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मिसाल है माननीयों की दूरदर्शिता

Updated: मंगलवार, 3 मार्च 2026 (20:37 IST)
हमारे नेताओं की दूरदर्शिता का जवाब नहीं। सच बोलते हैं। सार्वजनिक मंचों से तो और भी सोच-समझकर। चुनाव के समय तो सच को छोड़ और कुछ बोलते ही नहीं। कभी किसी दौर में एक ऐसे ही नेता ने कब्रिस्तान की बात उठाई, तो अगले ने जवाब में श्मशान की। एक माननीय तो इतने भावुक हो गए कि अच्छे श्मशान पर जलने से मिलने वाले असीम आनंद और उसके बाद मोक्ष से स्वर्ग तक की यात्रा का बेहद जीवंत वर्णन कर डाला।
 
शुक्र मनाइए कि उनकी बात को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। न जाने क्यों लोग लेते भी नहीं। अगर लेते तो संभव है कुछ जिंदा लोग अपनी चिता सजा कर इस “असीम यात्रा” और उसके बाद मिलने वाले स्वर्ग के सुख का आनंद लेने निकल पड़ते। यह भी संभव था कि लोग कहते आप माननीय हैं। इस चरम सुख पर आपका पहला हक है।
 
फिलहाल कब्रिस्तान और श्मशान जैसे पवित्र स्थानों का मुद्दा उठाने वालों का शुक्रिया। एक-दूसरे को मरने-मारने पर आमादा इस दौर में देश को शायद इन्हीं दो चीजों की सर्वाधिक ज़रूरत भी है। जिल्लत से जिंदगी गुजारने वाले कम-से-कम मरने के बाद सम्मान से, सुकून के साथ, सदा के लिए चैन की नींद सो सकें — इसके लिए मजहब के अनुसार उन्हें बेहतर श्मशान या कब्रिस्तान मिलना ही चाहिए। लिहाज़ा श्मशान और कब्रिस्तान का यह सिलसिला जारी रहना चाहिए — वह भी जोर-शोर से।
 
करीब साल भर बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी हैं। ऐसे में मौका भी है और माहौल भी। दस्तूर पहले से ही रहा है। श्मशान और कब्रिस्तान के अलावा “अली” और “बजरंगबली”, “जय श्रीराम” और “अल्लाह-हू-अकबर” भी अपनी बारी की प्रतीक्षा में रहेंगे। हो सकता है हर चुनाव की तरह कुछ और ट्रेंडिंग नारे या हैशटैग भी नजर आएं। थोड़ा और इंतज़ार करिए… अपने नेताओं की दूरदर्शिता पर भरोसा रखिए। यकीनन समय के साथ वे और परिपक्व हो चुके हैं। कुछ न कुछ तो नया लाएंगे ही।

लेखक के बारे में
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। .... और पढ़ें

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