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भाजपा का 2019 में एजेंडा क्या होगा, हिंदुत्व या विकास

Updated: शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018 (14:20 IST)
- प्रियंका पाठक 
तीन हिंदी भाषी राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के हाथों भाजपा की हार सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चिंता का विषय है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि कहीं हिंदुत्व के एजेंडे की वजह से तो ये उलटफेर नहीं हुए।
 
 
अन्य दो राज्यों तेलंगाना और मिज़ोरम में तो क्षेत्रीय पार्टियों ने अपना परचम लहराया, इससे अब लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने गंभीर चुनौती है। 2014 में केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद से भाजपा 13 राज्यों की सत्ता में आ चुकी है लेकिन ऐसा लग रहा है कि लगातार चुनाव जीतने की उसकी छवि अब अपना प्रभाव खोती जा रही है।
 
 
पार्टी के भीतर और बाहर आत्मचिंतन की काफ़ी ज़रूरत है। क्या भाजपा का कट्टरपंथी हिंदुत्व एजेंडा उल्टा तो नहीं पड़ गया?
 
 
क्या समावेशी, विकास एजेंडे से हटना और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति को अपनाना भाजपा के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में महंगा तो नहीं पड़ेगा?
 
 
ये बड़े सवाल हैं क्योंकि हिंदुत्व के पोस्टर बॉय और भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण का बड़ा चेहरा माने जाने वाले उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री भगवाधारी योगी आदित्यनाथ को इन चुनावों में पार्टी ने सबसे बड़े स्टार प्रचारक के रूप में इस्तेमाल किया था।
 
 
हिंदुत्व बनाम विकास
योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा चुनाव के दौरान राज्यों में 74 रैलियों को संबोधित किया, 26 राजस्थान में, छत्तीसगढ़ में 23, मध्यप्रदेश में 17 और तेलंगाना में आठ। इसके उलट, विधानसभा चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 31 और 56 रैलियों को संबोधित किया।
 
 
पिछले कुछ महीनों के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) को भी आकर्षित करने की कोशिश की है। ये संगठन 1980 के उत्तरार्ध से ही अयोध्या के विवादित रामजन्म भूमि पर स्वामित्व का दावा करते हैं, उनका मानना है कि इसी जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था और वहां एक मंदिर था।
 
 
उन्होंने अयोध्या के सरयू तट पर तीन लाख दीयों को प्रज्ज्वलित करके, 2019 में अर्धकुंभ से पहले इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया और अपने राज्य में राम की विशाल प्रतिमा बनवाने की घोषणा कर 'केवल 24 घंटे में' रामजन्म भूमि विवाद का हल करने का वचन दिया है।
 
 
अगर योगी आदित्यनाथ का एजेंडा वीएचपी नेतृत्व को यह साबित करना था कि वो नरेंद्र मोदी का विकल्प हैं और हिंदुत्व के एजेंडा का कहीं गंभीरता से पालन करने की चाहत रखते हैं, तो हाल के चुनावी पराजय से उन्हें इसमें कामयाबी नहीं मिली। चुनावी पर्यवेक्षकों का मानना है कि पार्टी को ये हार अपने विकास के एजेंडे से हटने की वजह से मिली है। हिंदुत्व का एजेंडा पार्टी को भारी पड़ा है।
 
 
"पहले राम को आसन दो, फिर हमको सुशासन दो"
हालांकि, संघ परिवार में कुछ लोग इस बात से असहमत होते हुए ज़ोर देते हैं कि वास्तविकता इसके विपरीत है। जिस तरह सरकार की आर्थिक नीतियों से लोगों का मोह भंग हुआ है, उसी तरह मंदिर बनाने की प्रतिबद्धता पर भी इसने लोगों का विश्वास खो दिया है।
 
 
अगर वीएचपी और आरएसएस को सरकार को चेतावनी देने के लिए सड़क पर आना पड़ा तो इससे क्या संदेश जाएगा? इससे मतदाता क्या समझेंगे?
 
 
बीते हफ़्ते दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली के दौरान हज़ारों लोग राम मंदिर के शीघ्र निर्माण की मांग करने के लिए इकट्ठा हुए और अब तक ऐसा करने में नाकाम रहने के लिए सरकार की आलोचना की।
 
 
इस दौरान उन्होंने "पहले राम को आसन दो, फिर हमको सुशासन दो" के नारे के साथ मोदी सरकार के विकास एजेंडे पर सीधा हमला किया। जानकार भाजपा और संघ-वीएचपी के बीच इस मनमुटाव को 'पारिवारिक झगड़ा' बताते हैं।
 
वे 2001 के उस झगड़े की याद दिलाते हैं जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के बीच अपने चुनावी घोषणापत्र में वीएचपी की मांग के अनुसार राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया तो विश्व हिंदू परिषद ने मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने की घोषणा कर दी।
 
 
मूल एजेंडे पर लौटने की आवाज़
इस बार भाजपा के बहुमत वाली सरकार है, जिसकी चुनौती कमज़ोर अर्थव्यवस्था है। अब जबकि इन चुनावों में हिंदुत्व के एजेंडे की संभावित नाकामी दिख रही है तो मोदी सरकार के सामने हिंदुत्व और विकास में से किसी एक को रणनीति के रूप में अपनाने की चुनौती है।
 
 
संघ अपने अनुशासित कार्यकर्ताओं और पोलिंग बूथ पर मतदाताओं को जुटाने की काबिलियत के लिए मशहूर है, लिहाजा आम चुनाव में भाजपा की चुनावी सफलता के लिए ये बेहद महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, 2014 के चुनावों में हिंदी भाषी राज्यों में उनकी बदौलत ही भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिली थी। यह स्पष्ट है कि उनकी अनदेखी या उन्हें नाराज़ नहीं किया जा सकता है।
 
 
ऐसे में जबकि हिंदुत्व के एजेंडे ने काम नहीं किया तो उदारवादियों ने सरकार से अर्थव्यवस्था पर फिर से ध्यान देने की मांग की है, लेकिन भाजपा में भीतरखाने से राम मंदिर, समान नागरिक संहिता और गौरक्षा के मूल एजेंडे पर बहुत गंभीर होकर वापसी करने की आवाज़ उठ रही है, ताकि लोगों को लगे कि पार्टी ने इनका त्याग नहीं किया है और इसकी बदौलत अपना आधार मज़बूत किया जा सके।
 
 
यह मानते हुए कि अर्थव्यवस्था का सामना उलट बयार से हो रहा है, भाजपा-संघ-वीएचपी के भीतर लोग दावा करते दिख रहे हैं कि हिंदुत्व का एजेंडा ही ज़्यादा प्रासंगिक है और वो यह विश्वास भी जताते हैं कि लोकसभा चुनाव हिंदुत्व के मुद्दे पर ही लड़ा जाएगा।
 

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