केवल 5 साल की उम्र में मिली गुरु गद्दी, जानिए गुरु हरकिशन के जीवन के 5 अनसुने पहलू
Guru Harkishan jayanti : सिख धर्म के आठवें गुरु हरकिशन जी को बेहद श्रद्धा और आदर के साथ 'बाल गुरु' के रूप में याद किया जाता है। मात्र 5 वर्ष की अल्पायु में गुरु गद्दी पर विराजमान होने वाले गुरु साहब का जीवन दिव्य ज्योति, नि:स्वार्थ सेवा, असीम दया और अद्भुत ज्ञान का अद्वितीय उदाहरण है। आइए जानते हैं गुरु हरकिशन जी के जीवन से जुड़ी 5 ऐसी खास और प्रेरक बातें, जो हर किसी के दिल को छू जाती हैं :
1. मात्र 5 साल की उम्र में संभाली गुरु गद्दी
गुरु हर किशन सिंह जी का जन्म श्रावण मास, कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को सन् 1656 ई. में कीरतपुर साहिब में हुआ था। जब उनके पिता, सातवें गुरु श्री गुरु हरराय जी ने उन्हें गुरु गद्दी सौंपी, तब उनकी आयु केवल 5 वर्ष थी। इतनी छोटी सी उम्र में गुरु पद की मर्यादा, गंभीरता और जिम्मेदारी को जिस सहजता से उन्होंने निभाया, वह उनके दिव्य और अलौकिक स्वरूप को दर्शाता है।
2. 'गंगा राम का अहंकार' और छज्जू झींवर का प्रसंग
कहा जाता है कि जब पंडित लाल चंद (कुछ कथाओं में पंडित गंगा राम) ने उनकी छोटी आयु देखकर उनके ज्ञान पर सवाल उठाया और श्रीमद्भगवद्गीता के अर्थ समझाने की चुनौती दी, तो गुरुजी ने नम्रता से मुस्कुराते हुए गांव के एक अनपढ़ और मूक-बधिर (बोल-सुन न सकने वाले) व्यक्ति 'छज्जू झींवर' को बुलाया। गुरुजी की कृपा दृष्टि पड़ते ही छज्जू ने गीता के ऐसे गूढ़ और कठिन श्लोकों का अर्थ स्पष्ट कर दिया कि पंडितजी का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया।
3. चेचक की महामारी और मसीहा बने बाल गुरु
जब गुरुजी मुगल सम्राट औरंगजेब के बुलावे पर दिल्ली पहुंचे, तब वहां हैजा और चेचक (Smallpox) जैसी भयानक महामारी फैली हुई थी। लोग तड़प-तड़पकर जान गंवा रहे थे। गुरुजी ने अपनी परवाह किए बिना पीड़ितों की सेवा शुरू की। उन्होंने जिस स्थान पर डेरा डाला था (जो आज ऐतिहासिक श्री बंगला साहिब गुरुद्वारा के नाम से प्रसिद्ध है), वहां के जल से रोगी ठीक होने लगे। यह जल आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
4. खुद लिया दूसरों का दुख, चेचक की चपेट में आए
गुरुजी दिन-रात महामारी से पीड़ितों का इलाज और सेवा करते रहे। दूसरों के दुख दूर करते-करते वे खुद भी चेचक की चपेट में आ गए। उन्होंने हंसते-हंसते दूसरों के कष्टों को अपने ऊपर ले लिया, जो उनके नि:स्वार्थ प्रेम और सर्वोच्च त्याग की मिसाल है।
5. अगले गुरु का दिव्य संकेत
मार्च 1664 में अपनी ज्योति-जोत समाने की अंतिम घड़ियों में जब संगतों ने पूछा कि अगला गुरु कौन होगा, तो बालक गुरु ने केवल दो शब्द कहे- बाबा बकाले। उनका संकेत बकाला गांव में रह रहे उनके दादा जी (सिखों के नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी) की ओर था। मात्र 8 वर्ष की आयु में गुरुजी इस नश्वर संसार को त्यागकर ज्योति-जोत समा गए। सिख परंपरा में हर रोज़ की जाने वाली अरदास में आज भी गुरु हरकिशन जी का नाम बड़े ही आदर से लिया जाता है।

