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हरतालिका तीज व्रत शब्द का अर्थ, महत्व और इतिहास

Updated: शुक्रवार, 11 सितम्बर 2026 (16:13 IST)
Hartalika Teej Vrat 2026: हरतालिका तीज हिन्दू धर्म के सबसे कठिन और पवित्र व्रतों में से एक है, जिसे भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु और कुंवारी कन्याओं द्वारा मनचाहा वर पाने के लिए 'निर्जला' रखा जाता है।
 

1. हरतालिका तीज शब्द का अर्थ

'हरतालिका' शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है:
हरत (आहरण/हरण): इसका अर्थ है 'अनशन करना', हरताल करना, अपहरण करना या हरण करके ले जाना।
आलिका: इसका अर्थ है सखी या सहेली।
अतः 'हरतालिका' का अर्थ है "सहेलियों द्वारा हरण किया जाना"। इस व्रत में 'तीज' शब्द भाद्रपद माह के तृतीया तिथि को दर्शाता है।
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2. हरतालिका तीज का पौराणिक इतिहास (कथा)

पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती बाल्यावस्था से ही भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने हिमालय पर वर्षों तक कठोर तपस्या की।
 
पिता का निर्णय: माता पार्वती की कठोर तपस्या को देखकर महर्षि नारद पर्वतराज हिमालय के पास भगवान विष्णु का विवाह प्रस्ताव लेकर पहुँचे। पर्वतराज ने सहर्ष विष्णु जी से पुत्री के विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
 
सखियों द्वारा हरण: जब माता पार्वती को पता चला कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते हैं, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। उन्होंने अपनी व्यथा अपनी प्रिय सहेली को बताई। पार्वती जी की इच्छा मानकर उनकी सखियों ने उनका 'हरण' कर लिया और उन्हें जंगल की एक गुप्त गुफा में छिपा दिया।
 
शिव जी की प्राप्ति: घने जंगल की उस गुफा में माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन बालू (रेत) से शिवलिंग बनाया और निराहार तथा निर्जला रहकर शिव जी की कठोर आराधना की। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती जी को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
चूंकि सखियों ने माता पार्वती का हरण करके उन्हें इस व्रत का अवसर दिया था, इसलिए इस तिथि का नाम हरतालिका तीज पड़ा।
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3. हरतालिका तीज का महत्व

अखंड सौभाग्य की प्राप्ति: सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दाम्पत्य जीवन की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं।
मनचाहा वर: कुंवारी कन्याएं योग्य और शिव समान गुणी पति पाने के लिए इस दिन व्रत और पूजन करती हैं।
कठोर साधना का प्रतीक: यह व्रत निर्जला (बिना अन्न और जल) रखा जाता है और रात भर जागरण करके भगवान शिव और माता पार्वती की बालू की प्रतिमा बनाकर षोडशोपचार पूजा की जाती है।
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