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ज्योतिरादित्य सिंधिया : मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की होड़ में क्यों और कैसे पिछड़े?

Updated: शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018 (18:01 IST)
- प्रदीप कुमार
 
इतिहास खुद को दोहराता है। एक मायने में मध्य प्रदेश की राजनीति में भी 25 साल पुराना इतिहास रिपीट हो गया है। 1993 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर दिग्विजय सिंह और माधव राव सिंधिया में ही होड़ लगी थी, जिसमें बाजी दिग्विजिय सिंह के नाम रही थी।
 
 
इससे पहले भी 1985-90 में राजीव गांधी भी अपने दोस्त माधव राव को मुख्यमंत्री के लिए अर्जुन सिंह और मोती लाल वोरा पर तरजीह नहीं दे पाए थे। इस बार राहुल गांधी अपने दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया (दोस्ती की केमेस्ट्री समझनी हो तो संसद के अंदर नरेंद्र मोदी को लेकर राहुल के आंख मारने वाले वीडियो को देख लीजिए) को मध्य प्रदेश की कमान नहीं थमा पाए।
 
 
गुरुवार की सुबह साढ़े दस बजे के करीब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मीडिया के लोगों से कहा कि वे अलग-अलग जगहों से इनपुट ले रहे हैं, विधायकों से बात कर रहे हैं और लोगों से बात कर रहे हैं और जल्द ही मुख्यमंत्री के नामों का एलान हो जाएगा।
 
 
पहले बताया गया कि तीनों राज्य के मुख्यमंत्री के नाम शाम चार बजे एनाउंस हो जाएंगे लेकिन धीरे-धीरे इसमें घंटों की देरी देखने को मिली। मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताया जा रहा था। ज्योतिरादित्य सिंधिया का दावा कई वजहों से मज़बूत माना जा रहा था, उनकी एक बड़ी वजह तो उनका सिंधिया राजघराने से ताल्लुक ही है, जो भारतीय राजनीति में एक स्थापित घराना रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी बतौर राजनेता स्थापित हो चुके हैं।
 
 
सिंधिया को करना होगा इंतज़ार
बीते 16 साल में वे पांच बार लोकसभा के सांसद चुने जा चुके हैं और मनमोहन सिंह सरकार में सात साल तक सूचना एवं प्रौद्योगिकी, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के जूनियर मिनिस्टर रह चुके हैं, इसके बाद 2012 से 2014 तक वे बिजली मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री भी रहे।
 
 
ऐेसे में 47 साल के ज्योतिरादित्य सिंधिया को सामने रखकर पार्टी राज्य में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ा सकती थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभी इंतज़ार करना होगा, इसका संकेत राहुल गांधी ने बहुत पहले ही दे दिया था।
 
 
मध्य प्रदेश के मंदसौर में जून, 2018 में अपनी चुनावी रैली में उन्होंने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की मौजूदगी में कहा था- हम लोगों के पास कमलनाथ जी मौजूद हैं, उनका अनुभव हमारे काम आएगा। अच्छी बात ये भी है कि युवा ज्योतिरादित्य भी हैं जो भविष्य हैं। हमारे पास वर्तमान और भविष्य दोनों हैं।
 
 
ठीक यही बात राहुल गांधी गुरुवार की देर शाम, लियो टॉलस्टॉय के कथन और कमलनाथ-ज्योतिरादित्य सिंधिया की तस्वीर के साथ कही। तो जो नतीजा गुरुवार की देर रात सामने आया, उसकी पृष्ठभूमि आप आठ महीने पहले राहुल गांधी के इन संकेतों में समझ सकते हैं।
 
 
किन वजहों से नहीं चुने गए ज्योतिरादित्य
1956 और 2018 तक राज्य की राजनीति पर दो खंडों में राजनीतिनामा लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार दीपक तिवारी कहते हैं, "ये बात तो सही है कि कमलनाथ ज़्यादा अनुभवी हैं लेकिन भविष्य ज्योतिरादित्य सिंधिया का ही है। उनके साथ सबसे अच्छी बात ये है कि उनके पास समय काफ़ी है। उन्हें आगे मौका मिलना तय है।"
 
 
लेकिन इस बार उन्हें मौका नहीं मिलने की सबसे बड़ी वजह ये मानी जा रही है कि पूरे प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की स्वीकार्यता उस तरह से नहीं है, जैसी कि कमलनाथ या फिर दिग्विजय सिंह की रही है। इसके पीछे दीपक तिवारी कहते हैं, "दरअसल असर तो तब होगा जब पार्टी उनको प्रदेश में काम करने की इजाजत दे। सीमित मौके मिलने के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव राज्य में लगातार बढ़ रहा है।"
 
