उत्तर प्रदेश: सपा में आए बीजेपी के ‘बाग़ी’ नेताओं की वजह से अखिलेश की मुश्किलें बढ़ीं

BBC Hindi| पुनः संशोधित शनिवार, 15 जनवरी 2022 (08:04 IST)
अभिनव गोयल, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले बीजेपी से समाजवादी पार्टी में जाने वाले नेताओं का सिलसिला जारी है। तीन मंत्री और आठ विधायक के बाद क़यास ये लगाए जा रहे हैं कि ये संख्या और बढ़ सकती है।
 
समाजवादी पार्टी के लिए ये अच्छी ख़बर तो है लेकिन इससे के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है। सवाल ये है कि समाजवादी पार्टी इन नेताओं को सीटों के गणित में कहां फिट करेगी? बीजेपी से आने वाले नेताओं के लिए किन नेताओं के पत्ते काटे जाएंगे?
 
स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर क्या है मुश्किल?
अखिलेश यादव ने मंच पर स्वामी प्रसाद मौर्य का लाल पगड़ी पहनाकर स्वागत किया और सपा में शामिल होते ही स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी के अंत का एलान भी कर दिया।
 
उन्होंने कहा, "आज 14 जनवरी, मकर संक्रांति भारतीय जनता पार्टी के अंत का इतिहास लिखने जा रही है। आज भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेता जो कुंभकरण की नींद सो रहे थे, जिन्हें कभी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों से बात करने का वक़्त नहीं मिलता था, हम लोगों के इस्तीफ़े के बाद उनकी नींद हराम हो गई है।"
 
ओबीसी के कद्दावर नेता माने जाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य फ़िलहाल कुशीनगर ज़िले की पडरौना सीट से विधायक हैं। लेकिन मुश्किल उनके बेटे उत्कृष्ट को लेकर है।
 
2017 में उत्कृष्ट ने बीजेपी की टिकट पर ऊंचाहार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे। उत्कृष्ट को सपा के पुराने नेता मनोज पांडे ने करीब दो हज़ार वोटों से हराया था। इससे पहले 2012 विधानसभा चुनाव में भी मनोज पांडे उत्कृष्ट को हरा चुके हैं।
 
बीबीसी से बातचीत में मनोज पांडे ने बताया, "हम ऊंचाहार से चुनाव लड़ेंगे, ऐसा राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का निर्देश हमको प्राप्त हो चुका है। मैं यहां से विधायक हूं। मेहनत कर रहा हूं, काम कर रहा हूं।"
 
इस बारे में लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं, "जिन-जिन क्षेत्रों से बीजेपी के विधायक सपा में शामिल हुए हैं, वहां-वहां सपा नेताओं में खलबली मची हुई है। वे बार-बार लखनऊ जा रहे हैं। मनोज पांडे खुद भी लखनऊ गए थे और उन्होंने कहा कि मैं ऊंचाहार से ही चुनाव लड़ूंगा।"
 
ऊंचाहार सीट से मनोज पांडे को अगर सपा फिर से टिकट देती है, तो जाहिर है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के बेटे उत्कृष्ट के लिए सपा को नई जगह ढ़ूंढ़नी होगी, वो भी बिना किसी को नाराज़ किए हुए।
 
बृजेश शुक्ल के मुताबिक़, "स्वामी प्रसाद मौर्य अपने बेटे के लिए जौनपुर से सीट चाहते हैं। इस पर पार्टी मंथन कर रही है।"
 
जौनपुर में उत्कृष्ट को चुनाव में उतारने के लिए सपा को अब नए सिरे से माथापच्ची करनी होगी। लेकिन दिक़्क़त सिर्फ़ यही नहीं है। इस कड़ी में कई और नाम भी हैं।
 
धर्म सिंह सैनी को कहां मिलेगी सीट?
धर्म सिंह सैनी ने 2017 में सहारनपुर की नकुड़ विधानसभा से बीजेपी की सीट पर क़रीब 94 हजार मतों से बड़ी जीत दर्ज़ की थी। इससे पहले वो बहुजन समाज पार्टी के विधायक रह चुके हैं। लेकिन धर्म सिंह सैनी अब सपा के साथ हैं।
 
