क्या साईं बाबा मुस्लिम फकीर थे?

साईं विरोधी कहते हैं कि साईं अफगानिस्तान का एक पिंडारी लुटेरा था। इसके लिए वे एक कहानी बताते हैं कि औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य खत्म-सा हो गया था केवल दिल्ली उनके अधीन थी। मराठों के वीर सपूतों ने एक तरह से हिन्दू साम्राज्य की नींव रख ही दी थी, ऐसे समय में मराठाओं को बदनाम करके उनके इलाकों में लूटपाट करने का काम ये पिंडारी करते थे।

जब अंग्रेज आए तो उन्होंने पिंडारियों को मार-मारकर खत्म करना शुरू किया। इस खात्मे के अभियान के चलते कई पिंडारी अंग्रेजों के जासूस बन गए थे।

साईं के विरोधी कहते हैं कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में 500 पिंडारी अफगान पठान सैनिक थे। उनमें से कुछ सैनिकों को अंग्रेजों ने रिश्वत देकर मिला लिया था। उन्होंने ही झांसी की रानी के किले के राज अंग्रेजों को बताए थे। युद्ध के मैदान से रानी जिस रास्ते पर घोड़े के साथ निकल पड़ीं, उसका रास्ता इन्हीं पिंडारी पठानों ने अंग्रेजों को बताया। अंत में पीछा करने वाले अंग्रेजों के साथ 5 पिंडारी पठान भी थे। उनमें से एक शिर्डी के कथित साईं बाबा के पिता थे जिसे बाद में झांसी छोड़कर महाराष्ट्र में छिपना पड़ा था। उसका नाम था बहरुद्दीन। उसी पिंडारी पठान भगोड़े सैनिक का बेटा यह शिर्डी का साईं है, जो वेश्या से पैदा हुआ और और जिसका नाम चांद मियां था।
1857 के दौरान हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुसलमानों के बीच अंग्रेजों ने फूट डालने की नीति के तहत कार्य करना शुरू कर दिया था। इस क्रांति के असफल होने का कारण यही था कि कुछ हिन्दू और मुसलमान अंग्रेजों की चाल में आकर उनके लिए काम करते थे। बंगाल में भी हिन्दू-मुस्लिम संतों के बीच फूट डालने के कार्य को अंजाम दिया गया। इस दौर में कट्टर मुसलमान और पाकिस्तान का सपना देखने वाले मुसलमान अंग्रेजों के साथ थे।
साईं के पिता जो एक पिंडारी ही थे, उनका मुख्य काम था अफगानिस्तान से भारत के राज्यों में लूटपाट करना। एक बार लूटपाट करते-करते वे महाराष्ट्र के अहमदनगर पहुंचे, जहां वे एक वेश्या के घर में रुक गए। फिर वे उसी के पास रहने लगे। कुछ समय बाद उस वेश्या से उन्हें एक लड़का और एक लड़की पैदा हुई। लड़के का नाम उन्होंने चांद मियां रखा। लड़के को लेकर वे अफगानिस्तान चले गए। लड़की को वेश्या के पास ही छोड़ गए। अफगानिस्तान उस काल में इस्लामिक ट्रेनिंग सेंटर था, जहां लूटपाट, जिहाद और धर्मांतरण करने के तरीके सिखाए जाते थे।
उस समय अंग्रेज पिंडारियों की जबरदस्त धरपकड़ कर रहे थे इसलिए बहरुद्दीन भेस बदलकर लूटपाट करता और उसने अपने संदेशवाहक के लिए अपने बेटे चांद मियां (साईं) को भी ट्रेंड कर दिया था। चांद मियां चादर फैलाकर भीख मांगता था। चांद मियां चादर पर यहां के हाल लिख देता था और उसे नीचे से सिलकर अफगानिस्तान भेज देता था। इससे जिहादियों को मराठाओं और अंग्रेजों की गतिविधि के बारे में पता चल जाता था।
यह साईं अफगानिस्तान का एक पिंडारी था जिसे लोग यवनी कहकर पुकारते थे। यह पहले हिन्दुओं के गांव में फकीरों के भेष में रहकर चोरी-चकारी करने के लिए कुख्यात था। यह हरे रंग की चादर फैलाकर भीख मांगता था और उसे काबुल भेज देता था। किसी पीर की मजार पर चढ़ाने के लिए उसी चादर के भीतर वह मराठा फौज और हिन्दू धनवानों के बारे में सूचनाएं अन्य पिंडारियों को भेजता था ताकि वे सेंधमारी कर सकें। इसकी चादर एक बार एक अंग्रेज ने पकड़ ली थी और उस पर लिखी गुप्त सुचनाओं को जान लिया था।
1857 की क्रांति का समय अंग्रेजों के लिए विकट समय था। ऐसे में चांद मियां अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गए। अहमदनगर में पहली बार साईं की फोटो ली गई थी। अपराधियों की पहले भी फोटो ली जाती थी।

