gayatri janmotsav: माता गायत्री की जयंती को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, कुछ श्रावण पूर्णिमा और सामान्यतः गंगा दशहरा के अगले दिन भी मनायी जाती है। हालांकि माता गायत्री के जन्म की कथा को लेकर भी पुराणों में अलग अलग कथाएं मिलती है। चलिए जानते हैं जन्म या अवतरण की सभी कथाओं के बारे में संक्षिप्त में।
1. माँ गायत्री का स्वरूप और अवतरण
वेदमाता और आद्यशक्ति: माँ गायत्री को वेदों की जननी, ज्ञान की देवी और ब्रह्मांड की आद्यशक्ति प्रकृति के पांच स्वरूपों में से एक माना गया है। उनके हाथों में चारों वेद और कमंडल सुशोभित हैं और उनका वाहन श्वेत हंस है। वेदों की ज्ञाता होने के कारण उन्हें 'वेदमाता' भी कहा जाता है।
अवतरण कथा:
पहली कथानुसार सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मांड में अंधकार और अज्ञानता थी, तब देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी ने अपने तेज से माँ गायत्री को प्रकट किया। मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उनका अवतरण हुआ था, जिसे गायत्री जयंती के रूप में मनाया जाता है।
दूसरी कथा के अनुसार ब्रह्माजी ने माता गायत्री का आह्वान किया और अपने चारों मुखों से गायत्री मंत्र का उच्चारण किया तो चार वेद उत्पन्न हो गए। प्रसन्न होकर गायत्री माता ने ब्रह्माजी को सृष्टि निर्माण का वरदान दिया। चारों वेदों की जननी माता गायत्री कहलाई और उन्हें वेदमाता कहा जाने लगा। गायत्री जी को ब्रह्मा की 5 पत्नियों में से एक भी माना जाता है।
चैतन्य और स्थूल रूप: वेदों के अनुसार गायत्री के दो रूप हैं- एक स्थूल रूप (देवी के रूप में) और दूसरा चैतन्य रूप (ब्रह्मांड की प्राण शक्ति)।
2. ब्रह्मा जी के यज्ञ और विवाह से जुड़ी कथाएं
सावित्री की अनुपस्थिति और विवाह: पुष्कर में ब्रह्मा जी एक विशेष यज्ञ कर रहे थे, जिसमें उनकी पत्नी सावित्री समय पर नहीं पहुँच पाईं। यज्ञ का समय निकला जा रहा था, इसलिए यज्ञ को पूर्ण करने के लिए ब्रह्मा जी ने माँ गायत्री से विवाह किया और उन्हें अपनी सहचरी के रूप में स्थापित कर यज्ञ संपन्न किया। इस बात से रुष्ट होकर सावित्री ने ब्रह्मा जी को संसार में न पूजे जाने का शाप दे दिया था।
गाय के मुख से प्राकट्य की कथा: एक अन्य मान्यता के अनुसार, सावित्री के देर से आने पर यज्ञकर्ताओं (ब्राह्मणों) ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ एक गाय को बैठा दिया। उसी दौरान उस गाय के मुख से गायत्री देवी प्रकट हुईं, जिन्हें ब्रह्मा जी के साथ बैठाकर यज्ञ शुरू किया गया।
3. माँ गायत्री के अन्य नाम और पौराणिक संबंध
सविता की पुत्री (सावित्री): माना जाता है कि किसी समय वे सूर्य (सविता) की पुत्री के रूप में जन्मी थीं, जिससे उनका नाम सावित्री पड़ा। भगवान सूर्य ने इन्हें ब्रह्मा जी को समर्पित कर दिया था, जिसके कारण इन्हें 'ब्रह्माणी' भी कहा जाता है।
पुत्री और पत्नी का दार्शनिक रहस्य: पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से सावित्री और उनके संयोग से वेदों की उत्पत्ति हुई। इसके बाद ब्रह्मा जी ने दो शक्तियां बनाईं—चेतन संकल्प शक्ति (जो ब्रह्मा की पुत्री कहलाई) और स्थूल परमाणु शक्ति (जो ब्रह्मा की पत्नी कहलाई)। इस प्रकार दार्शनिक रूप में गायत्री और सावित्री को ब्रह्मा की पत्नी के नाम से जाना जाता है।
महर्षि विश्वामित्र से संबंध: महर्षि विश्वामित्र ने कठिन तपस्या के बल पर गायत्री मंत्र की शक्ति को सिद्ध किया और मानव कल्याण के लिए इस महामंत्र को प्रकट किया, जो जीवन से अज्ञानता को दूर करता है।
4. ऐतिहासिक एवं सामाजिक मान्यताएँ (शोध का विषय)
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विभिन्न इतिहासकारों और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार गायत्री माता के ऐतिहासिक मूल को लेकर अलग-अलग मत हैं, जो कि विवाद और शोध का विषय हैं:-
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कुछ जाट इतिहासकारों के अनुसार वे राजस्थान के पुष्कर की रहने वाली एक जाट महिला थीं, जो वेदज्ञान में अत्यंत पारंगत थीं। उन्हीं से ब्रह्मा ने विवाह किया था।
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कुछ मान्यताओं में उन्हें एक स्थानीय ग्वाल बाला (गोप कन्या) या अहीर राजा नरेंद्र सेन की कन्या माना गया है, जिसके कारण उन्हें 'यादवी' भी कहा जाता है।
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गुर्जर इतिहासकारों के जानकारों के अनुसार वे एक गुर्जर महिला थीं।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख विभिन्न पौराणिक और सामाजिक स्रोतों पर आधारित है। आलेख में दी गई ऐतिहासिक और धार्मिक जानकारियों की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है, इसे केवल जनरुचि और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।