सहारनपुर ज़िले में इनकी छवि एक मज़बूत ओबीसी नेता की है। सपा अब धर्म सिंह सैनी को लेकर भी असमंजस में है। इसकी वजह है- सहारनपुर के बड़े नेता इमरान मसूद, जो पिछले दिनों कांग्रेस का दामन छोड़ पार्टी में शामिल हुए हैं।
 
2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में धर्म सिंह सैनी ने इमरान मसूद को हराया था। 2017 में ये अंतर क़रीब चार हज़ार वोट का था। सपा के सामने दिक़्क़त ये है कि इस बार नकुड़ विधानसभा सीट पर दोनों में से किसे उम्मीदवार बनाया जाए। दावा दोनों का ही मज़बूत है।
 
इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं, "सहारनपुर में इमरान मसूद के कार्यकर्ता धर्म सिंह सैनी को पसंद नहीं करते। इमरान मसूद को नकुड़ की जगह किसी दूसरी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ाया जा सकता है।"
 
दारा सिंह चौहान कहां करेंगे दावा?
दारा सिंह चौहान योगी कैबिनेट में मंत्री थे। उनके दलबदल करने का सिलसिला काफ़ी पुराना है। वे सपा से साल 2000 से 2006 तक राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं।
 
दारा सिंह 2009 में घोसी लोकसभा सीट से बीएसपी की टिकट पर चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में वे बीजेपी के हरिनारायण से हार गए।
 
2017 में मऊ की मधुबन विधानसभा सीट पर उन्होंने बीजेपी के टिकट पर कांग्रेस के अमरेश चंद को क़रीब 29 हज़ार वोटों से हराया। अब उन्होंने बीजेपी छोड़ दी है। ऐसी अटकलें हैं कि आने वाले दिनों में दारा सिंह भी सपा में शामिल हो सकते हैं।
 
लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र कुमार शुक्ल बताते हैं, "दारा सिंह चौहान इस बार मधुबन सीट से चुनाव नहीं लड़ना चाहते। ऐसा कहा जा रहा है कि वे अपनी सीट बदलना चाहते हैं।"
 
सपा की सीट तलाशते बीजेपी के बाग़ी विधायक!
बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हुए छह विधायकों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। ज्ञानेंद्र कुमार शुक्ल कहते हैं, "बीजेपी ने विधायकों का सर्वे करवाया था। सर्वे में जिसकी रिपोर्ट ठीक नहीं है और जिन्हें टिकट कटने का डर था, वे पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। ऐसी ख़बरें आई थीं कि 100 लोगों का टिकट काटा जा सकता है।"
 
जाहिर है अगर ऐसी स्थिति आती है तो सपा में बाग़ी नेताओं के आने की लिस्ट लंबी होती चली जाएगी। फ़िलहाल बीजेपी छोड़कर जो छह विधायक आए हैं, वे भी सपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं।
 
भगवती प्रसाद सागर ने 2017 में बीजेपी की टिकट पर बिल्हौर से चुनाव लड़ा था। उन्होंने बसपा के कमलेश चंद्र दिवाकर को क़रीब 31 हज़ार वोटों से हराया था। सपा के शिव कुमार बेरिया क़रीब 60 हज़ार मतों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे। शिव कुमार बेरिया सपा के पुराने नेता हैं और मुलायम सिंह यादव के भी क़रीबी रहे हैं।
 
वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं, "इस सीट पर भगवती प्रसाद सागर के लिए रास्ता तलाशना सपा के लिए चुनौती भरा है। भगवती प्रसाद बिल्हौर सीट से अपने बेटे के लिए टिकट चाहते हैं और ख़ुद मऊरानीपुर विधानसभा से चुनाव लड़ना चाहते हैं।"
 
ऐसे में अखिलेश यादव के लिए मुश्किल ये है कि वे किसे टिकट दें और किसे नहीं।
 
ज्ञानेंद्र कुमार शुक्ल बताते हैं, "शिव कुमार बेरिया बिल्हौर विधानसभा क्षेत्र में मज़बूत दावेदार हैं। यदि उनका टिकट कटता है तो सपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।"
 
