Vibhuvan Sankashti Chaturthi 2026: विभुवन संकष्टी चतुर्थी सनातन धर्म में एक अत्यंत दुर्लभ और विशेष व्रत माना जाता है। सामान्यतः हर महीने एक संकष्टी चतुर्थी आती है, लेकिन जब हिंदू कैलेंडर में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास या मलमास) आता है, तब उस महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को 'विभुवन संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है। यह संयोग लगभग ढाई से तीन साल में एक बार बनता है।
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इसीलिए वर्ष 2026 में आने वाली विभुवन संकष्टी चतुर्थी धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ और फलदायी मानी जा रही है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन के सभी संकट, बाधाएं और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। साथ ही भक्तों को सुख, समृद्धि, बुद्धि, सफलता और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ करता है, उसके जीवन के कष्ट कम होते हैं तथा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।
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विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2026 तिथि व शुभ मुहूर्त
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विभुवन संकष्टी चतुर्थी का महत्व
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सरल पूजा विधि
यदि आप विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2026 की सही तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, व्रत कथा, महत्व और गणेश मंत्रों के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए उपयोगी साबित होगा।
विभुवन संकष्टी चतुर्थी 2026 तिथि व शुभ मुहूर्त
साल 2026 में ज्येष्ठ का अधिक मास चल रहा है। इस वजह से विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत 3 जून 2026, बुधवार को रखा जाएगा। चूंकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रोदय यानी चंद्रमा दिखने के समय ही खोला जाता है, इसलिए रात के मुहूर्त का विशेष महत्व है।
चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: 3 जून 2026 को रात 09:21 बजे से
चतुर्थी तिथि की समाप्ति: 4 जून 2026 को रात 11:30 बजे तक
संकष्टी के दिन चंद्रोदय का समय: 3 जून 2026 को 10:04 पी एम से 04 जून को 10:43 पी एम तक।
कुल अवधि - 24 घण्टे 39 मिनट्स
बता दें कि अलग-अलग शहरों के अनुसार समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का महत्व
यह व्रत साधारण संकष्टी चतुर्थी से कई गुना अधिक फलदायी माना गया है क्योंकि यह भगवान विष्णु के प्रिय 'अधिक मास' में आता है। 'विभुवन' का अर्थ तीनों लोकों के स्वामी से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा करने से जीवन के बड़े से बड़े आर्थिक, शारीरिक या मानसिक संकट चुटकियों में खत्म हो जाते हैं। इस दिन व्रत रखने और दान करने से कुंडली के ग्रह दोष विशेषकर चंद्र दोष दूर होते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा नहुष ने भी इस व्रत को करके अपने सारे संकटों से मुक्ति पाई थी और उन्हें इंद्र का सिंहासन प्राप्त हुआ था। इस तरह यह व्रत समस्त दोषों से मुक्ति दिलाने वाला, संकटों का नाश करने वाला तथा इच्छा पूर्ति को पूर्ण करने वाला माना गया है।
सरल पूजा विधि
विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत सुबह सूर्योदय से शुरू होकर रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पूरा होता है। इसकी स्टेप-बाय-स्टेप विधि नीचे दी गई है:
1 प्रातः काल का संकल्प
सुबह सूर्योदय से पहले
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ और यदि संभव हो तो लाल या पीले वस्त्र पहनें। हाथ में जल लेकर भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लें।
2 गणेश जी की स्थापना और अभिषेक
पूजा का शुभ समय
पूजा स्थान को साफ करके उत्तर या पूर्व दिशा में मुंह करके बैठें। गणेश जी की मूर्ति या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं।
3 पूजन सामग्री अर्पित करना
गणेश जी के प्रिय भोग
बप्पा को सिंदूर का तिलक लगाएं। इसके बाद उन्हें दूर्वा यानी दूब घास, लाल फूल, अक्षत, और चंदन अर्पित करें। भगवान गणेश को भोग में उनके सबसे प्रिय मोदक या लड्डू चढ़ाएं।
4 कथा और आरती
शाम के समय
शाम को दोबारा हाथ-पैर धोकर दीपक जलाएं। विभुवन संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद गणेश जी की कपूर से आरती करें।
5 चंद्र दर्शन और अर्घ्य
रात 10:04 पी एम के बाद
रात को जब चंद्रमा उदय हो, तब एक तांबे या चांदी के लोटे में पानी, थोड़ा सा दूध, अक्षत/ चावल और फूल डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद ही अपना व्रत खोलें अर्थात् पारणा करें।
सफलता और समृद्धि के लिए विशेष मंत्र
पूजा के दौरान या फुर्सत के समय शांत मन से भगवान गणेश के इन प्रभावशाली मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें:
* मुख्य मंत्र:
ॐ गं गणपतये नमः।
* संकट नाश के लिए:
वक्रतुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ निर्विघ्नम कुरू मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा।।
* अधिक मास विशेष मंत्र:
क्योंकि यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए गणेश जी के साथ श्री हरि का ध्यान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। अत: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र की माला का जाप अवश्य करें।
इस दुर्लभ चतुर्थी पर श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होगा।
गणपति बप्पा मोरया!
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