श्रीकृष्ण की गीता के अलावा महाभारत में हैं ये 6 और गीता

- अनिरुद्ध जोशी शतायु  'जो यहां है वह आपको संसार में कहीं न कहीं अवश्य मिल जाएगा, जो यहां नहीं है वो संसार में आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा'- महाभारत।>  
महाभारत पढ़ना और महाभारत नामक सीरियल देखना दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। पढ़ने से जो ज्ञान मिलता है वह देखने से नहीं। महाभारत में गीता ही नहीं बहुत कुछ है जिससे हम जीवन संबंधी ज्ञान हासिल कर सकते हैं। महाभारत में गीता के अलावा दर्शन, धर्म, नीति और ज्ञान संबंधी और भी बातें हैं जो भिन्न-भिन्न नाम से प्रचलित हैं। 
यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य ग्रंथ है। इसमें लगभग एक लाख श्लोक हैं, जो इलियड और ओडिसी से सात गुना ज्यादा माना जाता है। महाभारत का एक छोटा-सा हिस्सा मात्र है गीता। महाभारत को महर्षि 28वें वेद व्यास कृष्णद्वैपायन ने भगवान गणेशजी की सहायता से लिखा था। महाभारत तीन चरणों में लिखी गई। पहले चरण में 8,800 श्लोक, दूसरे चरण में 24 हजार और तीसरे चरण में एक लाख श्लोक लिखे गए।
 
विद्वानों का मानना है कि महाभारत में ‍वर्णित सूर्य और चंद्रग्रहण के अध्ययन से पता चलता है कि इसकी रचना 31वीं सदी ईसा पूर्व हुई थी। आमतौर पर इसका रचनाकाल 1400 ईसा पूर्व का माना जाता है। आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ और कलियुग का आरम्भ कृष्ण के निधन के 35 वर्ष पश्चात हुआ।
 
एक अध्ययन अनुसार राम का जन्म 5114 ईसा पूर्व हुआ था। शल्य जो महाभारत में कौरवों की तरफ से लड़ा था उसे रामायण में वर्णित लव और कुश के बाद की 50वीं पीढ़ी का माना जाता है। इसी आधार पर कुछ विद्वान महाभारत का समय रामायण से 1000 वर्ष बाद का मानते हैं।
 
ताजा शोधानुसार ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलीय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। उस वक्त भगवान कृष्ण 55-56 वर्ष के थे। इसके कुछ माह बाद ही महाभारत की रचना हुई मानी जाती है।
 
महाभारत युग में युद्ध और उस काल की विषम परिस्थितियों में भी ज्ञान की गंगाएं बही थीं। महाभारत को पंचमवेद कहा गया है। महाभारत में वह सबकुछ है जो आप सोच सकते हैं और वह सब कुछ भी है तो कोई दूसरा सोच सकता है। आओ जानते हैं कि महाभारत में युद्ध और गीता के अलावा और क्या क्या है। यहां प्रस्तुत है कुछ चुने हुए ज्ञान दर्शन...
 
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