 
राज्य की कांग्रेस राजनीति में उनका दबदबा किस तरह से बढ़ रहा है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि वे पूरे राज्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सबसे ज्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित किया। उन्होंने राज्य में करीब 110 चुनावी सभाओं को संबोधित किया, इसके अलावा 12 रोड शो भी किए। उनके मुक़ाबले में दूसरे नंबर पर रहे कमलनाथ ने राज्य में 68 चुनावी सभाओं को संबोधित किया था।
 
 
मुख्यमंत्री बनाने के लिए यज्ञ
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों से ज्योतिरादित्य सिंधिया को बुलाने की मांग थी और आम मतदाताओं में उनका असर भी देखने को मिला। खासकर कांग्रेस का युवा कार्यकर्ता ज्योतिरादित्य में अपना भविष्य देख रहा है, यही वजह है कि उनके समर्थकों ने गुरुवार को भोपाल के हनुमान मंदिर में यज्ञ शुरू कर दिया था, ताकि वे मुख्यमंत्री बन सकें।
 
 
लेकिन इन सबके बाद भी ज्योतिरादित्य का असर मध्य प्रदेश के ग्वालियर और चंबल रीजन तक ही सीमित माना जाता है। इन इलाकों में कांग्रेस का प्रदर्शन शानदार रहा, ग्वालियर चंबल की 34 सीटों में कांग्रेस 26 सीटें जीतने में कामयाब रही। लेकिन इसके उलट एक बात ज्योतिरादित्य के विपरीत भी गई है, उन्होंने जिन लोगों के लिए पार्टी से टिकट मांगे उनमें से आधे से ज़्यादा उम्मीदवार अपना चुनाव हार गए।
 
 
इसके अलावा राज्य के कई हिस्सों के आम लोग उनकी राजसी अंदाज़ को देखकर भी दूरियां बरतते हैं, इसके लिए उनका अपना अक्खड़पन भी कम ज़िम्मेदार नहीं है। लेकिन ये सब ऐसी ग़लतियां हैं, जो आदमी अपने अनुभवों से सीखता है। दीपक तिवारी कहते हैं, "समय के साथ ज्योतिरादित्य परिपक्व होते जाएंगे, इसकी झलक वे कई बार पहले भी दे चुके हैं।"
 
 
सिंधिया कितनी छोड़ पाए राजसी ठाठ-बाट
हालांकि इसी चुनावी प्रचार के दौरान उन्होंने दिखाया कि वे अपनी राजसी ठाठ-बाट वाली जीवनशैली को छोड़ने के लिए तैयार हैं। चुनावी सभाओं के लिए अपनी तमाम यात्राएं उन्होंने सड़क मार्ग से की है, हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया।
 
 
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी बताते हैं, "उनका मानना है कि सड़क से यात्रा करने पर लोगों से कनेक्ट बढ़ता और इलाक़े की ज़मीनी हक़ीक़त का भी पता चल जाता है।" उनके साथ चुनावी सभाओं में रहने वाले कार्यकर्ताओं की माने तो एक-एक दिन में 16 से 18 घंटे तक लगातार गाड़ी में सफ़र करने के बाद भी लोगों से मिलते-जुलते वक्त उनका उत्साह देखने लायक होता था।
 
 
पंकज चतुर्वेदी ये भी बताते हैं, "आम लोगों में उनकी छवि ज़ोरदार है और भाषण देने की कला का जादू नजर आता है। साथ ही पार्टी जो भी उन्हें ज़िम्मेदारी देती रही है, उसे वे पूरी ज़िम्मेदारी के साथ निभाते आए हैं। सार्वजनिक तौर पर वे कई बार पहले ही कह चुके हैं कि संगठन जो भी कहेगा वे उसका पालन करेंगे।"
 
 
वैसे ये भी संभव है कि कांग्रेस आलाकमान 2019 के आम चुनावों के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य की कमान देने का मन बनाए। वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार मनोरंजन भारती कहते हैं, "राहुल गांधी को 2019 की चुनावी रणनीति बनाने के लिए अपने आस-पास भी भरोसेमंद लोग चाहिए, ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका तो कांग्रेस में अहम बनी ही रहेगी, भले वे अभी मुख्यमंत्री नहीं बन पाए हों।"
 
 
राहुल के पीएम बनने तक...
वैसे कुछ राजनीतिक विश्लेषक ये भी मानते हैं कि जब तक राहुल गांधी खुद प्रधानमंत्री नहीं बन जाते तब तक ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या फिर सचिन पायलट, इन्हें आज़ादी से छत्रप बनने का मौका नहीं मिल सकता। वैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कमलनाथ को तरजीह देने की एक बड़ी वजह ये भी मानी जा रही है कि पार्टी के लिए जिस तरह के संसाधनों को कमलनाथ जुटा सकते हैं, उस तरह ज्योतिरादित्य नहीं जुटा सकते।
 
