कश्मीर में आतंकियों के जनाजे में उमड़ती थी भीड़, अब सामान्य मौत में भी दूरी बना रहे हैं लोग

Author सुरेश एस डुग्गर| पुनः संशोधित सोमवार, 10 मई 2021 (18:06 IST)
जम्मू। सच में यह हैरान कर देना वाला नजारा है कि कश्मीर में जहां किसी आम नागरिक या आतंकी की मौत पर हजारों की भीड़ जुट जाया करती थी, अब वहां शोक जताने भी कोई नहीं जा रहा है। चौंकाने वाली तो यह है कि डर और अफवाहों का बाजार इतना गर्म है कि लोग फोन पर भी शोक प्रकट करने से कतरा रहे हैं, इस डर से की कहीं फोन के रास्ते कोरोना न हो जाए।

किसी आम मृतक के घर शोक जताने के लिए आने वाले लोगों को मना किया जा रहा है। इससे पहले वादी में जब भी हालात तनावपूर्ण होते थे तो भी शोक सभाएं होती थीं। पाबंदियों या कर्फ्यू के बीच भी हजारों लोग मृतक के जनाजे या फातेहा में शामिल होते थे, लेकिन लॉकडाउन के बीच शोक सभाएं तक नहीं होने से हर कोई चिंतित हो उठा है।

लोग न तो अपनों की मौत पर मातम कर पा रहे हैं और न दिवंगत के अंतिम दीदार कर रहे हैं। सरकार की ओर से भी एक जगह भीड़ इकट्ठा न करने के निर्देश जारी किए गए हैं। रजिया बीबी नामक वृद्ध महिला ने कहा कि मैंने जिंदगी में कभी ऐसा मंजर नही देखा।
कोरोना ने बढ़ाई दूरियां : दरअसल कोरोना संक्रमण रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन और लगातार हो रही मौतों ने कश्मीरियों की सामाजिक जिंदगी में भी बदलाव ला दिया है। संक्रमण के डर से कश्मीर में लोग अपनों से दूर रहने लगे हैं। हजारों शादियां स्थगित कर दी गई हैं, शोक सभाएं तक भी नहीं हो रहीं। जहां तक की जनाजों पर भी चंद लोग ही शामिल हो रहे हैं। इन दिनों अखबारों, केबल नेवटवर्क व निजी रेडियो चैनल में सूचनाएं खूब आ रही हैं।
अनंतनाग के बशीर का कहना था कि प्रशासन ने लॉकडाउन हमारी सुरक्षा के लिए किया है। दुख है कि यह महामारी अपनों के बिछुड़ने पर हमें चार आंसू बहाने की इजाजत नहीं दे पा रही है। एक बीमारी ने समाज को बदल दिया है।

बेमिना के रहने वाले मुहम्मद मजीन वालत ने कहा कि मेरे चाचा का परिवार श्रीनगर के लाल बाजार में रहता है। दो दिन पहले देर शाम उनकी मौत हो गई। हम लोग पहुंच नहीं पाए। चाचा को रात के अंधेरे में दफनाया गया था। परिवार को हिदायत दी थी कि भीड़ जमा नहीं हो।
सबको संक्रमण का डर : कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ कुरैशी ने कहा कि कोरोना के कारण अखबारों में सूचनाओं के विज्ञापन बढ़ गए हैं। विवाह समारोह अगर किसी ने स्थगित नहीं किया तो रिश्तेदार भी नहीं पहुंच रहे। 15 दिनों में यहां अखबारों व सोशल मीडिया पर कई लोग घर में हुई मौतों की सूचना देते हुए अपील कर रहे हैं कि कोई नहीं आए। सभी को संक्रमण का खतरा सता रहा है।
एक कश्मीरी विशेषज्ञ का कहना था कि कश्मीर में लोग परिस्थितियों के मुताबिक जीना सीख लेते हैं। मेरी जिंदगी का यह पहला अनुभव है, जब लोग किसी प्रियजन की मौत पर अपने रिश्तेदारों से शोक जताने के लिए घर न आने की अपील कर रहे हों।




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