मुकेश वर्मा को 2017 में फ़िरोज़ाबाद ज़िले की शिकोहाबाद विधानसभा सीट पर क़रीब 87 हज़ार वोट मिले थे। उन्होंने सपा के ही संजय कुमार को क़रीब 11 हज़ार वोटों के अंतर से हराया था। मुकेश वर्मा अब बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शिकोहाबाद सीट पर अपनी दावेदारी कर रहे हैं, जबकि इस सीट पर पहले से पार्टी के पास मज़बूत उम्मीदवार है।
 
बाला अवस्थी ने भी 2017 के चुनावों में धौरहरा विधानसभा सीट पर क़रीब 80 हज़ार वोटों से जीत दर्ज़ की थी। उन्होंने समाजवादी पार्टी के यशपाल सिंह चौधरी को करीब 3।5 हज़ार वोटों से हराया था। इस विधानसभा में भी पहले से समाजवादी पार्टी के यशपाल सिंह की स्थिति मज़बूत है। बीजेपी छोड़ने के बाद अब इस सीट पर भी अखिलेश यादव के लिए मुश्क़िलें बढ़ गई हैं कि किसे मनाया जाए?
 
क्या पुराने नेताओं को नाराज़ करेंगे अखिलेश?
बृजेश प्रजापति तिंदवारी विधानसभा से चुनकर आए थे। उन्होंने बीजेपी की टिकट पर बसपा के जगदीश प्रसाद प्रजापति को क़रीब 37 हज़ार मतों के अंतर से हराया था।
 
बृजेश शुक्ल बताते हैं, "विधायक रहते हुए भी बृजेश प्रजापति ने अपनी ही सरकार पर कई बार सवाल उठाए। वे खनन माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते आए हैं। यहां विशंभर प्रसाद निषाद की दावेदारी पहले से काफ़ी मज़बूत है। वे सपा के संस्थापक सदस्य रहे हैं। वे नहीं चाहेंगे कि बृजेश प्रजापति को टिकट मिले।"
 
ऐसे में अगर बृजेश प्रजापति को टिकट मिलता है, तो सपा के पुराने नेताओं के सुर बाग़ी हो सकते हैं।
 
रोशनलाल वर्मा ने भी सपा का दामन थाम लिया है। उन्होंने 2017 में बीजेपी की टिकट पर तिलहर विधानसभा में क़रीब 82 हज़ार वोटों से जीत दर्ज़ की थी। उन्होंने कांग्रेस के जितिन प्रसाद को क़रीब 6 हजार वोट के अंतर से हराया था।
 
पत्रकार बृजेश शुक्ल बताते हैं, "2017 के विधानसभा चुनाव में रोशनलाल वर्मा ने नारा दिया था कि 'इस बार लड़ाई महल और झोपड़ी की' है। उन्हें जिताने के लिए बीजेपी को काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ा था। उन्हें डर था कि इस बार टिकट नहीं मिलेगा, इसलिए ये बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हो गए।"
 
वहीं विनय शाक्य साल 2017 में बीजेपी की टिकट पर औरैया जिले की बिधुना सीट से जीत कर आए थे। उन्होंने सपा के दिनेश कुमार वर्मा को क़रीब 4 हज़ार वोटों से हराया था। इस सीट पर दिनेश कुमार वर्मा पहले से काफ़ी मज़बूत उम्मीदवार हैं। ऐसे में सवाल है कि बीजेपी से आए इन बाग़ी नेताओं को सपा में कैसे और कहां जगह दी जाएगी।
 
ज्ञानेंद्र कुमार शुक्ल का कहना है, "असली अग्निपरीक्षा अखिलेश यादव के लिए है कि वो पुराने लोगों को कैसे मनाएंगे? अभी यूपी विधान परिषद की क़रीब 36 सीटों पर चुनाव होने हैं। अखिलेश यादव कुछ नेताओं को विधान परिषद भी भेज सकते हैं। वहीं यदि सरकार बन जाती है तो वे कई नेताओं की नाराज़गी बोर्ड के अध्यक्ष बनाकर, मंत्री का दर्जा देकर दूर कर सकते हैं।"
 

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