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व्यंग्य : मैंने भी 70 युद्ध तो पक्के रोके

Updated: शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025 (15:31 IST)
मैं बिलकुल मजाक नहीं कर रहा। सच कहूं तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि अंकल सैम ने जी-जान लगाकर,तमाम बदनामी झेलकर डेढ़ साल में 7 युद्ध रोके,फिर भी उन्हें शांति का नोबेल नहीं दिया। नहीं दिया तो नहीं दिया,रही-सही कसर मारिया कोरिना मकाडो मैडम के उस बड़प्प्न ने पूरी कर दी, जिसमें उन्होंने अपने को मिले नोबल को अंकल सैम को समर्पित कर दिया। इसे कहते हैं जले पर नमक छिड़कना। औरतें यह काम कुछ ज्यादा अच्छे तरीके से कर लेती हैं, सो मारिया मैम ने भी किया। खैर।
 
मुझे अफसोस है कि सैम को मारिया सेम टू यू नहीं कह पाई। अरे, उन्हें संयुक्त रूप से ही दे देते तो भी धक जाता। लेकिन, ए तो बहुत नाइंसाफी है कि सिरे से खारिज कर दिया जाए। अब दुनिया जाए युद्ध की भाड़ में,सैम अंकल उसे नहीं रोकेंगे। 7 क्या 70 युद्ध भी हो जाएं तो उन्हें क्या? उन्हें तो ज्यादा से ज्यादा अपने हथियार बेचने का ही मौका मिलेगा। पहले रोके 7 युद्धों के 14 देशों को भी कम-ज्यादा हथियार बेचे ही थे। आगे 70 को भी बेचना पड़े तो वे अपने को नहीं रोकेंगे।
 
मेरी चिंता सिर्फ इतनी ही नहीं कि सैम अंकल को नोबल नहीं मिला,बल्कि मुख्य तकलीफ यह है कि जब नोबल वालों को यु्द्धों की अहमियत  ही नहीं मालूम तो वे जीवनभर युद्धरत रहने वाले दुनियाभर के पति समुदाय को कभी इस लायक समझेगा ही नहीं। वे क्या जानें कि एक पति  अपनी पत्नी से आजीवन युद्धरत रहता है,जिसमें उसकी नियति केवल हार की होती है। फिर, वह युद्ध करता नहीं बल्कि युद्ध रोकता है यानी आक्रमण नहीं करता, प्रतिरक्षा करता है। उसके दिमाग में भी युद्ध तो रहता ही नहीं तो हाथ में किसी तरह के हथियार की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
 
जिस दंपति का वैवाहिक कार्यकाल 25 बरस का भी हो तो सोचो,उसने कितने युद्ध रोके होंगे। यदि साल भर के 365 दिनों में से 300 दिन भी युद्ध के मान लिए जाएं तो 7500 युद्ध वह  रोक चुका होता है। इस धरती पर उससे वीर तो कोई हो ही नहीं सकता। मैं जानता हूं कि आपके मन में  कौन सी खुराफात आ रही है।
 
आप मन ही मन यह कह रहे हैं कि इसका मतलब पत्नी झगड़ालू होती है या पति से युद्ध ही करती रहती है। ऐसा कोई विचार भी अपराध है, पाप है। दरअसल, युद्ध तो एक विचार है, जिसका विरोधी विचार से तकरार चलती रहती है। मैंने भी अपने वैवाहिक जीवन में 70 बार तो युद्ध पक्के रोके होंगे, लेकिन इसका यह मतलब थोड़ी कि मैं नोबल का दावा करूं।
 
मेहरबानी कर मुझे उकसाने की कोशिश न की जाए। मैं भी एक आम पति हूं और युद्ध करता नहीं रोकता जरूर हूं। विचारणीय बात यह है  कि शांति का नोबेल पहले लड़ाई लगाकर फिर उसे रोकने वाले को देते हैं क्या ? नहीं, ऐसे ही पूछ रहा हूं। कोई भी पहलवान कहे कि उसने कोई  लडाई ही नहीं की तो उसे भी नोबल दिया जाना चाहिए तो आप क्या कहेंगे ? एक पहलवान को लड़ना ही कहां पड़ता है।
 
