हमारा लोकतंत्र और हिन्दी

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दरअसल, प्रजातंत्र के तीनों अंगों यानी कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में हिन्दी की अवहेलना हो रही है। न सांसद हिन्दी बोलते हैं, न नौकरशाह, बोलते भी हैं तो 'ललु्आ हिन्दी' जिसको सुनकर अपनी भाषा पर गर्व कम होता है, हँसी ज्यादा आती है। न्यायपालिका की स्थिति तो और भी ज्यादा बदतर है। वहाँ वालों ने तो शायद हिन्दी से कट्‍टी कर ली है।

न्यायपालिका में तो कभी-कभी यह स्थिति हो जाती है कि वादी और प्रतिवादी दोनों को अँग्रेजी नहीं आती है, पर जिरह अँग्रेजी में होती है। क्या इस हालत में अपराधी अपना बचाव कर पाएगा? और यदि वह नहीं कर पाता है तो यह जनतंत्र का निषेध नहीं तो क्या है?

दरअसल, हिन्दी और स्थानीय भाषाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह न्याय के क्षेत्र में है क्योंकि यदि हम अपराधी को पूरी प्रक्रिया समझाकर उसे अपना पक्ष रखने ही नहीं दे रहे हैं तो न्याय व्यवस्था का मतलब ही क्या रह जाएगा और कोई व्यक्ति अपना पक्ष जब ही रख सकता है जब न्यायिक प्रक्रिया हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में हो, अन्यथा अँग्रेजी की बीन बजती रहेगी और निर्दोष मुर्गे हलाल होते रहेंगे।
भारतीय भाषाओं की रस्साकसी के बीच अँग्रेजी 'बंदर' का काम अंजाम दे रही है। बेलगाँव में मराठी और कन्नड़ खींचतान करती है तो रायचूर में तेलुगू और कन्नड़। कहीं पंजाबी और हिन्दी की खींचतान है। स्वाभाविक ही, दो पड़ोसी बिल्लियों के झगड़े में सबसे ज्यादा भला अँग्रेजी का हो रहा है। वह लगातार 'देशी रोटी' को 'विदेशी केक' में बदलने के लिए आतुर है।
भारत की राजभाषा अधिनियम भले ही यह कहता हो कि कार्यालयीन हिन्दी सरल, सहज, आम बोलचाल की भाषा होना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है। सरकारी हिन्दी इतनी क्लिष्ट है कि कई बार समझने के लिए हिन्दी भाषियों को भी शब्दकोश का सहारा लेना पड़ता है।

कुल मिलाकर हिन्दी की अवमानना, अवहेलना के कारण हिन्दी अपने घर में ही दासी बन गई है। भले ही रूस, जापान, अमेरिका के कुछ विश्वविद्यालयों में इसके पठन-पाठन के बावजूद इसकी स्थिति शोचनीय है।
तब हमारे लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण पक्ष को शनै:-शनै: अँग्रेजी चूहे कुतरते जा रहे हैं। यदि ऐसा होता रहा तो लोकतंत्र की चूलें हिलने में देर नहीं लगेगी। सिर्फ भाषा ही नहीं, लोकतंत्र भी रसातल में जाने लगेगा।

जरूरत है हिन्दी को पल्लवित, पुष्पित करने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की। यदि हम ऐसा नहीं कर सकते तो हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाने का कोई अर्थ नहीं होगा।आइए एक बार फिर

मानस भवन में उतारें आरती,
हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि हो नागरी



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