19 अगस्त 2019 : आज है बहुला चतुर्थी, जानिए व्रत की कथा और पूजन विधि


को किसानों का लोकप्रिय पर्व बहुला चतुर्थी है। इस दिन किसान समुदाय, विशेष रूप से महिलाएं गाय की पूजा करती हैं।

बहुला चतुर्थी मुख्य रूप से गुजरात में मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में बछड़े और गायों दोनों की पूजा की जाती है। बहुला चतुर्थी के दिन गायों की पूजा करने से चमकते सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।

इस दिन की मान्यता यह है कि व्रतधारी किसी भी प्रकार के दूध या दूध उत्पाद का उपभोग नहीं करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि केवल बछड़ों को गाय के दूध का अधिकार है।

भक्त भगवान कृष्ण की मूर्तियों या चित्रों की पूजा करते हैं जो गायों के साथ उनके सहयोग को दर्शाते हैं।

किसान समुदाय के सभी भक्त सुबह जल्दी उठते हैं, छप्पर, गायघर और गौशाला (गायों के रहने का स्थान) की साफ-सफाई करते हैं और इस मौके पर गायों व बछड़ों को नहलाते हैं। विभिन्न प्रकार के व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं जो चावल से बने होते हैं और इन्हे इनको खिलाया जाता है।

बहुला चतुर्थी व्रत कथा


बहुला चतुर्थी के उत्सव और बहुला चतुर्थी व्रत को रखने के पीछे एक विशिष्ट कहानी है। बहुला चतुर्थी व्रत कथा गुजरात राज्य में बहुत महत्व रखती है।
बहुला नाम की एक गाय थी जो उसके बछड़े को खिलाने के लिए घर वापस आ रही थी। घर जाने के रास्ते में, उसे शेर का सामना करना पड़ा। बहुला मृत्यु से डर गई लेकिन पर्याप्त साहस के साथ उसने शेर से कहा कि उसे अपने बछड़े को दूध पिलाना है। बहुला ने शेर से कहा कि वह उसे एक बार जाने दे वह बछड़े को दूध पिला कर वापस आ जाएगी, इसके बाद शेर उसे खा सकता है। शेर ने उसे मुक्त कर दिया और उसकी वापस आने की प्रतीक्षा की ।
बहुला ने अपने बछड़े को दूध पिलाने के बाद वापसी की जिससे शेर हैरान हो गया। वह अपने बच्चे के प्रति गाय की प्रतिबद्धता से काफी चौंक गया और प्रभावित हुआ, इसलिए उसने उसे मुक्त कर दिया और उसे वापस जाने दिया।

उस विशेष दिन से, भक्त गाय के दूध का त्याग करके इसे केवल बछड़ों के लिए बचाते हैं और बहुला चतुर्थी का उत्सव मनाते हैं।

क्या करें इस दिन

बहुला चतुर्थी के पवित्र दिन पर, भक्त सुबह जल्दी उठते हैं, एक पवित्र स्नान करते हैं और फिर गायों के साथ-साथ बछड़ों को नहलाते हैं और उनके छप्पर (गायों के रहने का स्थान) को साफ करते हैं।
भक्त इस दिन बहुला चतुर्थी का उपवास रखते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लोगों को चाकू से कटा हुआ या गेहूं से बना कुछ भी खाद्य पदार्थ उपभोग करने की अनुमति नहीं होती है।

भगवान कृष्ण, श्री गणेश या भगवान विष्णु के मंदिरों में जाकर पूज न करने का महत्व है।

भक्त भगवान कृष्ण या भगवान विष्णु की मूर्तियों या चित्रों की पूजा करके घर पर प्रार्थनाएं भी कर सकते हैं। धूप, फल, फूल और चंदन का उपयोग देवता की पूजा के लिए किया जाता है।
भक्त भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के मंत्रों का उच्चारण करते हैं एवं ध्यान लगाते हैं।

संध्या के समय के दौरान, भक्त बछड़ों और गायों की पूजा करते हैं जिसे गोधुली पूजा के नाम से जाना जाता है।

अगर भक्तों के पास कोई गाय नहीं है तो वे गाय और बछड़े की तस्वीर की भी पूजा कर सकते हैं और उनकी प्रार्थना कर सकते हैं।

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