कम पड़ रही हैं हीरोइनें!

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क्या कारण हैं कि हर बड़ी फिल्म में ले-देकर इन्हीं में से कोई चेहरा नजर आता है। क्या वाकई में इंडस्ट्री में हीरोइनों का अभाव है या फिर हीरोइनें तो बहुत हैं, लेकिन ऐसी लड़कियों की कमी है, जो स्टार भी हो, अभिनय भी कर पाएँ! या फिर ये कि जमाना कहीं भी चला जाए, लेकिन आज भी हिन्दी फिल्मों में हीरोइन का काम प्यार करना और पेड़ों के इर्द-गिर्द गाने गाना ही है।

'द डर्टी पिक्चर' की सफलता ने को कैटरीना कैफ, और प्रियंका चोपड़ा जैसी अभिनेत्रियों की उस कतार में शामिल कर दिया है, जिनकी फिल्में 100 करोड़ रुपए से अधिक का व्यापार कर रही हैं। बावजूद इसके बॉलीवुड में ऐसी अभिनेत्रियों की कमी है, जो केवल अपने अभिनय के दम पर फिल्म चलने की गारंटी बन सकें।

अधिकतर अभिनेत्रियाँ सुंदर और सेक्सी दिखाई देने के लिए फिल्मों में शामिल की जाती हैं और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनकी अभिनय क्षमता क्या है? पर्दे पर वे जिन किरदारों को निभाती हैं, वे अक्सर फिल्मों के लिए महत्वपूर्ण भी नहीं होते हैं। दूसरे शब्दों में महिलाओं को फिल्म उद्योग में केवल ग्लैमरस भूमिकाओं तक सीमित कर दिया है।

हालाँकि 'इश्किया' और 'द डर्टी पिक्चर' के माध्यम से विद्या बालन ने एक नई पहल की है, लेकिन अभी देखना यह है कि वे अभिनेता प्रधान बॉलीवुड को बदल पाती हैं या फिर रेखा (उमराव जान) की तरह सिर्फ खिलकर मुरझा जाती हैं।

अगर पिछले साल की हिट फिल्मों पर गौर करें तो ज्यादातर निर्देशकों ने इन्हीं चार अभिनेत्रियों पर भरोसा किया है। इनमें से एक बहुत शानदार से खराब अभिनय की ओर, दूसरी मुकाबला करती है, लेकिन महान नहीं बन पाती है, तीसरी की अभिनय क्षमता की चर्चा करना तक बेकार है और चौथी लगातार बेहतर अभिनय की ओर बढ़ रही है। अब ये फैसला आपको करना है कि विद्या, कैटरीना, करीना और प्रियंका में से कौन-सी बात किसके संदर्भ में कही गई है।

ये चारों ही क्यों सक्रिय हैं, इसकी वजह ये है कि रानी मुखर्जी को ज्यादा ऑफर नहीं मिल रहे हैं। ऐश्वर्या और काजोल अपने बच्चों में व्यस्त हैं और सिर्फ माधुरी ही फिल्मों में वापसी की तैयारी कर रही हैं। जाहिर है कि टॉप अभिनेत्रियों की कमी है और ज्यादातर बड़े प्रोजेक्ट इन्हीं चारों में बँट जाते हैं।

गौरतलब है कि पिछले साल पैसा कमाने में जो टॉप 10 फिल्में - बॉडीगार्ड, रॉ-वन, रेडी, सिंघम, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, डॉन-2, द डर्टी पिक्चर, मेरे ब्रदर की दुल्हन, रॉकस्टार और यमला पगला दीवाना - में से दो-दो करीना और कैटरीना के हिस्से में आईं और एक-एक विद्या और प्रियंका के हिस्से में आईं। प्रियंका के हिस्से में भी दो सफलताएँ आ सकती थीं, यदि सात खून माफ औंधे मुँह नहीं गिरती।

इस तरह इन चार हीरोइनों ने टॉप 10 फिल्मों में से 6 में छाप छोड़ी। बाकी में असिन (जो आमिर खान के साथ शुरुआत करने के बाद भी बॉलीवुड में अभी तक स्थापित नहीं हो पाई हैं), काजल अग्रवाल और नरगिस फाखरी हैं, जिनकी ये पहली ही फिल्में हैं। अभी इनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है, क्योंकि इन दोनों की फिल्में मूलतः नायक प्रधान रही हैं।

कहा जा सकता है कि ये फिल्में इसलिए सफल रही हैं, क्योंकि इनमें ये अभिनेत्रियाँ थीं, लेकिन हकीकत ये भी है कि मेरे ब्रदर की दुल्हन और द डर्टी पिक्चर के अतिरिक्त बाकी सफल आठ फिल्में हीरो की वजह से ही चलीं।

एक और आश्चर्य की बात है कि यही टॉप चार अभिनेत्रियाँ बहुत-सी फिल्मों में आयटम गर्ल के रूप में या केमियो करती नजर आईं। मसलन, बॉडीगार्ड में करीना लीड में थीं, लेकिन कैटरीना का आयटम नंबर था। अग्निपथ में प्रियंका लीड रोल में हैं और कैटरीना आयटम नंबर कर रही हैं।

