योग स्वास्थ्य का मूलाधार

WD|
योग हमें वह 'दिव्य दृष्टि' प्रदान करता है जिसके द्वारा हम सांसारिक समस्याओं के साथ आंतरिक शंकाओं का समाधान यथार्थतः प्राप्त करते हुए अतीन्द्रिय तत्वों के संबंध में प्रचलित विविध मान्यताओं से उत्पन्न विवादों को सरलता से समाप्त कर सकेंगे। अंतिम एकमात्र सत्य कानिर्भ्रान्त अटल साक्षात्कार हो जाने पर मत-मतांतरों के विवाद, झगड़े फिर स्वतः शांत हो जाएँगे। साधारण गृहस्थ नर-नारी जो अपनी दुर्बल रोगी काया, निस्तेज इंद्रियग्राम, चंचल मन-बुद्धि के कारण दैनिक सुख-शांति से भी वंचित हैं वे अपनी थकी-हारीे देहों को आसनों, प्राणायाम आदि के दैनिक अभ्यासों से दृढ़, स्फूर्तिवान, इंद्रियों को शक्तिवान बना सकते हैं। खोई हुई एकाग्रता (मन-बुद्धि को) वापस प्राप्त कर सांसारिक सुखों का उपभोग करने में समर्थ हो सकते हैं। योग के बहिरंग अंग यम, नियम, आसन, प्राणायाम एवं प्रत्याहार, बालक,वृद्ध, युवक, रोगी, स्वस्थ, गृहस्थ, वनस्थ, संन्यासी, ब्रह्मचारी, स्त्री-पुरुष सभी के लिए लाभकारी है। इन अभ्यासों को अध्ययन के साथ करना लाभकारी है।


योग का उद्देश्य है जीवन का सर्वांगीण विकास करना। र्स्वांगीण विकास से तात्पर्य है शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास करना है।

धर्मार्थ काममोक्षाणामारोग्यं मुल मुत्ततम्‌ -आयुर्वेद


अर्थ : धर्म-कर्म का अनुष्ठान, अर्थोपार्जन, संतति उत्पादन तथा मोक्ष की सिद्धि करने के लिए स्वस्थ-निरोग शरीर आवश्यक होता है। देह स्वस्थ-निरोग हुए बिना इनमें से एक का भी लब्ध होना संभव नहीं है। यह ध्रुव सत्य है। अतएव ''शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम्‌''- शरीर पूर्णतःस्वस्थ-निरोग होना वांछनीय है। निरोग शरीर के द्वारा ही धर्म-कर्म का अनुष्ठान तथा मोक्ष साधन संभव है, अन्यथा नहीं।

जहाँ शरीर रोगग्रस्त है वहाँ सुख कहाँ, शांति कहाँ, आनंद कहाँ? भले ही वित्त वैभव, इष्ट-कुटुम्ब तथा नाम, यश सब कुछ प्राप्त हो फिर भी यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, रोगी है तो जीवन एक भार बन जाता है, जीवन व्यतीत करना दूभर हो जाता है।



और भी पढ़ें :