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Vat Savitri Vrat Katha: वट सावित्री व्रत पर पढ़ें ये महत्वपूर्ण पौराणिक कथा

Updated: गुरुवार, 25 जून 2026 (16:10 IST)
वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र व्रतों में से एक है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखद वैवाहिक जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। सावित्री और सत्यवान की कथा इस व्रत का आधार है, इस कथा को पढ़े बगैर यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है। यहां पर पढ़ें पौराणिक और प्रमाणिक कथा।
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वट सावित्री व्रत की कथा हिंदी में:

मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। नारद मुनि ने पहले ही सावित्री को चेतावनी दी थी कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक साल बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। इसके बावजूद सावित्री ने सत्यवान से विवाह किया और वन में सास-ससुर के साथ रहने लगीं।
 
सावित्री को सत्यवान की मृत्यु का दिन पता था, इसलिए उन्होंने तीन दिन पहले ही व्रत (उपवास) शुरू कर दिया था। उस दिन जब सत्यवान वन में लकड़ी काटते समय अचेत होकर गिर पड़े, तो सावित्री ने उन्हें बरगद के पेड़ के नीचे लेटा दिया। उसी समय भैंसे पर सवार होकर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री ने उन्हें पहचाना और सावित्री ने कहा कि आप मेरे सत्यवान के प्राण न लें। यम ने इसे अनदेखा कर उसके पति के प्राण लेकर वे आकाश मार्ग से जाने लगे। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं।
 
यमराज यह देखकर आश्चर्य करने लगे की यह स्त्री मेरे पीछे कैसे और किस शक्ति के बल पर आ रही है। यमराज ने सावित्री से कहा कि तुम्हें इस मार्ग पर नहीं आना चाहिए यह अनुचित है। तुम्हें वापस चले जाना चाहिए। यम ने मना किया, मगर वह वापस नहीं लौटी। लेकिन सावित्री अपने निष्ठा और पतिव्रता पर अडिग रही। यमराज ने सावित्री की निष्ठा और बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर कहा कि अपने पति के जीवनदान के बदले कोई भी 3 वरदान मांग लो।
1. सावित्री ने पहले वरदान में सास-ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य मांगा।
2. दूसरे वरदान में अपने पिता के लिए संतान सुख मांगा।
3. तीसरे वरदान में अपने लिए 100 पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा।
 
वरदान देते समय यमराज को यह एहसास हुआ कि सत्यवान के बिना सावित्री 100 पुत्रों की मां नहीं बन सकती। सावित्री की चतुराई और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।
 
मान्यता है कि जिस वट (बरगद) के पेड़ के नीचे सावित्री ने अपने पति के प्राण वापस पाए थे, वह वट वृक्ष त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का निवास स्थान माना जाता है, इसलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है।

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पौराणिक कथा, इतिहास, धर्म और दर्शन के जानकार, अनुभवी ज्योतिष, लेखक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।.... और पढ़ें

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