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Shabri Jayanti 2025: माता शबरी के बारे में 5 अनसुनी बातें

Written By WD Feature Desk
Updated: शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025 (16:21 IST)
Shabari jayanti 2025 : फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शबरी जयंती मनाई जाती है। इस बार 20 फरवरी 2025 गुरुवार के दिन उनकी जयंती है। वाल्मीकि रामायण में प्रसंग आता है कि भगवान श्रीराम ने शबरी के झूठे बैर खाएं थे। शबरी का भक्ति साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है। उन्होंने कई भजन लिखे हैं। आओ जानते हैं मां शबरी के बारे में 5 रोचक जानकारी। 
 
1. भील जाति से थीं माता शबरी: पौराणिक संदर्भों के अनुसार और स्थानीय मान्यता के अनुसार माता शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम श्रमणा था। शबरी के पिता भीलों के मुखिया थे। उनकी माता का नाम इन्दुमति तथा पिता का नाम अज था। 
 
3. शबरी बनीं साध्‍वी: श्रमणा का विवाह एक भील कुमार से तय हुआ था, विवाह से पहले कई सौ पशु बलि के लिए लाए गए। जिन्हें देख श्रमणा बड़ी आहत हुई.... यह कैसी परंपरा? ना जाने कितने बेजुबान और निर्दोष जानवरों की हत्या की जाएगी। इस कारण शबरी विवाह से 1 दिन पूर्व भाग गई और दंडकारण्य वन में पहुंच गई। दंडकारण्य में मातंग ऋषि के आश्रम में साध्वी बनकर रहने लगी। 
 
3. श्रीराम का इंतजार: जब मतंग का अंत समय आया तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही भगवान राम की प्रतीक्षा करें, वे उनसे मिलने जरूर आएंगे। मतंग ऋषि की मौत के बात शबरी का समय भगवान राम की प्रतीक्षा में बीतने लगा, वह अपना आश्रम एकदम साफ रखती थीं। रोज राम के लिए मीठे बेर तोड़कर लाती थी। बेर में कीड़े न हों और वह खट्टा न हो इसके लिए वह एक-एक बेर चखकर तोड़ती थी। ऐसा करते-करते कई साल बीत गए। फिर एक दिन राम आए। 
 
4. शाकम्भरी देवी: कर्नाटक में रामदुर्ग से 14 किलोमीटर उत्तर में गुन्नगा गांव के पास सुरेबान नाम का वन है जिसे शबरीवन का ही अपभ्रंश माना जाता है। आश्रम के आसपास बेरी वन है। यहां शबरी मां की पूजा वन शंकरी, आदि शक्ति तथा शाकम्भरी देवी के रूप में की जाती है। यहीं श्रीराम व शबरी की भेंट हुई थी। पम्पासरोवर हनुमान हल्ली ऋष्यमूक पर्वत चिंता मणि किष्कंधा द्वार प्रस्रवण पर्वत फटिक शिला सभी किष्किंधा में है इनमें आपसी दूरी अधिक नहीं है ये स्थल बिलारी तथा कोपल दो जिलों में आते हैं बीच में तुंगभद्रा नदी है।
 
5. शबरी के भजन : शबरी का भक्ति साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है। उन्होंने कई भजन लिखे हैं। रामायण के अरण्यकांड में उल्लेख मिलता है कि शबरी के देह त्यागने के बाद राम और लक्ष्मण ने उनका अंतिम संस्कार किया और फिर वे पंपा सरोवर की ओर निकल पड़े।

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