छोटी-छोटी ख्वाहिशें हैं कुछ उसके दिल में

गुलज़ार की नज्म दरिया और उस पर बनी कलाकृति

Ravindra VyasWD
गुलज़ार की शायरी छोटी-छोटी ख्वाहिशों की शायरी है, लेकिन ये ख्वाहिशें उनकी शायरी में कभी किसी बिम्ब या लैंडस्केप के जरिए अभिव्यक्त होती हैं। कभी अपने में बिलकुल अकेली रात के जरिए तो कभी अपने में ही जलते या घुलते चाँद में।

कभी सिमटते हुए किसी कोहरे में तो कभी बुड़बुड़ करते किसी दरिया में। यह उनकी अपनी ईजाद की गई ठेठ गुलजारीय शैली है। इसी शैली की एक बेहतरीन है-दरिया।

इस नज्म की पहली ही लाइन में गुलज़ार एक ऐसे दरिया का ज़िक्र करते हैं जो छोटी-छोटी ख्वाहिशों के लिए तरसता बहता रहता है। लगता है लंबा वक्त बीत जाने के कारण उसकी ये ख्वाहिशें उसके बड़बड़ाने में बदल गई हैं। अब वह कमजोर हो चला है लेकिन में अब भी पुल पर चढ़ के बहने की ख्वाहिश धड़कती रहती है।

मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता रहता है ये दरिय
छोटी-छोटी ख्वा़हिशें हैं कुछ उसके दिल में-
रेत पर रेंगते-रेंगते सारी उम्र कटी है,
पुल पर चढ़ के बहने की ख्वाहिश है दिल में!

इसके बाद वही गुलजार का जादू है। एक खास मौसम है और उस मौसम का एक खास दृश्य है। एक खूबसूरत लैंडस्केप।

जाड़ों में जब कोहरा उसके पूरे मुँह पर आ जाता है,
और हवा लहरा के उसका चेहरा पोंछ के जाती है-

रवींद्र व्यास|
लेकिन इन दो लाइनों के दिलकश लैंडस्केप के जरिए यह शायर फिर उसकी ख्वाहिशों की ओर लौटता है। जैसे रेत पर रेंगते-रेंगते रहने से वह बेजार हो चुका है, अपनी इस एक रस ज़िंदगी से आज़िज़ आ चुका है और अपने भीतर किसी फाँस की तरह गड़ी ख्वाहिश को पूरी करना चाहता है।



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