सम्बंधित जानकारी
- श्री जगन्नाथ मंदिर एवं मूर्ति स्थापना और रथयात्रा का पौराणिक इतिहास
- पांडव भी गए थे जगन्नाथजी के दर्शन करने और बच गए थे कौरवों के ढूंढ लिए जाने से
- हनुमानजी ने ऐसा किया चमत्कार कि जगन्नाथ मंदिर में नहीं आती है समुद्र की आवाज
- भाजपा नेता बबीता फौगाट को किसानों ने दिखाए काले झंडे
- Pride Month - LGBT कम्युनिटी के लिए जून माह होता है खास, जानिए क्यों?
जगन्नाथ मंदिर का ध्वज क्यों लहराता है हवा की विपरीत दिशा में, जानिए रहस्य
श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन यह निश्चित ही आश्चर्यजनक बात है। यह भी आश्चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है। आओ जानते हैं इसका पौराणिक कारण।
ध्वज के विपरीत दिशा में लहराने की कथा या कारण हनुमानजी से जुड़ी हुई है। हनुमानजी इस क्षेत्र की दशों दिशाओं से रक्षा करते हैं। यहां के कण कण में हनुमानजी का निवास है। हनुमानजी ने यहां कई तरह के चमत्कार बताए हैं। उन्हीं में से एक है समुद्र के पास स्थित मंदिर के भीतर समुद्र की आवाज को रोक देना। इस आवाज को रोकने के चक्कर में ध्वज की दिशा भी बदल गई थी।
एक बार नारदजी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचे तो उनका सामना हनुमानजी से हुआ। हनुमानजी ने कहा कि इस वक्त तो प्रभु विश्राम कर रहे हैं आपको इंतजार करना होगा। नारदजी द्वार के बाहर खड़े होकर इंतजार करने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने मंदिर के द्वार के भीतर झांका तो प्रभु जगन्नाथ श्रीलक्ष्मी के साथ उदास बैठे थे। उन्होंने प्रभु से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहाकि यह समुद्र की आवाज हमें विश्राम कहां करने देती है।
नारदजी ने यह बात बाहर जाकर हनुमानजी को बताई। हनुमानजी ने क्रोधित होकर समुद्र से कहा कि तुम यहां से दूर हटकर अपनी आवाज रोक लो क्योंकि मेरे स्वामी तुम्हारे शोर के कारण विश्राम नहीं कर पात रहे हैं। यह सुनकर समुद्रदेव ने प्रकट होकर कहा कि हे महावीर हनुमान! यह आवाज रोकना मेरे बस में नहीं। जहां तक पवनवेग चलेगा यह आवाज वहां तक जाएगी। आपको इसके लिए अपने पिता पवनदेव से विनति करना चाहिए।
तब हनुमानजी ने अपने पिता पवदेव का आह्वान किया और उनसे कहा कि आप मंदिर की दिशा में ना बहें। इस पर पवनदेव ने कहा कि पुत्र यह संभव नहीं है परंतु तुम्हें एक उपाय बताता हूं कि तुम्हें मंदिर के आसपास ध्वनिरहित वायुकोशीय वृत या विवर्तन बनाना होगा। हनुमानजी समझ गए।
तब हनुमानजी ने अपनी शक्ति से खुद को दो भागों में विभाजित किया और फिर वे वायु से भी तेज गति से मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगे। इससे वायु का ऐसा चक्र बना की समुद्र की ध्वनि मंदिर के भीतर ना जाकर मंदिर के आसपास ही घूमती रहती है और मंदिर में श्री जगन्नाथजी आराम से सोते रहते हैं।
यही कारण है कि तभी से मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।
दूसरा यह कि इस कारण श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यह भी आश्चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है। जय हनुमान। जय श्रीराम।
