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सपने में घर के चौखट से बातचीत

Updated: मंगलवार, 3 मार्च 2026 (20:35 IST)
एक रात सपने में गांव के घर की चौखट का दीदार हुआ। वह उदास और मायूस थी—अपनों के इंतज़ार में थकी-थकी आंखें लिए। सहसा मैं उसे पहचान नहीं सका। मेरे चेहरे पर अजनबीपन का भाव देखकर उसने कहा— “मैं आपके पुश्तैनी घर की चौखट हूं।” मैं उस घर की कई पुश्तों की साक्षी हूं और उनसे भली-भांति वाकिफ भी। आप भी मेरे साथ बाबा, अइया, अम्मा, बबुआ, बड़की माई, बुआ और ढेर सारे भाई-बहनों को जानते हैं। मैं तो उनसे भी पहले के लोगों को जानती हूं। 
 
कभी मेरे भीतर दालान, आंगन, आंगन से सटे ओसारे, उनसे जुड़े कमरे… और बाहर का ओसारा जीवंत हुआ करता था। ओसारे के दोनों छोर के कमरे, घेरा, घारी, चरन और भूसौले में जीवन स्पंदित रहता था। तीज-त्योहार और शादी-ब्याह के अवसरों की रौनक का तो कहना ही क्या!
 
मेरी उम्रजनित मर्यादा का सब बहुत ख्याल रखते थे : मैं ही इनमें सबसे उम्रदराज़ थी। मेरी उम्रजनित मर्यादा का सब ख्याल रखते थे। मुझे लांघकर ही कोई घर के भीतर या बाहर जाता था। मुझ पर पैर रखना पाप समझा जाता था। मुझे साक्षी मानकर कसमें खाई जाती थीं। मैंने बेटियों को दुल्हन बनकर विदा होते देखा है, और दूसरे घरों से आई बेटियों को इसी आंगन में बहू बनकर कदम रखते भी। न जाने कितनी किलकारियों की गवाह हूं मैं। जीवन का उल्लास भी देखा है और अपनों की बीमारी, मृत्यु—यहां तक कि खुदकुशी के दर्दनाक क्षण भी।
 
जो हैं और जो नहीं हैं, सब मुझे याद हैं : अब भी… जो हैं उनकी और जो नहीं हैं उनकी भी बहुत याद आती है। जो नहीं हैं, वे तो लौटेंगे नहीं; पर जो हैं, उनका मुझे शिद्दत से इंतज़ार रहता है। मुझे पता है कि मुझसे जुड़ी पीढ़ियां देश के कई महानगरों और विदेशों में अपने-अपने घर या फ्लैट बनाकर बस गई हैं। पर पूरे यकीन से कहती हूं—उन घरों में मेरे जैसा बड़ा दिल वाला, रिश्तों को जोड़ने वाला “चौखट” शायद ही हो।
 
वहां आपके और आपके बच्चों के लिए जगह होगी, पर परिजनों के लिए नहीं। कुछ घरों में तो मां-बाप के लिए भी जगह नहीं बची। अगर कोई गाहे-बगाहे आ भी जाए, तो स्वागत से ज्यादा चिंता इस बात की होती है कि वह जाएगा कब। यही कारण है कि “अतिथि देवो भव” की भावना क्षीण होती जा रही है। याद कीजिए—मैं तो अपने भीतर और बाहर पूरी बारात समेट लेती थी। सिर्फ अपने घर की ही नहीं, दूसरे घरों की बारात का भी बाहें फैलाकर स्वागत करती थी।
 
सिर्फ एक बार आप सबके दीदार का इंतजार रहेगा : कभी आप लोग भी आइए। मैं पलक-पांवड़े बिछाकर स्वागत करूंगी। मेरे पास अब दिन ही कितने बचे हैं। घर जमींदोज़ हो जाने के बाद मेरी जरूरत भी कहां रही? किसी दिन मुझे भी चीर-फाड़कर जला दिया जाएगा। मुझे सब याद है। सबको याद करती रहती हूं। क्या आपको कभी इस बुजुर्ग चौखट की याद नहीं आती? इतना कहते-कहते उसका गला रुंध गया। आंखें भर आईं।
 
नींद टूटी तो चौखट के बहाने बहुत कुछ याद आ गया : अचानक मेरी नींद टूट गई। यादों में गांव का घर, दुआर, गुलमगर्दा, दासा, दालान, घारी, घेरा, चरन, बखार, आंगन, पटनी वाला घर, लकड़ी वाला घर, दक्खिन का घर, उत्तर का घर, शिवजी और साबिर अली की कोठरी, पक्का बंगला, खेत, खलिहान, पोखरा, कुआं, बाग, बचपन के साथी, बाउंपार की प्राइमरी पाठशाला, बेलाबीर भान का मिडिल स्कूल, वहां पढ़ाने वाले बाबू साहब, मुंशीजी, पंडितजी… स्कूल की पीटी, कबड्डी, गोली, गुल्ली-डंडा, चिकही, ओल्हा-पाती, आइस-पाइस, घोड़ा जमाल—सब कुछ एक साथ कौंध गया। इन स्मृतियों को प्रणाम करते हुए मैंने मन ही मन उस चौखट को नमन किया और सपरिवार लौटने का वादा भी।
लेखक के बारे में
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। .... और पढ़ें

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