 
हालाँकि कारोबारी दुनिया से लेकर क्रिकेट और सेलिब्रिटी दुनिया तक के दिग्गजों के बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया का उठना-बैठना रहा है। वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता कहते हैं, "संसाधनों की व्यवस्था कोई आसान बात नहीं है, बड़े-बड़े लोगों को मुश्किल हो जाती है। कई बार कमलनाथ भी फंस जाते हैं।"
 
 
वैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति में सबसे बड़ी खामी उनकी अहंकारी छवि को माना जाता है, जिसके चलते अमूमन वे कार्यकर्ताओं और आम लोगों से सहज रिश्ता नहीं बना पाते हैं। पिछले कुछ सालों में ज्योतिरादित्य ने इसे दूर करने की कोशिश ज़रूर की है लेकिन इस दिशा में उन्हें बहुत काम करने की ज़रूरत होगी। हालांकि कुछ लोग कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद एक बार फिर दिग्विजय सिंह और सिंधिया घराने को आमने-सामने देख रहे हैं।
 
 
होड़ की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं
कुछ विश्लेषक ये मान रहे हैं कि आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए जूनियर सिंधिया को जूनियर दिग्विजय सिंह (यानी जयवर्धन सिंह) की चुनौती का सामना करना होगा।
 
 
दीपक तिवारी कहते हैं, "ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी क्योंकि जयवर्धन अभी महज दूसरी बार विधायक बने हैं जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया पांच बार सांसद बन चुके हैं, विभिन्न मामलों के मंत्री रह चुके हैं। अनुभव को कैसे टक्कर दे पाएंगे जयवर्धन।"
 
 
वैसे मध्य प्रदेश की राजनीति में राघोगढ़ और सिंधिया घराने के बीच आपसी होड़ की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। इस होड़ की कहानी 202 साल पुरानी है। जब 1816 में, सिंधिया घराने के दौलतराव सिंधिया ने राघोगढ़ के राजा जयसिंह को युद्ध में हरा दिया था, राघोगढ़ को तब ग्वालियर राज के अधीन होना पड़ा था।
 
 
इसका हिसाब दिग्विजय सिंह ने 1993 में माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की होड़ में परास्त करके बराबर कर दिया था। लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया जिस मिजाज के हैं, उसमें उन्हें अतीत की बातें बहुत परेशान नहीं करती होंगी, यही वजह है कि इसी अगस्त में गुना में उन्होंने एक मैराथन का आयोजन किया तो उनके साथ जयवर्धन सिंह भी कदम से कदम मिलाकर दौड़ते नजर आए। उन्हें मालूम है कि राजनीतिक परिपक्वता ही उन्हें उन मुकामों तक पहुंचाएगी जहां तक उनके बेहद लोकप्रिय रहे पिता नहीं पहुंच पाए थे।
 
 
वैसे सालों पहले दिए एक इंटरव्यू में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया था कि सिंधिया नाम से उन्हें कभी कोई मदद नहीं मिली और उनके पिता माधवराव ने उन्हें इस नाम के बिना भी बेहतर जिंदगी जीने का मंत्र बचपन से ही दिया था। 2018 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन पाने को भी आप यहीं से देख सकते हैं कि उन्हें सिंधिया होने का फ़ायदा नहीं मिला। लेकिन ख़ास बात ये है कि सिंधिया अपनी राजनीतक समझ और कद दोनों का दायरा बड़ा करते जा रहे हैं।
 
 
इसकी झलक उन्होंने गुरुवार की देर रात एक बार फिर दी जब भोपाल एयरपोर्ट से सिंधिया मध्य प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पहुंचे थे, उन्होंने वहां अपने समर्थकों के सामने गाड़ी पर खड़े होकर अभिवादन स्वीकार करते रहे, उनका अंदाज़ कुछ वैसा था मानो वो कह रहे हों कि कमलनाथ उनके चलते ही मुख्यमंत्री बने हैं।
 
 
मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ ने भी जिस तरह से ज्योतिरादित्य सिंधिया को समर्थन देने के लिए शुक्रिया कहा है, उससे भी ज्योतिरादित्य की छवि को फ़ायदा पहुंचा है। कभी इनवेस्टमेंट बैंकर के तौर पर काम करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को मालूम है कि वे आज जो निवेश कर रहे हैं, उसका आने वाले दिनों में 'रिटर्न' भी बेहतर होगा।
 

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