कोरोना काल में भी स्वर्ग बन सकता है आपका घर

आज आपके घर में चाय, दूध और भोजन बनते वक्त जो बर्तनों की खटपट आपकी नींद में खलल डाल रही है, बच्चों का जो शोरगुल आपके वर्क फ्रॉम होम में तनिक बाधा दे रहा है, बुजुर्ग माता-पिता की हर बड़े से लेकर छोटे काम में दी जाने वाली जो नसीहतें इरिटेड कर रही हैं, भाई बहनों की गैर जरूरी मांगों को पूरा करने का जो हठ परेशान किए दे रहा है, मित्रों की तंग करने की नीयत से की जाने वाली चुहलबाजी व छेड़खानी चिढ़ा रही है।

यह सब वास्तव में आपके भाग्यवान होने के संकेत हैं क्योंकि इस कोरोना काल में मार्च से मई तक की लंबी लॉकडाउन अवधि में जिन लोगों के जीवन में उपर्युक्त दृश्यों का अभाव था, जरा उनसे जाकर पूछिए कि कैसे उनकी आत्मा अपनों के साथ ना होने से गहरी व्यथा से भर उठती थी।

जिनके घरो में पत्नियां न थीं, वे 'घर के भोजन' के स्वर्गिक
सुख को तरस गए। जो इस दौरान अपने बच्चों से दूर थे, वे उनकी किलकारी से लेकर उनकी बाल सुलभ शरारतों व शोर से भरे रहने वाले घर की संपन्नता से वंचित हो गए। जिनके माता-पिता इस दौरान उनके साथ ना थे, वे उस बरगदी छांव से विहीन हो गए, जिसके तले उन्हें रूहानी सुकून और जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या से निपट लेने का हौसला मिलता था। जो अपने प्रिय भाई बहनों के साथ ना थे, वे 'सहकार' के बल से वंचित रहे और मित्रों से अलग रहने वाले उनके सहयोग व हिम्मत को कई मोर्चों पर मिस करते रहे।

देश के अतिरिक्त विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने तो इस पीड़ा को और अधिक भोगा क्योंकि वहां तो देश भी पराया था। जो वहां परिवार के साथ थे, वे तो फिर भी ठीक रहे। लेकिन जो निपट अकेले पढ़ाई या काम के सिलसिले में गए थे, उन्होंने या तो बीमारी अथवा उसके भय के साथ साथ अकेलेपन के संत्रास को भी सहा।

कुल जमा यह कि ये सब कम अधिक रूप में हम सभी के साथ हुआ है। जब भी कोई कष्टकारी समय आता है, तो वह पहाड़ जैसा लंबा प्रतीत होता है। यह लॉकडाउन पीरियड भी था तो लगभग सवा दो माह का, लेकिन हमें यह एक युग के समान लगा।

वास्तव में जब किसी व्यक्ति का अभाव हमारे जीवन में होता है, तभी उसका महत्व ज्ञात होता है। जब तक किसी की उपस्थिति बनी रहती है, हम उसके गुणों या उसकी हमारे लिए उपयोगिता से अधिक उसके अवगुणों अथवा कमजोरियों पर केंद्रित हो जाते हैं। लेकिन उसके न रहने पर जब उससे मिलने वाले लाभ, सहूलियत, योगदान आदि सब मिलना बंद हो जाते हैं, तब उसके अभाव को हम शिद्दत से महसूस कर दुखी होते हैं।

स्मरण रखिए कि ये अभाव दूरी के रूप में अल्प या दीर्घकालिक भी हो सकता है अथवा मृत्यु के स्थायी रूप में भी संभव है।

बहरहाल, दुःखी हम दोनों ही स्थितियों में होते हैं और साथ में पश्चाताप भी जुड़ता है कि हमने उचित समय पर उस रिश्ते की कद्र क्यों नहीं की। लेकिन बीता समय कभी लौटकर आता नहीं। इसलिए कल तक न सीखे, न सही। अब इस कोरोना काल में सीख लीजिये- रिश्तो का महत्व, उन्हें स्नेहपूर्वक जीने की समझ, उनके भीतर छिपे जीवन रस का आनंद लेने का तरीका।