यह दोयम काम तो उसके अट्‌टे-पट्‌ठे करते हैं। वह तो बीच-बचाव करता है या मांडवली करता है। अंकल सैम व उनके पूर्ववर्ती भी तो यही करते रहे। पहले दो मुल्कों की जोड़  डलवाते थे, फिर चौधरी बनकर समझौता करवाते थे। पहले जिस देश को हथियार बेच चुके थे, उसके सामने वाले को भविष्य की आशंका के मद्देनजर नए हथियारों की पेशकश करते हैं। दोनों के साथ बराबर का व्यवहार। कोई कमजोर नहीं होना चाहिए। दोनों के पास हथियार रहे तो दोनों एक-दूसरे से खौफ खाएंगे।
 
अब पाकिस्तान को ही देख लो। उसने साफ बोल दिया कि भारत ने हमसे युद्ध छेड़ा तो हम भी परमाणु हथियारों का उपयोग करन से पीछे  नहीं हटेंगे। ऐसा नहीं है कि उसे इसके परिणाम नहीं मालूम। उसने साथ में साफ कर दिया कि वैसा करने के बाद हम तो मिटेंगे ही,आधी दुनिया को ले डूबेंगे।
 
गजब का जिगरा है भाई। अब है किसी में दम तो पाकिस्तान को रोक ले? अंकल सैम तो बिल्कुल नहीं रोकेंगे। वे तो अपनी बेटी-दामाद के क्रिप्टो कारोबार को फैलाने में लगे हैं। पाकिस्तान की डीलरशिप उन्होंने सेनाध्यक्ष मुनीर को दे दी कि प्यारे जितने पटाखे फोड़ने हैं, फोड़ डालो। पहले जनता से लूटा हुआ माल हमारे क्रिप्टो के हवाले कर दो। तुस्सी ग्रेट हो अंकल।
 
मैं भी ना दाएं-बाएं की बात करने लग जाता हूं। मुझे केवल नोबेल पर फोकस रहना चाहिए। तो मेरा मानना है कि नोबेल को शांति की परिभाषा नए सिरे से तय करना चाहिए। यह तो नहीं चलेगा कि कोई लड़की स्कूल को आतंकवादियों द्वारा बम से उड़ा देने के बावजूद पढाई न छोड़े, भले ही देश छोड़कर चली जाए तो उसे नोबेल दे दिया जाए। या कोई मारिया मैडम वेनेजुएला जैसे छंटाक भर देश में सत्तारूढ़ तानाशाह के खिलाफ मुहिम चलाए तो उसे दे दिया जाए।
 
ये क्या बात हुई? ऐसी छुटपुट घटनाएं तो हमारे इंदौर में रोज ही होती हैं। देसी शराब के ठेकों पर रोज न जाने कितने युद्ध होते हैं। यह और बात है कि इन्हें रोकने वाले को कई बार तो सीधे ऊपर पार्सल कर दिया जाता है। नोबेल जैसा नहीं कि कोई लड़ रहा हो और उसे कोई रोकने पहुंच जाए तो नोबेल से नवाज दे।
 
नोबेल को नए मानदंड बनाने चाहिए। मारिया जैसे कम ज्ञात लोगों को नोबेल देना ऐसा ही है, जैसे बिना दांत वाले को चने खाने के लिए देना। अरे जिससे नोबेल का भी मान बढ़े,वैसे किसी व्यक्ति को देना चाहिए-जैसे अंकल सैम। (इस लेख में व्यक्त विचार/ विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/ विश्लेषण वेबदुनिया के नहीं हैं और वेबदुनिया इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती है।)

लेखक के बारे में
रमण रावल
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