रॉ-वन में करीना लीड में थीं और फिल्म की शुरुआत में प्रियंका ने केमियो किया। गौरतलब है कि डॉन में प्रियंका लीड में थीं और करीना ने केमियो और आयटम नंबर किया था। ऐसा लगता है कि निर्देशक इन अभिनेत्रियों के अतिरिक्त और किसी पर विचार करते ही नहीं हैं।

अजीब बात है कि दूसरी कतार में जो हीरोइनें हैं जैसे दीपिका, बिपाशा, सोनम, सोनाक्षी और कंगना इतना दमखम नहीं रखती हैं कि अपने दम पर फिल्में सफल करा लें। यद्यपि कंगना ने शुरुआत में बहुत क्षमता दिखाई थी, लेकिन अब वो चमक कहीं नजर नहीं आती है।

बाकी सब सुंदर, सेक्सी और प्रोफेशनल तो हैं, लेकिन अदाकारा वैसी दमदार नहीं हैं। क्या इनमें से कोई भी महत्वाकांक्षी भूमिका अपने कंधों पर उठा सकती हैं? क्या इनमें से कोई भी चाँदनी बार, ओंकारा या द डर्टी पिक्चर जैसी भूमिका निभा सकती हैं? शायद नहीं, क्योंकि ये सभी ग्लैमरस हैं और अभिनय क्षमता के लिए ज्यादा विश्वसनीय नहीं हो सकती हैं।

इसका अर्थ यह हुआ कि अगर निर्देशक के पास महिला के लिए कोई सशक्त रोल है तो उसके विकल्प बहुत सीमित हैं। खासकर इसलिए भी, क्योंकि प्रमुख चार अभिनेत्रियों में से कड़ी मेहनत के बावजूद अभिनेत्री के दर्जे तक नहीं पहुँच पा रही हैं। ऐसे में फिल्म निर्माता क्या करे? उसे करीना, प्रियंका और विद्या का ही इंतजार करना होगा या फिर देखना होगा कि कब ऐश्वर्या और काजोल अपनी जिम्मेदारियों के बीच में से समय निकाल सकें।

ऐसा नहीं है कि अच्छी अभिनेत्रियों का अकाल है। मसलन कोंकणा सेन शर्मा को ही लें, उन्होंने वेकअप सिड, ओंकारा और पेज थ्री को अपने सशक्त अभिनय से सफल बनाया, लेकिन अब भी बड़े बजट वाले निर्माता उन पर दाँव लगाने को तैयार नहीं हैं।

कल्कि कोएचलिन और चित्रांगदासिंह को भी कोंकणा की कतार में रखा जा सकता है फिर भी आजमाई हुई पुरानी अभिनेत्रियों शबाना, तब्बू और डिंपल कपाड़िया भी मौजूद हैं, लेकिन ये सब अभिनेत्रियाँ हैं, स्टार नहीं हैं। उनमें ऐसा आकर्षण नहीं है कि 100 करोड़ वसूलने की जिम्मेदारी ले सकें।

सवाल यह है कि अभिनेत्रियों के संदर्भ में टॉप पर इतनी जगह खाली क्यों हैं? टेलेंट की कमी या हीरो के आगे निर्माता देखते ही नहीं हैं? क्या वजह है कि महिलाओं के लिए अच्छी भूमिकाएँ नहीं लिखी जाती हैं? क्या बॉलीवुड में हीरोइनें सिर्फ बदन उघाड़ने के लिए ही ली जाती हैं?

दरअसल बॉलीवुड में आम धारणा है कि फिल्में सिर्फ हीरो की वजह से ही बिकती हैं। ये बात काफी हद तक सही भी है। किसी हीरोइन की ऐसी फैन फॉलोईंग नहीं है जैसी खान त्रिमूर्ति की है। आज ऐसी कोई हीरोइन मौजूद नहीं है जो मीनाकुमारी या माधुरी दीक्षित की तरह फिल्म को अपने कंधे पर उठा सकें। बस ले-देकर विद्या बालन ही सामने आई हैं जिन्होंने अपने दम पर द डर्टी पिक्चर को सुपरहिट कराया है।

बहरहाल इस साल प्रियंका (बर्फी), कैटरीना (एक था टाइगर, दोस्ताना- 2) और करीना (एक मैं और एक तू, तलाश, हीरोइन, बोल बच्चन और एजेंट विनोद) में नजर आएँगी। दूसरे शब्दों में अन्य हीरोइनों पर कम से कम बड़े बजट की फिल्में बनाने वाले निर्माता द डर्टी पिक्चर की सफलता के बावजूद दाँव लगाने को तैयार नहीं हैं।

तो कुल मिलाकर मामला पर्दे पर पैसा वसूलने की क्षमता और अभिनय कर लेने के बीच संतुलन पर आकर टिकता है और इस मामले में फिलहाल सक्रिय लड़कियों में से तीन विद्या, करीना और प्रियंका पर ही भरोसा किया जा सकता है।
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में इन दिनों सारी बड़ी फिल्मों में करीना, कैटरीना, प्रियंका और विद्या में से ही कोई हीरोइन हुआ करती हैं, जबकि ऐसा नहीं है कि इंडस्ट्री में लड़कियों का अभाव है। अब तो देशी ही नहीं विदेशी लड़कियाँ भी अपनी किस्मत आजमाने बॉलीवुड आ रही हैं, फिर भी बड़े प्रोजेक्ट ज्यादातर इन्हीं चारों में बँटते हैं।

- डीजे नंदन




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