याद रखिए, आपके घर, परिवार, समाज के ये लोग भगवान के जीते जागते वरदान हैं। आपकी गृहस्थी इन्हीं से संपूर्ण बनती है। स्वयं आप इन सब से जुड़कर समग्रता पाते हैं। इनकी छोटी-छोटी बातों पर नाराज मत होइए, प्रेम से उन्हें भी समझिए और स्वयं को भी उन्हें समझाइए।

सोचकर देखिए कि मां या पत्नी के स्नेहमिश्रित भोजन को आप लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी दुनिया की किसी होटल में नहीं पा सकते। गहन संकटों के अंधकार में माता-पिता का शुभाशीष और मार्गदर्शन लाखों सूर्य के प्रकाश से बढ़कर आपकी राह रोशन करता है। घर में बच्चों की मौजूदगी आपके जीवन में उस शीतल सुगंधित बयार की तरह है, जिसकी वजह से आप जीवन के निर्मल आनंद को जी पाते हैं। इसी प्रकार भाई बहनों के होने से आपका आत्मिक बल बढ़ता है और मित्रों का साथ किसी भी समस्या में पीछे न हटने का बुलंद इरादा देता है।
इसलिए दिल से इन 'अपनों' का आदर
कीजिए। उनसे पूरी आत्मा से जुड़िए। ह्रदय की समग्रता में उनसे स्नेह कीजिए।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी हमने अपने जीवन में कभी नहीं देखी। इसलिए इस काल में मिले सबक भी कभी नहीं भूलना चाहिए। उन्हें याद रख अपनी सोच व आचरण में बदलाव लाएंगे तो हमारा जीवन पहले से कहीं अधिक सहज, सरल व आनंदपूर्ण बनेगा। मतभेद हों, लेकिन मनभेद नहीं। नाराजी हो, किंतु क्षणिक। विचार भिन्न हों, मगर ह्रदय अभिन्न हो।

यदि अपनों के साथ कोई शिकायत हो भी, तो बैठकर बातचीत के जरिए समाधान निकालें।
विवाद या पृथक्करण हल नहीं है क्योंकि विवाद मानसिक शांति भंग करता है और पृथक्करण जीवन के सुख को ही समाप्त कर देता है। इस लॉकडाउन में विशेषकर पति-पत्नी के मध्य जो विवाद और तलाक की घटनाएं हुई हैं,वे सच में दुखी कर देने वाली हैं क्योंकि वह क्षणिक आवेश का नतीजा थीं। लंबे समय तक साथ रहने को अपने स्नेह और सहयोग से ऊर्जामय बनाया जा सकता है।

एक-दूसरे के कामों में छोटा- सा सहयोग, परस्पर स्वास्थ्य की चिंता, बच्चों के दायित्व साथ मिलकर पूर्ण करने का भाव और दोनों पक्षों के माता-पिता की समान स्नेह से सेवा आदि कार्य आपके दांपत्य को इस कोरोना काल में भी ताजगी और अटूट व प्रगाढ़ स्नेह की उष्मा से संपन्न बना सकते हैं।

दूसरों में सुधार के आग्रह के साथ स्वयं में भी सुधार की जरूरत को स्वीकार कीजिये। अपने मन मस्तिष्क के वातायन को खुला रखिये, उसमें सभी के विचार, आग्रह, स्वभाव, मांग आदि को आने दीजिए और स्वयं भी बिना किसी संकोच या अहंकार के अपनों के ह्रदय प्रदेश में विचरिये। संभवतः ये अबाधित आवागमन ही आपको जीवन के ऐसे सच्चे मोती उपलब्ध कराएगा, जिनसे आप सही अर्थों में समृद्ध बनेंगे।

वैसे भी गृहस्थ जीवन में शांति व धैर्य की परम आवश्यकता होती है। तिस पर कोरोना ने तो हमें ऐसी अवस्था में लाकर खड़ा कर दिया है कि हम विवश हो गए हैं। कुछ भी हमारे वश में ही नहीं रहा। इसलिए यदि हम अपने परिवार में शांति, धैर्य और सहयोग के साथ रहना सीख जाएंगे तो ये विकट समय आसानी से कटेगा और यकीन मानिए, तब इस संकट में भी हमारे घर में स्वर्ग उतरते देर न लगेगी।

(इस लेख में ‍व्‍यक्‍त विचार लेखक की निजी अनुभूति‍ है, वेबदुनिया का इससे कोई संबंध नहीं है।)



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