है?

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