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भानु सप्तमी की पौराणिक कथा

वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
शुक्रवार, 5 जून 2026 (17:26 IST)
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भानु सप्तमी (जिसे सूर्य सप्तमी भी कहा जाता है) भगवान सूर्य देव को समर्पित एक अत्यंत शुभ दिन है। जब भी शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तो उसे 'भानु सप्तमी' कहा जाता है। इस व्रत और दिन की महिमा से जुड़ी 3 पौराणिक कथाएं सबसे ज्यादा प्रचलित हैं।
 

कथा 1: सूर्य देव के प्रकट होने की कथा (मुख्य कथा)

सूर्यदेव: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में भगवान सूर्य देव इसी दिन पहली बार अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए थे।
कथा का सार: महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी अदिति के पुत्र के रूप में सूर्य देव का जन्म हुआ था। शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को सूर्य देव ने पहली बार ब्रह्मांड को अपने प्रकाश से आलोकित किया था और उनका रथ सात घोड़ों पर सवार होकर आकाश में निकला था।
चूंकि यह उनका 'जन्मदिन' माना जाता है, इसलिए इस दिन को 'भानु सप्तमी' (भानु यानी सूर्य) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से व्यक्ति को आरोग्य (अच्छी सेहत) और तेज की प्राप्ति होती है।
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कथा 2: इंदुमती की कथा (व्रत का महत्व बताने वाली कथा)

भविष्य पुराण में भानु सप्तमी के व्रत के महत्व को समझाने के लिए एक वेश्या की कथा आती है, जो इस प्रकार है:
प्राचीन काल में इन्दुमती नाम की एक वेश्या थी। उसने अपने जीवन में कभी कोई पुण्य या धार्मिक कार्य नहीं किया था, लेकिन जैसे-जैसे उसका बुढ़ापा नजदीक आया, उसे परलोक सुधारने की चिंता सताने लगी। वह मुक्ति का मार्ग खोजने के लिए महर्षि वसिष्ठ के पास पहुंची। उसने मुनि से प्रार्थना की, "हे ऋषिवर! मैंने जीवनभर कोई सत्कर्म नहीं किया। कृपा कर मुझे कोई ऐसा सरल उपाय या व्रत बताएं, जिससे मुझे मोक्ष मिल सके और मेरे सारे पाप धुल जाएं।"
 

महर्षि वसिष्ठ ने उपाय बताया:

महर्षि वसिष्ठ ने कहा, "हे इन्दुमती! महिलाओं के लिए मुक्ति और सौभाग्य देने वाला 'अचला सप्तमी' या 'भानु सप्तमी' का व्रत सबसे उत्तम है। शुक्ल पक्ष की जिस सप्तमी को रविवार हो, उस दिन पवित्र नदी में स्नान करके सूर्य देव को दीपदान करो और पूरे दिन निराहार रहकर उनकी पूजा करो।"
 
इन्दुमती ने महर्षि के कहे अनुसार पूरी श्रद्धा और नियम के साथ भानु सप्तमी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से जब उसने अपना शरीर त्यागा, तो उसके सारे पाप नष्ट हो चुके थे। उसे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हुई और वहां उसे अप्सराओं की प्रधान (नायिका) बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
 

कथा 3: श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब की कथा:

जिसके अनुसार शाम्ब, जो कि भगवान श्री कृष्ण के पुत्र थे, उन्हें अपने शारीरिक बल और सुंदरता पर बहुत अधिक अभिमान हो गया था। अपने इसी अभिमान के चलते उन्होंने ऋषि दुर्वासा का अपमान कर दिया। और शाम्ब की यह धृष्ठता को देखकर मुनि दुर्वासा ने क्रोध में आकर शाम्ब को कुष्ठ रोग होने का श्राप दे दिया। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने पुत्र शाम्ब को भगवान सूर्य देव की उपासना करने के लिए कहा था और शाम्ब ने पिता की आज्ञा मानकर सूर्य भगवान की आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें कुष्ठ रोग मुक्ति मिली थी।
 

भानु सप्तमी का धार्मिक संदेश

यह कथा बताती है कि भानु सप्तमी के दिन जो भी व्यक्ति सूर्य देव की पूजा, व्रत और दान करता है, उसके कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। विशेषकर गंभीर बीमारियों से मुक्ति और मान-सम्मान की प्राप्ति के लिए इस कथा को सुनना और व्रत रखना बेहद फलदायी माना गया है।
 
अत: इस व्रत का बहुत अधिक महत्व होने के कारण जो भी व्यक्ति भानु सप्तमी का व्रत रखकर विधिपूर्वक सूर्य देव का पूजन तथा अर्चना करते हैं उन्हें सेहत, संतान की प्राप्ति तथा सुख और धनदायक जीवन प्राप्त होता है। अत: हर व्यक्ति को भानु सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जागकर स्नानादि से निवृत्त होकर सूर्यदेव को जल का अर्घ्य जरूर अर्पित करना चाहिए।

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