बात 1970 के शुरुआती दशक की है। मैं मिडिल स्कूल में पढ़ता था। क्लास कौन-सी थी, ठीक याद नहीं। हमारा स्कूल बेलाबीरभान और मेरा गांव सोनइचा पास-पास ही थे। बल्कि यूं कहें कि जिस बाग में स्कूल की कक्षाएं चलती थीं—मलहिया बारी—वह हमारे ही गांव के हिस्से में था। बाग से चंद कदम दूर मेरा एक खेत भी था।
टिफिन में हम दौड़कर घर जाते, खाना खाकर वापसी में सीजन के मुताबिक गन्ना तोड़ लेते या चने की झाड़ उखाड़ लेते। गन्ने चूसते या चने की फली फोड़कर चना खाते हुए स्कूल लौट आते। साथ में मुझसे थोड़ी बड़ी, पर मेरे ही क्लास में पढ़ने वाली मेरी चचेरी बहन मंजू भी होती थी।
यह रोज का रूटीन था, लेकिन जिस दिन की बात कर रहा हूं, वह थोड़ा अलग था। उस दिन गांव की एक महिला ने स्कूल से कुछ दूर खेत में बने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। टिफिन होते ही सारे बच्चे कौतूहल में कुएं की तरफ भागे। चारों तरफ बच्चों का जमावड़ा लग गया। स्कूल से सब दिख रहा था। गुरुजी डर गए कि कहीं कोई बच्चा झांकते-झांकते कुएं में गिर न जाए। इसलिए टिफिन खत्म होने से पहले ही स्पेशल घंटी (पगली घंटी) बजा दी गई।
घंटी सुनते ही बच्चे डरकर स्कूल लौट आए। मुझे लगा कुछ गड़बड़ है, इंतजार कर देखूं कि माजरा क्या है। चंद मिनट में बच्चों को लाइन में खड़ा किया गया। गुरुजी के इशारे पर कुछ लड़के पास की पोखरी से बेहया के डंडे तोड़कर लाए। डंडे हाथों पर पड़ते और टूटते भी जा रहे थे।
हम और मंजू अपने गन्ने के खेत में गए, गन्ना तोड़ा और चूसते-चूसते इत्मीनान से स्कूल पहुंचे। तब तक ज्यादातर बच्चों के हाथ लाल हो चुके थे। जिनके हाथ नहीं पसरे, उनकी पीठ और पैर। मैं दुबला-पतला था। मंजू हमसे बड़ी और मजबूत। पहुंचते ही गुरुजी गरजे—“लाइन में लगो!”
मंजू आगे बढ़ी, गुरुजी की आंखों में आंख डालकर बोली—“क्यों?”
गुरुजी: “तुम लोग कुएं के पास गए थे?”
मंजू : “नहीं। हम घर खाना खाने गए थे। वापसी में अपने गन्ने के खेत में भी गए थे।” और चूसे हुए गन्ने का टुकड़ा प्रमाण के तौर पर दिखा दिया। गुरुजी के पास पूरे यकीन के साथ बोले गए इस झूठ का जवाब नहीं था। उस दिन मंजू ने मुझे पिटने से बचा लिया।
इसलिए कहा जाता है—हर भाई के लिए एक बहन जरूरी है। बहुत नहीं, बस थोड़ी-सी बड़ी। सगी नहीं तो चचेरी ही सही। समय पर ऐसी बहन ढाल बन जाती है, प्यार देती है, ख्याल रखती है। घर से स्कूल और परीक्षा केंद्र तक।
यह अकेली घटना नहीं थी। कई बार मंजू ने हमें मार से बचाया। उम्र में बड़ी होने के बावजूद मैं उसे नाम से पुकारता था—कभी-कभी “मंजुलिया” भी कह देता। एक बार रणधीर सर क्लास ले रहे थे। मैंने उसे मंजुलिया कह दिया। गुरुजी ने मुझे पास बुलाया, हाथ उमेठकर पीछे किए और पूछा—“तुम बड़े हो या वह?”
मैं दर्द से दोहरा हो रहा था। मैंने कातर नजरों से मंजू की तरफ देखा और कहा—“उससे ही पूछ लीजिए।” गुरुजी ने पूछा तो मंजू ने पूरे यकीन से कहा—“वही बड़ा है। आप उसे छोड़िए।” बेचारे गुरुजी को मुझे छोड़ना पड़ा।
हम कक्षा 8 में पहुंच चुके थे। उस समय 8वीं की परीक्षा बोर्ड से होती थी। हमारा सेंटर पड़ा गगहा के किसान इंटर कॉलेज में—गांव से करीब 5 किमी दूर। वह इलाका दबंग श्रीनेत ठाकुरों का था। अंग्रेजी का पेपर था। मेरे सामने ठाकुर लड़की बैठी थी। पेपर मिलते ही मैंने कॉपी ढकी और लिखना शुरू किया। वो नकल करना चाह रही थी—अनुरोध, आंखें तरेरना, फिर धमकी—“एग्जाम के बाद देख लूंगी” की धमकी भी दी, पर मैंने हाथ नहीं हटाया।
पेपर खत्म होने पर मैं मंजू को ढूंढने लगा। देखा वो उसी लड़की के साथ है। कुछ पास जाकर मैं मंजू का इंतजार करने लगा। उनकी बातचीत मुझे सुनाई दे रही थी। सुना—वह लड़की कह रही थी— “वो लड़का बहुत बदमाश है, नकल नहीं करने दिया। अभी भाइयों से कहकर पिटवाती हूं।”
मंजू के तेवर बदल गए। बोली—“वह हमारा भाई है। उसके साथ कुछ हुआ तो अच्छा नहीं होगा। मैं उसे समझा देती हूं।” फिर मुझे बुलाकर “समझाया”। क्या समझाया, वो बताने की जरूरत नहीं।
मैं दुबला-पतला था। बस्ता का वजन भी भारी लगता। ऊपर से उस पर टाट का वजन। मुझसे संभव नहीं हो पाता था। स्कूल पास था, इसलिए अक्सर समय पर ही पहुंचता। टाट सीमित थे। जगह न मिले तो जमीन पर बैठ जाता। लेकिन मंजू कभी जमीन पर नहीं बैठने देती—तुरंत बुलाती, अपने टाट पर बगल में जगह बना देती।
मिडिल के बाद मैं गोरखपुर चला गया। मंजू गांव में ही रही। कुछ साल पहले मंजू की असामयिक मौत हो गई। पर आज भी… बहुत याद आती हो मंजू।