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क्या जयशंकर की जगह लेंगे हर्षवर्धन श्रृंगला? विदेश मंत्रालय में हलचल तेज

वेबदुनिया न्यूज डेस्क
बुधवार, 16 जुलाई 2025 (07:42 IST)
Foreign Minister S Jaishankar News: भारतीय राजनीति में एक बार फिर सियासी अटकलों का बाजार गर्म है। पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए जाने के बाद से विदेश मंत्रालय में बदलाव की सुगबुगाहट तेज हो गई है। क्या यह कदम मौजूदा विदेश मंत्री एस. जयशंकर के लिए खतरे की घंटी है या फिर यह केवल क्षेत्रीय संतुलन और कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है? आइए, इस सियासी पहेली को समझने की कोशिश करते हैं।
 
श्रृंगला का मनोनयन संयोग या रणनीति? : हर्षवर्धन श्रृंगला का नाम भारतीय कूटनीति में एक जाना-पहचाना नाम है। 1984 बैच के भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी, श्रृंगला ने अमेरिका, बांग्लादेश और संयुक्त राष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों को बखूबी निभाया है। खास तौर पर 2019 में अमेरिका में आयोजित 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम में उनकी अहम भूमिका और भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान उनकी रणनीतिक कुशलता ने उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वासपात्र बनाया। वर्तमान में भारत और अमेरिका के संबंध जिस मुकाम पर दिखाई दे रहे हैं, उसे देखते हुए हर्षवर्धन के नाम पर मुहर लग जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
 
2024 के लोकसभा चुनाव में श्रृंगला को दार्जिलिंग से भाजपा का टिकट मिलना लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के कारण यह संभव नहीं हो सका। अब, राष्ट्रपति द्वारा उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किए जाने से सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कदम पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को साधने की रणनीति है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ी सियासी मंशा छिपी है?
 
जयशंकर पर दबाव : ऑपरेशन सिंदूर और कूटनीतिक चुनौतियां : विदेश मंत्री एस. जयशंकर, जो 2019 से इस पद पर हैं, अपनी मुखर और बेबाक शैली के लिए जाने जाते हैं। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते से लेकर डोकलाम विवाद सुलझाने तक, जयशंकर ने कई मौकों पर अपनी कूटनीतिक कुशलता का परिचय दिया है। हालांकि, हाल के कुछ कूटनीतिक घटनाक्रमों ने उनकी स्थिति को कमजोर किया है। खास तौर पर, 'ऑपरेशन सिंदूर' को लेकर उनकी टिप्पणी, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान को जानकारी देने की बात कही थी, ने विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, को हमला बोलने का मौका दे दिया।
 
कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ बताते हुए जयशंकर पर निशाना साधा, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को 'फर्जी खबर' करार दिया। ट्रंप द्वारा युद्ध रुकवाने का श्रेय लेना भी केन्द्र सरकार के लिए नुकसानदेह रहा। इसके अलावा, भारत-पाकिस्तान सीमा पर बढ़ता तनाव, चीन के साथ सीमा विवाद, और कतर जैसे देशों के साथ कूटनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव ने जयशंकर की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में, क्या मोदी सरकार विदेश मंत्रालय में नया चेहरा लाने की तैयारी कर रही है?
 
कैबिनेट विस्तार की चर्चा और श्रृंगला की संभावनाएं : महीने के अंत में होने वाले संभावित कैबिनेट विस्तार की खबरें भी जोर पकड़ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) में भी बदलाव की संभावना है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद, सरकार गठबंधन की मजबूरियों और क्षेत्रीय संतुलन को साधने में जुटी है। ऐसे में, श्रृंगला का राज्यसभा में मनोनयन और उनकी कूटनीतिक पृष्ठभूमि उन्हें विदेश मंत्रालय के लिए एक मजबूत दावेदार बनाती है।
 
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मोदी सरकार शशि थरूर जैसे विपक्षी नेताओं के साथ समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है, ताकि विदेश नीति पर व्यापक सहमति बनाई जा सके। हालांकि, थरूर की भूमिका सलाहकार तक सीमित रह सकती है, जबकि श्रृंगला जैसे अनुभवी राजनयिक को मंत्रालय की कमान सौंपना सरकार के लिए अधिक रणनीतिक कदम हो सकता है।
 
श्रृंगला का ट्रम्प कार्ड : हर्षवर्धन श्रृंगला का अनुभव उन्हें इस रेस में मजबूत बनाता है। उन्होंने न केवल विदेश सचिव के रूप में भारत की कूटनीति को दिशा दी, बल्कि कोविड महामारी, भारत-चीन तनाव, और म्यांमार में सैन्य तख्तापलट जैसे जटिल मुद्दों पर भी रणनीतिक भूमिका निभाई। उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और पीएम मोदी के साथ नजदीकी रिश्ते उन्हें जयशंकर का विकल्प बनाते हैं।
 
वहीं, कुछ जानकारों का मानना है कि श्रृंगला का नामांकन केवल पश्चिम बंगाल में भाजपा की स्थिति को मजबूत करने की रणनीति हो सकती है। दार्जिलिंग और सिलिगुड़ी जैसे क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता और स्थानीय जुड़ाव को देखते हुए, यह कदम क्षेत्रीय राजनीति को साधने का प्रयास हो सकता है।
 
क्या कहते हैं सियासी गलियारे? : राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या जयशंकर का विदेश मंत्रालय में कार्यकाल अब अपने अंत की ओर है? जयशंकर की मुखर शैली ने जहां भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत आवाज दी, वहीं कुछ मौकों पर उनकी टिप्पणियों ने विवाद भी खड़ा किया। दूसरी ओर, श्रृंगला की शांत और रणनीतिक शैली को सरकार के लिए अधिक उपयुक्त माना जा रहा है, खासकर तब जब भारत को गठबंधन की राजनीति और वैश्विक चुनौतियों का सामना करना है।
 
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि श्रृंगला निश्चित रूप से जयशंकर की जगह लेंगे। जयशंकर की कूटनीतिक उपलब्धियां, जैसे भारत-अमेरिका रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाना और SCO जैसे मंचों पर भारत की स्थिति को मजबूत करना, अभी भी उनके पक्ष में हैं। फिर भी, श्रृंगला का राज्यसभा में प्रवेश और कैबिनेट विस्तार की खबरें इस सियासी ड्रामे को और रोचक बना रही हैं।
 
सियासत की नई बिसात : भारतीय राजनीति में बदलाव की हवा हमेशा अप्रत्याशित होती है। हर्षवर्धन श्रृंगला का राज्यसभा में मनोनयन न केवल उनकी कूटनीतिक क्षमता का सम्मान है, बल्कि यह भाजपा की भविष्य की रणनीति का भी संकेत हो सकता है। क्या यह कदम जयशंकर के लिए खतरे की घंटी है, या फिर यह केवल क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों को संतुलित करने का प्रयास है? यह सवाल अभी अनुत्तरित है। लेकिन इतना तय है कि विदेश मंत्रालय में हलचल तेज हो गई है और आने वाले दिन इस सियासी पहेली को और स्पष्ट करेंगे।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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