हिंदू उत्सव का वैज्ञानिक महत्व

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
जब सूर्य 'उत्तरायण' होता है तो का माहौल होता है। 'मकर संक्रांति' एक उत्सव है और जब सूर्य की दक्षिणायन गति होती है तो व्रतों का माहौल होता है। 'श्राद्ध कर्म' व्रत और पूण्य कर्म है। श्राद्ध कर्म के पूर्व व्रतों का पालन किया जाता है।
ब्रह्मांडीय समय प्रबंधन :
उक्त दोनों ही कर्तव्यों के अंतर्गत आते हैं। उक्त कर्तव्यों का वैज्ञानिक आधार है। उत्तरायण सूर्य शरीर, मन और वातावरण में उल्लास लाता है। दक्षिणायण सूर्य से शरीर, मन और वातावरण में विकार उत्पन्न हो सकते हैं। इस दौरान अमावस्य, पूर्णिमा, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण और अन्य खगोलीय घटना के दौरान व्रत और उत्सव का उल्लेख मिलता है।
 
हिंदू के सभी उत्सव और व्रत ब्राह्मांड की खगोलीय घटना, धरती के वातावरण परिवर्तन, मनुष्य के मनोविज्ञान तथा सामाजिक कर्तव्य और ध्यान करने तथा मोक्ष प्राप्ति के उचित समय को ध्यान में रखकर निर्मित किए गए हैं। उचित नियम से किए जाने वाले उत्सव और व्रत से जीवन के सभी संकट से मुक्त हुआ जा सकता है। अनुचित तरीके और मनमाने नियम से धर्म की हानि होकर जीवन कष्टमय हो सकता है। उक्त से हटकर मनाए जाने वाले उत्सवों का कोई आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व नहीं, वह सिर्फ मजे के लिए या किसी तथा‍कथित संत व समाज की तुष्टि के लिए हो सकते हैं।
 
हिंदू कर्तव्यों में शामिल उत्सव :
कर्तव्यों का विशद विवेचन धर्मसूत्रों तथा स्मृतिग्रंथों में मिलता है। वेद, पुराण, गीता और स्मृतियों में उल्लेखित चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक सनातनी (हिंदू या आर्य) को कर्तव्यों के प्रति जाग्रत रहना चाहिए ऐसा ज्ञानीजनों का कहना है। कर्तव्यों के पालन करने से चित्त और घर में शांति मिलती है। चित्त और घर में शांति मिलने से मोक्ष व समृद्धि के द्वार खुलते हैं।
 
कर्तव्यों के कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कारण और लाभ हैं। जो मनुष्य लाभ की दृष्‍टि से भी इन कर्तव्यों का पालन करता है वह भी अच्छाई के रास्ते पर आ ही जाता है। दुख: है तो दुख से मुक्ति का उपाय भी कर्तव्य ही है। हिंदु कर्तव्यों में प्रमुख है:- संध्योपासन, व्रत, तीर्थ, उत्सव, सेवा, दान, यज्ञ और संस्कार। यहाँ प्रस्तुत है प्रमुख उत्सव के बारे में संक्षिप्त जानकारी।
 
मनमाने उत्सवों का प्रचलन :
मनमाने त्योहार या उत्सव को मनाने से धर्म की हानि होती है। ऐसे कई त्योहार हैं जिन्हें मनमाने तरीकों से मनाया भी जाता है। भारत के प्रत्येक समाज या प्रांत के अलग-अलग त्योहार, उत्सव, पर्व, परंपरा और रीतिरिवाज हो चले हैं। यह लंबे काल और वंश परम्परा का परिणाम ही है कि वेदों को छोड़कर हिंदू अब स्थानीय स्तर के त्योहार और विश्वासों को ज्यादा मानने लगा है। सभी में वह अपने मन से नियमों को चलाता है। कुछ समाजों ने माँस और मदिरा के सेवन हेतु उत्सवों का निर्माण कर लिया है। रात्रि के सभी कर्मकांड निषेध माने गए हैं।
उन त्योहार, या उत्सवों को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा, व्यक्ति विशेष या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथों, धर्मसूत्रों और आचार संहिता में मिलता है। ऐसे कुछ पर्व हैं और इनके मनाने के अपने नियम भी हैं। इन पर्वों में सूर्य-चंद्र की संक्रांतियों और कुम्भ का अधिक महत्व है। सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है।
 
