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ग्रीष्म ऋतु पर कविता (भाग 2)

Updated: रविवार, 29 मई 2022 (18:06 IST)
- हरनारायण शुक्ला, मिनियापोलिस, USA
 
ज्येष्ठ का महीना, 
सूर्य का भभकना,
जलाशयों का सूखना, 
जल जंतुओं का तड़पना।
 
सूखते कीचड़ में, 
पड़ती दरारें,
एहसास कर लो, 
जमीं की अपनी कराहें।
 
पशु-पक्षी, 
जल की खोज में थके हारे, 
जीवित हैं, 
दूर झिलमिलाती मृगतृष्णा के सहारे। 
 
लू की लहर, कहर ढा रही है,
वह क्रूरता से सीटी बजा रही है,
दरवाजे खिड़कियां हैं सब बंद,
लोग अपने ही घरों में नजरबंद।
 
शाम हो चली है चलो,
छत पर पानी छिड़क लो,
नर्म सा बिस्तर बिछा लो,
तारे गिनते निद्रा में लीन हो लो।
 
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