रहमान के लिए 'जय हो' का उदघोष करें

रहमान का प्रयोगधर्मी संगीत दिल में उतरता है

AR Rahman
ND
ऐसा कहा जाता है कि रचनात्मकता के इलाके में काम की शुरूआत करने से पहले यह समझना बेहद जरूरी है कि आप जिस इलाके में काम करना चाहते है उस इलाके में पहले कौन-कौन किस तरह का बेहतरीन काम कर चुके हैं। यदि बात हिंदी फिल्म की की जाए तो यह दुनिया एक से एक मीठी और नशीली धुनों से लबालब है कि आप एक न उतरने वाले नशे में हमेशा झूमते-नाचते रहें। ऐसी-ऐसी उदास और दिल को किसी अथाह अंधेरे जल में डुबो देने वाली धुनें भी हैं कि आप देवदास बनकर आत्मघाती तक हों उठें।

शास्त्रीय संगीत से लेकर लोक संगीत की खूबियों के साथ इसमें पश्चिमी संगीत की खूबियों का मेल भी देखा जा सकता है। नौशाद से लेकर शंकर जयकिशन और एसडी बर्मन से लेकर आर डी बर्मन ने कमाल की धुनें तैयार की हैं। तो फिर एआर रहमान इनसे कैसे और किस धरातल पर अलग हैं? आखिर क्या कारण है कि एआर रहमान के संगीत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और सम्मान मिल गया है।

क्या इसका कारण उनका अत्यधिक रूप से प्रयोगधर्मी होना है? यह एक हद तक सही है कि रहमान का संगीत प्रयोगधर्मी रहा है। उन्होंनें ध्वनियों और धुनों से लेकर, लय और आर्केस्ट्रा तथा किसी खास मूड या मनःस्थिति को अपनी पूरी कोमलता या उदासी में, उसकी उमंगता या तरंगता में संप्रेषित करने के लिए किसी खास वाद्ययंत्र का कल्पनाशील इस्तेमाल किया है। लेकिन यह तो उनसे पहले के संगीतकारों ने भी किया है। तो फिर रहमान की खासियत क्या है?

IFM
मुझे लगता है रहमान की खासियत यह है कि वह अपने संगीत का रसायन न ‍िसर्फ शास्त्रीय संगीत से लेकर लोक संगीत की खूबियों से तैयार करते हैं बल्कि उनमें वेस्टर्न, लैटिन, पॉप, जॉज, रेगी से लेकर अरबी संगीत के तत्वों का खूबसूरत प्रयोग भी सुनाते हैं। जो इससे पहले हिंदी फिल्म संगीत में संभव नहीं हुआ था।

ऐसा लगता है यह संगीत कश्मीर की फूलों की घाटियों में घूमते हुए फूलों से बात करता है और फूलों ने उसके कानों में जो रस घोला वह अपने गीतों में उंडेल देता है। (घूमरो घूमरो, छोटी सी आशा) ऐसा लगता है कि यह कश्मीर की फूलों की घाटियों से निकल कर कन्याकुमारी के समुद्र किनारे टहलता है तो वह अपने सीने में उस समुद्र की दहाड़ को हमेशा के लिए जज्ब कर लेता है। समुद्र की लहरों की उछलती मचलती भावनाओं को अपनी आत्मा पर बहने की लिए जगह बनाता है। जब अपनी कुर्सी पर बैठकर रात के नीरवता में कोई धुन तैयार करता है तो बरबस ही वह समुद्र की हरहराहट औऱ उसकी मचलती-उछलती लहरों की भावनाएँ नोट्स में ढलकर साकार हो उठती हैं(रंगीला-बाम्बे))।

लगता है वह गुजरात के किसी ठेठ गाँव के आँगन में बैठकर एक कान से कोई लोकधुन भी सुन रहा है और दूसरे कान अरबी संगीत भी (गुरु फिल्म के गाने विशेषकर दोई दोई और माहिया माहिया) सुन रहा है और उनकी खूबियों को जानता समझता है और यह भी कि इनका अपने संगीत में कितना महीन प्रयोग किया जा सकता है।

लेकिन क्या यह सब प्रयोग से ही संभव है? हम जानते हैं कि हिंदी फिल्म संगीत में प्रयोग के नाम पर कितना कर्कश संगीत बनाया गया। कितना भड़भड़कुटा पैदा किया गया। जाहिर है रहमान का संगीत इस तरह के फूहड़ प्रयोग से बचता रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि रहमान ने जो प्रयोग किए वे सिर्फ प्रयोग के नाम पर प्रयोग नहीं थे। वे सिर्फ कुछ नया करने की इच्छा से ही प्रेरित नहीं थे बल्कि इसके पीछे वह रचनात्मक बेचैन इच्छा थी कि कैसे पहले से तैयार की गई जमीन को तोड़कर नया संगीत पैदा किया जा सके। जो अलग भी हो, नया भी हो, मधुर भी हो और उसमें एक ऐसी अपील हो जिसमें सारी भौगोलिक सीमाओं को तोड़कर लोगों के दिलों में जगह बनाने की ताकत हो। यह रहमान ने कर दिखाया। इसके लिए कई सारी फिल्मों के नाम गिनाए जा सकते हैं जिसमें उन्होंने संगीत दिया।

आर. रहमान का संगीत सिर्फ प्रयोगात्मक संगीत है? इसमें कोई दो मत नहीं कि यह अजीम फनकार अपने फन का इतना माहिर फनकार है कि कई तरह की ध्वनियों को मथकर संगीत का ऐसा रसायन तैयार करता है जिसका रसास्कर लो तो वह सिर चढ़कर बोलने लगता है। हिंदी फिल्म संगीत के श्रोताओं ने उन्हें रोजा के मधुर संगीत के लिए जाना था, आज दुनिया उसे स्लमडॉग मिलिनेयर के संगीत के लिए जान रही है। वह 'गोल्डन ग्लोब' हासिल कर चुका है और अब अवार्ड भी पा चुका है।

रवींद्र व्यास|
आइए, हम उसकी शान में 'जय हो जय हो' का उदघोष करें।



और भी पढ़ें :