साहित्य के अथक साधक का अवसान

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- डॉ. संध्या भराड़े

शिवाजी सावंत उन सौभाग्यशाली लेखकों में से थे जिनकी पुस्तक मृत्युंजय एक घर की तीसरी पीढ़ी भी उसी रुचि से पढ़ रही है। ऐसे कई पाठकों को मैं जानती हूं जिनके मन में मृत्युंजय के प्रति वही आदर है जो गीता और रामायण के प्रति होता है। हम जैसे कई हैं जिन्हें मृत्युंजय के संवाद, पैरेग्राफ और पृष्ठ संख्या सहित याद हैं। मृत्युंजय लिखकर शिवाजी सावंत ने कर्ण की जनसाधारण के मन में जो धूमिल और तिरस्कृत प्रतिमा थी उसे आदरणीय बना दिया इसमें दो राय नहीं हो सकती।

मराठी का सबसे लोकप्रिय उपन्यास कौन सा है? सबसे अधिक बिकने वाला उपन्यास कौन सा है। और पाठकों के मन में स्थान जमा लेने वाले उपन्यास का नाम क्या है। इन तीन प्रश्नों को लेकर सर्वे किया जाए तो एक ही उत्तर मिलेगा- 'मृत्युंजय' लेखक शिवाजी सावंत। 'मृत्युंजय' के दसवें संस्करण की भूमिका में स्वयं लेखक ने कहा है कि यह मेरी प्रथम पुस्तक है और इक्कीस वर्षों में सत्तर हजार प्रतियों की सीमा पार कर रही है, निश्चित ही समृद्ध पाठक वर्ग को मैं इसका श्रेय देना चाहूंगा।
कोल्हापुर जिले के अजरागांव में 31 अगस्त 1940 में एक किसान के यहां शिवाजी सावंत का जन्म हुआ था। शालेय शिक्षा उसी गांव में संपन्न हुई लेकिन आर्थिक स्थिति साधारण होने के कारण आगे की पढ़ाई रुक गई और टाइपिंग तथा स्टेनोग्राफी की शिक्षा लेकर उन्होंने कोल्हापुर के राजाराम विद्यालय में 18 वर्ष अध्यापन का कार्य किया।

भारतीय संस्कृति के प्रति उनके मन में आदर था 'मेरा भारत अर्थात महाभारत' वाला समीकरण ऐसा दृढ़ था कि उन्होंने महाभारत का अभ्यास शुरू किया। उनकी दृष्टि से अस्मिता खो रहे भारतीय समाज पुरुष को मृत्युंजय अर्थात रविपुत्र कर्ण ही आपत्ति के समय धैर्यशाली और तेजस्वी बनाने में समर्थ है। कहते हैं शिवाजी सावंत के मन में बाल्यावस्था से ही कर्ण के चरित्र को लेकर उत्सुकता थी। विद्यालय में शिवाजी जयंती के उपलक्ष्य में अंगराज कर्ण नाटक खेला गया था। जिसमें श्रीकृष्ण की भूमिका शिवाजी सावंत ने की थी और तीस वर्ष पूर्व की हुई भूमिका मन के कोने में ऐसी छुपकर बैठी थी कि उस बीज का रूपांतर वटवृक्ष के रूप में मृत्युंजय में हुआ।
मृत्युंजय के संदर्भ में उन्होंने 6-7 वर्ष गहन अध्ययन किया। केवल अध्ययन ही नहीं पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों का भ्रमण भी किया जिससे कर्ण की व्यक्ति रेखा को समझने और वास्तविकता लाने में सहायता हो सके। इसी समय उनकी मुलाकात दिल्ली में श्री रामधारीसिंह दिनकर से हुई और 'रश्मिरथी' पुस्तक के साथ कर्ण के जीवन के अन्य पहलुओं पर भी चर्चा हुई।
केदारनाथ मिश्र का हिन्दी में लिखित कर्ण पर खंडकाव्य पढ़ने के बाद शिवाजी सावंत ने तय कर लिया कि उन्हें कर्ण का चरित्र ही लिखना है, अब प्रश्न विधा का था। काव्य लिखा जाए, नाटक के रूप में लिखा जाए या फिर उपन्यास के रूप में लिखा जाए। लेकिन वृषाली, कुंती, कृष्ण, दुर्योधन, अश्वत्थामा, शोण आदि व्यक्ति रेखाएं स्पष्ट होती गईं और निश्चित हुआ कि कर्ण के चरित्र पर उपन्यास लिखा जाए।
पुस्तक लिखकर, छपने के बाद अक्सर पाठक और लेखक का संबंध टूट जाता है लेकिन शिवाजी सावंत उन सौभाग्यशाली लेखकों में से थे जिनकी पुस्तक मृत्युंजय एक घर की तीसरी पीढ़ी भी उसी रुचि से पढ़ रही है। ऐसे कई पाठकों को मैं जानती हूं जिनके मन में मृत्युंजय के प्रति वही आदर है जो गीता और रामायण के प्रति होता है। हम जैसे कई हैं जिन्हें मृत्युंजय के संवाद, पैरेग्राफ और पृष्ठ संख्या सहित याद हैं। मृत्युंजय लिखकर शिवाजी सावंत ने कर्ण की जनसाधारण के मन में जो धूमिल और तिरस्कृत प्रतिमा थी उसे आदरणीय बना दिया इसमें दो राय नहीं हो सकती।
दूसरी पुस्तक 'छावा' जो शिवाजीपुत्र सम्भाजी के चरित्र पर लिखी गई, बहुत लोकप्रिय हुई। छावा अर्थात्‌ शेर का बच्चा, इस पुस्तक के बारे में हुई चर्चा के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए शिवाजी सावंत ने कहा था- छावा लिखने का उद्देश्य कहीं भी शिवाजी को कम दिखाना नहीं था बल्कि जो शेर था उसका छावा कैसा था, यह दिखाना है, युगंधर श्रीकृष्ण के प्रति उनकी श्रद्धा, भावना और गहन अभ्यास का उत्कृष्ट नमूना है। लेखन के इस वीर योद्धा को शत-शत प्रणाम।



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