sawan somwar

कविता : कुछ गड़बड़ है!

Updated: शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018 (15:55 IST)
देख रही हूं कुछ गड़बड़ है,
ये बेचैनी और ये हड़बड़ है!!
 
मोहब्बत नई दिखे है जालिम,
बोली में भी तेरे खड़खड़ है!!
 
बदली से ये बादल टकराया,
अब बिजली की कड़कड़ है!!
 
हरियाला सावन जमके बरसा,
इश्किया पत्तों की खड़खड़ है!! 
 
बूंद-बूंद-बूंद क्यूं बतियाते हो,
खुद से खुद की बड़बड़ है!!
 
पंगे नए-नए लिए है दिल से,
दिल से दिल की तड़तड़ है!!
 
रेलगाड़ी में सफर करोगे बाबू,
बिन पटरी के तो धड़धड़ है!!
 
बिना तान की बजी शहनाई,
पुंगी बाजा सब जड़वड़ है!!
 
उड़ गया पंछी-सा दिल तेरा,
अब पंखों की ये फड़फड़ है!!
 
प्यार किया तो डरना क्या है,
प्यारे, प्यार हुआ तो गड़बड़ है!!
लेखक के बारे में
डॉ. निशा माथुर

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