गुरु कराते हैं ईश्वर का अनुभव

महापुरुषों के चार प्रकार

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वैराग्य के बाद एवं की शरणागति के पूर्व एक तत्व मध्य में है, जिसके बिना कार्य नहीं हो सकता। उस तत्व का नाम गुरु 'महापुरुष' है। कौन-सा मार्ग किस साधक के लिए श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय महापुरुष करेगा। अड़चनों का समाधान भी वहीं करेगा। ईश्वर की प्राप्ति के लिए गुरु-संत की शरण में जाना होगा।

तुलसीदास जी में कहते हैं कि बिना गुरु के अज्ञेय तत्व को नहीं जाना जा सकता। गुरु के वचन पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। गीता के चार के 34 में कहा गया है कि हमें कोई सच्चा संत मिल जाए तो उनकी शरण में जाकर जिज्ञासु भाव से उनसे प्रश्न पूछकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। बिना सत्संग के ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता।
आज के समय में हमें ऐसे संतों की आवश्यकता है, जो वेदशास्त्रों के ज्ञाता हों, स्वयं ईश्वर-अनुभव प्राप्त कर चुके हों। ऐसे संतों से हमारा कार्य बन सकता है। जिस जीवात्मा ने परमपुरुष को प्राप्त कर लिया है, वह महापुरुष कहलाता है। हमारे लिए समस्या है कि हम संतों को कैसे पहचानें?

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महापुरुष चार प्रकार के होते हैं। एक जो अंदर से महापुरुष होते हैं, बाहर से भी महापुरुष हैं। दूसरे जो अंदर से महापुरुष हैं, किंतु जो सांसारिक कार्य करते हुए दिखते हैं। तीसरे ऐसे संत होते हैं, जो अंदर से भी दंभी और बाहर से भी दंभी हैं। चौथे प्रकार के संत जो अंदर से दंभी हैं, किंतु जो बाहर से संत-महापुरुष का होना व्यक्त करते हैं। ऐसे संतों की पहचान अत्यंत कठिन है।
हमारे देश में 99 प्रतिशत संत हुए हैं, जो बाह्यरूप से सांसारिक रहे हैं, किंतु अंदर से प्रेम करने में लीन रहते हैं। यह गंभीर समस्या है। वास्तविक ईश्वरी ज्ञान के बाद अनंतकाल तक कभी अज्ञान नहीं आ सकता तथा ईश्वरी आनंद पाने के बाद अनंत काल तक दुख नहीं रह सकता।



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