यही चांद मियां 8 साल बाद जेल से छुटकर कुछ दिन बाद एक बारात के माध्यम से शिर्डी पंहुचा और वहां के सुलेमानी लोगों से मिला जिनका असली काम था गैर-मुसलमानों के बीच रहकर चुपचाप इस्लाम को बढ़ाना।
इस मुलाकात के बाद साईं पुन: बारातियों के साथ चले गए। कुछ दिन बाद चांद मियां शिर्डी पधारे और यहीं उन्होंने अल-तकिया का ज्ञान लिया। मस्जिद को जान-बूझकर एक हिन्दू नाम दिया गया और उसके वहां ठहराने का पूरा प्रबंध सुलेमानी मुसलमानों ने किया।

एक षड्यंत्र के तहत चांद मियां को चमत्कारिक फकीर के रूप में प्रचारित किया गया और गांव की भोली-भाली हिन्दू जनता उसके झांसे में आने लगी। चांद मियां कई तरह के जादू-टोने और जड़ी-बूटियों का जानकार था इसलिए धीरे-धीरे गांव में लोग उसको मानने लगे। बाद में मंडलियों द्वारा उसके चमत्कारों का मुंबई में भी प्रचार-प्रसार किया गया जिसके चलते धनवान लोग भी उसके संपर्क में आने लगे।
साईं ने हिन्दू-मुस्लिम एकता की बातें करके मराठाओं को उनके ही असली दुश्मनों से एकता निभाने का पाठ पढ़ाया। यह मराठाओं की शक्ति को कमजोर करने का षड्यंत्र था। सिर्फ साईं ही नहीं, ऐसे कई ढोंगी संत उस काल में यही कार्य पूरे महाराष्ट्र में कर रहे थे। मराठाओं की शक्ति से सभी भयभीत हो गए थे तो उन्होंने 'छल' का उपयोग शुरू कर दिया था।
पर पीछे ही पीछे साईं का असली मकसद था लोगों को इस्लाम की ओर बढ़ाना, इसका एक उदाहरण साईं सच्चरित्र में है कि साईं के पास एक पोलिस वाला आता है जिसे साईं मार-मार भगाने की बात कहता है। अब असल में हुआ यह कि एक पंडितजी ने अपने पुत्र को शिक्षा दिलवाने के लिए साईं को सौंप दिया था लेकिन साईं ने उसका खत्ना कर दिया।

जब पंडितजी को पता चला तो उन्होंने कोतवाली में रिपोर्ट कर दी। साईं को पकड़ने के लिए एक पुलिस वाला भी आया जिसे साईं ने मारकर भगाने की बात कही थी। उस वक्त साईं छुपकर भागने का प्रयास भी करते हैं लेकिन पुलिस वाला उसका फोटो खींच लेता है। साईं का जो बुर्का पहने वाला फोटो है, वह उसी दौरान का है।
साईं बाबा कौन थे सवाल यह नहीं है लेकिन यहां यह कहना जरूरी है कि साईं बाबा हिन्दू धर्म के विरोधी नहीं थे। उन्होंने सभी धर्मों के क्रियाकांड और पाखंड का विरोध किया था। से सच्चे अर्थों में एक वेदांती थे, जो कुरितियों और धार्मिक कट्टरपन के खिलाफ थे।

फेसबुक पर साईं के विरोधियों के कई पेज बने हुए हैं जिसमें साईं बाबा के बारे में आपत्तिजनक बातें और फोटो मिल जाएंगे। साईं विरोधियों की इस कहानी में कितनी सच्चाई है यह कहना मुश्किल है, हालांकि इस काहानी का कोई आधार नहीं है, क्योंकि उन्होंने साईं सच्चरित्र की जिन बातों का उल्लेख किया है उसे संदर्भ के साथ पढ़ने पर ही इसका खुलासा होगा। उन्होंने संदर्भ हटाकर इस तरह की बातें प्रचारित कीं जिसके चलते लोगों में भ्रम फैल रहा है। इसलिए यहां यही कहना होगा कि जो लोग साईं बाबा के बारे में कम जानकारी रखते हैं उन्हें साई सच्चरित्र और साईं लीला पढ़ना चाहिए।

 

और भी पढ़ें :