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आखिर धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे में इतना वक्त क्यों लगा? पूरे मामले की इनसाइड स्टोरी

Dharmendra Pradhan resignation
Dharmendra Pradhan resignation: नीट (NEET) पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर 6 जून 2026 को शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी (CJP) इस आंदोलन शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे और अन्य मांगों को मान लिए जाने के बाद खत्म हो गया है। केन्द्रीय मंत्रियों- जेपी नड्‍डा और जितेन्द्र सिंह के साथ हुई तीसरे राउंड के बैठक के बाद सीजेपी ने भी प्रोटेस्ट को खत्म करने और सभी साथियों से घर लौटने का ऐलान कर दिया। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि शिक्षा मंत्री प्रधान के इस्तीफे में इतनी देर क्यों हुई? क्या पेपर लीक की घटना के बाद नीट परीक्षा रद्द करने की घोषणा के साथ ही उनका इस्तीफा नहीं हो जाना चाहिए था?  

इस आश्वासन से भी नहीं मिली राहत

दरअसल, मोदी सरकार को इस बात का बिलकुल भी इल्म नहीं था कि आंदोलन इतना बड़ा हो जाएगा। उसने पूरे मामले को बहुत ही हलके में लिया। लेकिन, जैसे-जैसे आंदोलन उग्र हुआ तो सरकार को समझ में आ गया ‍कि अब मामला हाथ से निकलता दिख रहा है। अब तक इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुद आकर वीडियो जारी कर प्रदर्शनकारी छात्रों को संबोधित करना पड़ा। फिर भी बात नहीं बनी और अंतत: सरकार को प्रधान के इस्तीफे की प्रदर्शनकारियों की मांग के आगे झुकना पड़ा। हालांकि सरकार ने सख्त नकल विरोधी कानून लाने की बात कही जिसमें 10 करोड़ जुर्माना और 10 की सजा देने की बात कही गई, लेकिन फिर भी बात नहीं बनी। ALSO READ: शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का अंतत: इस्तीफा, प्रदर्शनकारियों को भी लिखा खत

पुलिस लाठीचार्ज ने बढ़ाया असंतोष 

छात्रों और युवा संगठनों द्वारा 20 जुलाई को निकाले गए संसद मार्च और उस दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के बाद मामला बेहद संवेदनशील हो गया था। विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत पूरे विपक्ष ने संसद से लेकर सड़क तक मोर्चा खोलते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत इस्तीफे की मांग की थी। 'No Justice, No Rest' के नारों के बीच सरकार पर चौतरफा दबाव बन रहा था।

प्रधान की जवाबदेही पर सवाल

जंतर-मंतर से लेकर देश भर के विश्वविद्यालयों तक फैल रहे असंतोष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा छात्रों को दिए गए सीधे आश्वासन के बाद, बैकचैनल वार्ताएं तेज हो गई थीं। सूत्रों का कहना है कि विपक्ष को किसी बड़े राजनीतिक विजय (Political Victory) का श्रेय न मिले, इसलिए सरकार किसी भी इस्तीफे की प्रक्रिया या संगठनात्मक बदलाव को सीधे तौर पर आंदोलन के दबाव में हुआ फैसला नहीं दिखाना चाहती थी। हालांकि एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में हुई इतनी बड़ी प्रशासनिक चूक के बाद शिक्षा मंत्रालय के प्रमुख होने के नाते उनकी नैतिक जवाबदेही पर सीधे सवाल खड़े हुए। ALSO READ: 1997 में पेपर लीक पर लाठियां खाने वाले धर्मेंद्र प्रधान आज खुद घिरे, पुलिस पिटाई में आए थे फ्रैक्चर
 
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा बार-बार कराई जा रही परीक्षाओं (NEET, UGC-NET आदि) में लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों के चलते NTA की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी थी। NTA के 47 अधिकारियों-कर्मचारियों को बर्खास्त करने के बावजूद शिक्षा मंत्रालय के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सवाल बने रहे। राहुल गांधी और प्रमुख विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार को संसद के अंदर और बाहर पूरी तरह घेरा। विपक्ष ने स्पष्ट मांग रखी कि जब तक शिक्षा मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा नहीं देते, तब तक आंदोलन और विरोध जारी रहेगा।

वांगचुक की भूख हड़ताल ने बढ़ाया दबाव

जब सोनम वांगचुक जैसे प्रमुख चेहरे भी इस आंदोलन के समर्थन में अनशन पर बैठे, तो सरकार पर भारी दबाव बन गया। सरकार द्वारा 'एंटी-पेपर लीक कानून' लागू करने के बावजूद छात्रों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। ऐसे में राजनीतिक साख बचाने और युवाओं के बीच बिगड़ी छवि को सुधारने के लिए केंद्रीय नेतृत्व को कड़ा कदम उठाने का फैसला लेना पड़ा। संसद मार्च और उग्र छात्र आंदोलन ने निस्संदेह केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय को बैकफुट पर ला दिया था। फिलहाल आंदोलन के समाप्त होने की घोषणा से सरकार ने राहत की सांस जरूर ली है। 
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