मैं भी बेटी को जन्म देना नहीं चाहती

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मैं भी माँ होती तो बेटी को जन्म देना नहीं चाहती। हमारे देश में संपत्ति बचाने के लिए सिर्फ बेटे चाहिए, वह भी शरीफ नहीं, लठैत बेटे। बेटी के पीछे कई समस्याएँ हैं। उसकी सुरक्षा, देखभाल, दान-दहेज इत्यादि। इसीलिए उसे जन्मने से पहले ही मार दिया जाता है।

आजादी के साठ साल बाद इस देश की तस्वीर हिंसक तथा आपराधिक तत्वों से भरपूर समाज के रूप में उभरी है। अपराध एवं हिंसा हमारे समाज पर इस कदर हावी हो चुके हैं कि बच्ची का जन्म लेना अभिशाप बन गया है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मैं भी माँ होती तो इस देश में बेटी कभी पैदा करना नहीं चाहतीबेटी को जन्म से पहले ही मार देने के पीछे तीन बातें प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। एक तो देश के गाँवों में आज भी माना जाता है कि बेटे के अभाव में आप अपनी जमीन बचा नहीं सकते। पंजाब में कहावत है कि जितने बेटे उतने लठ, जितने लठ उतना कब्जा। यानी इस देश में संपत्ति संभालने के लिए सिर्फ बेटे चाहिए। उसमें भी शरीफ नहीं, लठैत बेटे चाहिए।

दूसरे बेटी की सुरक्षा बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। अपनी बेटी को बेहतर शिक्षा, संस्कार एवं हर परिस्थिति का मुस्तैदी से सामना करना सिखाने वाले माता-पिता भी अपनी बच्ची की शारीरिक सुरक्षा को लेकर हर वक्त चिंतित रहते हैं। हर वक्त उन्हें यही डर सताता है कि कहीं उनकी बेटी के साथ कुछ गलत न हो जाए। कई बार यही खौफ, यही जिम्मेदारी उन्हें बेटी को जन्म देने से रोकती है। इस जिम्मेदारी के आगे उन्हें दहेज की समस्या भी बौनी नजर आती है।

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मधु किश्वरसंपादक, मानुषी पत्रिका एवं महिला कार्यकर्ता
इसके अलावा छोटे परिवार भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। अधिकांश दंपति सोचते हैं कि अगर एक ही बच्चे को जन्म देना है तो क्यों न बेटे को ही जन्म दिया जाए। आखिर बेटा उनके बुढ़ापे की लाठी बनेगा। यह बात दीगर है कि आज के बेटों के लिए ब़ूढे माता-पिता को अपनी पत्नी के हाथों जलील कराने एवं वृद्धाश्रम भेजने में शर्म महसूस नहीं होती।



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