ठंड में दस हजार टन मछली का सेवन

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में इस वर्ष पड़ी जबर्दस्त ठंड से मछली की खपत भी काफी बढ़ गई। लोग प्रतिमाह दस हजार टन मछली हजम कर रहे हैं। लोगों द्वारा इतनी भारी मात्रा में मछलियों का सेवन करने से राज्य में करीब 6500 टन मछलियों का आयात किया जा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य में सामान्य दिनों में जहाँ तीन हजार टन मछलियों की प्रति माह खपत होती है वहीं ठंड बढ़ने से मछलियों की खपत बढ़कर दस हजार टन प्रति माह हो गई।


राज्य के मत्स्य विभाग के संयुक्त निदेशक एस.आर. चन्याल ने बताया कि अकेले देहरादून में ही इन दिनों प्रति माह एक हजार से बारह सौ टन मछलियों की खपत हुई है जो सामान्य से काफी अधिक है। राज्य में पर्वतीय इलाका होने और अधिक ठंड पड़ने से लोग इस मौसम में मछलियों का अधिक से अधिक सेवन करते हैं। मछलियों की कीमत जहाँ गर्मी के मौसम में 50 रूपए से 60 रूपए प्रति किलो होती है वहीं इस मौसम में मछलियाँ 100 से लेकर 120 रूपए प्रति किलो के हिसाब से दुकानदारों द्वारा बेची जा रही हैं और लोग लाइन लगाकर खरीद रहे हैं।
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एक आकलन के मुताबिक राज्य में 90 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं और इसी के चलते मछलियों की खपत अधिक होती है। राज्य में मछली उत्पादन के लिए कई जलाशय हैं जहाँ से राज्य के लोगों को मछली की आपूर्ति की जाती है। राज्य में प्रति माह करीब 3500 टन मछलियों का उत्पादन किया जाता है तथा आंध्रप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी मछलियाँ मँगाई जाती हैं। जरूरत पड़ने पर महाराष्ट्र तक से मछलियाँ यहाँ लाई जाती हैं।

मछलियों में डोंगरा और मखनी मछली हरिद्वार से मँगाई जाती है जबकि रूड़की में पैदा होने वाली सोल मछली को उत्तराखण्ड के लोग बड़े शौक से खाते हैं ।


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उत्तराखण्ड के विभिन्न इलाकों में पाई जाने वाली महाशीर मछली सबसे महँगी होती है और ठंड के मौसम में यह करीब दो सौ रूपये प्रति किलोग्राम तक बिकती है। इस मछली को स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम माना जाता है। राज्य में रोहू मछली की भी खासी माँग है और यह सदाबहार मछली के रूप में विख्यात है।
कतला, हिल्सा, रोहू मछलियों का सेवन करने के लिए तो डॉक्टर भी सलाह देते हैं और इसी के चलते मछलियों की कीमत अधिक होती है।



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