(1) मकर संक्रांति : सूर्य को ब्रह्मांड की आत्मा माना जाता है। ब्रह्मांड में सूर्य अनेक है। हमारी धरती के सूर्य के प्रति धन्यवाद देने हेतु संक्रांति का पर्व नियुक्त है। वर्ष में बारह संक्रांतियाँ होती है जिसमें से मकर संक्रांति का ही महत्व अधिक है।
 
मकर संक्रांति का पर्व पूरे भारत में मनाया जाता है। यह सूर्य आराधना का पर्व है जिसे भारत के प्रांतों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। इसी दिन से सौर नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है जबकि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में गति करने लगता है। इसे सौरमास भी कहा जाता है। इस दिन से सूर्य मकर राशि में गमन करने लगता है इसीलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं।
 
भारत के अलग-अलग प्रांतों में इस त्योहार को मनाए जाने के ढंग भी अलग हैं, लेकिन इन सभी के पीछे मूल ध्येय सूर्य की आराधना करना है। मकर सक्रांति को पतंग उत्सव, तिल सक्रांति आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का, तिल-गुड़ खाने का तथा सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व है। इस दिन से दिन धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है। यह दिन दान और आराधना के लिए महत्वपूर्ण है। मकर संक्रांति से सभी तरह के रोग और शोक मिटने लगते हैं। माहौल की शुष्कता कम होने लगती है।
 
(2) कुंभ का मेला : सनातन हिंदू धर्म में कुंभ मेले का बहुत महत्व है। वेदज्ञों अनुसार यही एकमात्र मेला, त्योहार और उत्सव है जिसे सभी हिंदुओं को मिलकर मनाना चाहिए। धार्मिक सम्‍मेलन की यह परंपरा भारत में वैदिक युग से ही चली आ रही है जब ऋषि और मुनि किसी एक विशेष काल में नदी के किनारे जमा होकर धार्मिक, दार्शनिक और आध्‍यात्मिक रहस्यों पर विचार-विमर्श किया करते थे। यह परंपरा आज भी कायम है।
 
कुंभ का आयोजन प्रत्येक 12 साल में 4-4 किया जाता है अर्थात हर 3 साल में एक बार 4 अलग-अलग स्‍थानों पर लगता है। अर्द्धकुंभ मेला प्रत्येक 6 साल में हरिद्वार और प्रयाग में लगता है जबकि पूर्णकुंभ हर 12 साल बाद केवल प्रयाग में ही लगता है। 12 पूर्ण कुंभ मेलों के बाद महाकुंभ मेला भी हर 144 साल बाद केवल इलाहाबाद (प्रयाग) में ही लगता है।
 
याद रखें : इस बार का कुंभ मेला मकर संक्रांति से शुरु हो रहा है जिसके दूसरे दिन एक हजार साल के सबसे लंबे सूर्य ग्रहण के लोगों ने दर्शन किए। साढ़े तीन घंटे लंबे सूर्य ग्रहण को अब 23 दिसंबर 3043 को ही देखा जा सकेगा।
 
(3) अन्य उत्सव : गणेशोत्सव, नवरात्रि, शिवरात्रि, वसंत पंचमी, होली, विजयादशमी और दीपावली का भी खासा महत्व है। कृष्णअष्टमी, रामनवमी और बुद्ध जयंती को धूमधाम से मनाए जाने की सलाह दी जाती रही है, क्योंकि संक्राति और कुंभ के बाद यही सबसे महत्वपूर्ण माने गए हैं। हिंदू सनातन धर्म के मुख्य संप्रदाय वैष्णव, शैव, शाक्त और ब्रह्म सम्प्रदाय में अलग-अलग पर्व, त्योहार, व्रत या उत्सव का प्रचलन है किंतु सभी मकर संक्रांति और कुंभ पर एकमत हैं। हम ऊपर लिख आए हैं कि कौन से उत्सवों का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है।
 
नियम : प्रत्येक उत्सव या त्योहार को मनाने के नियम है। उक्त उत्सवों में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। उत्सव या त्योहार इसलिए होते हैं कि जीवन से दुख मिटाकर व्यक्ति एक होकर सुखी रहे। उत्सव में प्रकृति तथा ईश्वर के प्रति प्रर्थना और धन्यवाद देने का महत्व है। महत्वपूर्ण पवित्र तिथियों में माँस खाकर या शराब पीकर जो लोग उत्सव को मनाते हैं प्रलय काल में उन्हें इसका भुगतान करना होगा।



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