Hanuman Chalisa

मोहब्बत बरसा देना तुम, सावन आया है …

सेहबा जाफ़री
"बस भी करो यार! तुम्हारे बगैर हम क्या मज़े करें!!" उसने तुनकते हुए कॉल डिस्कनेक्ट की और गुस्से में लाल भभूका मुंह करते हुए, खिड़की के पल्ले से जा लगी। बेवजह सारा गुस्सा, जुलाई के सूरज को कोसने में लगा दिया, " कमबख्त  सारा पानी सोंख कर पता नहीं अपनी अम्मा को पिलाएगा क्या! " और ये गर्मी ये गर्मी ! यह उमस!! और और यह पसीना!!! उसने गुस्से में पावों की सैंडल निकाल ड्राइंग रूम के कांच को निशाना बनाया।  
 
"बस तो करिये भाभी ! हम लोग इस गर्मी के आदी हैं, क्या हो गया है आपको !"
 
ज़ीशान बाथरूम से बाहर आ सिर्फ इतना बोल कर यों खिसका मानो, ज़्यादा बोलने पर टैक्स लगता हो। 
 
अर्शी कुछ न बोली , दूसरी सैंडल निकाल उसके जाते ही, बंद होते दरवाज़े पर दे मारी।  क्या जवाब देगी बच्चों को! कैसे कहेगी छह महीनों से जो वादा किया जा रहा था, वह महज़ सब्ज़बाग था ! आरिश तो मान लेगा पर अना तो मचल ही जाएगी। अल्लाह! क्या सीखेंगे ये बच्चे अपने बाप से! " फर्स्ट डे- फर्स्ट शो " जाने कब से चिल्ला रहे थे, आज फिल्म रिलीज़ हुई और मियांजान को ऑफिस का काम निकल पड़ा कितने दिन से बच्चे सोच,रहे थे "ये होगा, वह होगा।" अब क्या जवाब देगी बच्चों को! और सबसे बुरी तो बेचारी खुद उस पर ही बीती, कल पार्लर गई थी, आज जतन से तैयार हुई, मियां मोहब्बत से तकते हुए बोले, " जान! बॉस का फोन है, बस यूं गया यूं आया" दिल तो धड़ाक से ऐसे बैठा था, जैसे बॉस न हुआ सास हो गई।  
 
अब!!! ! अल्लाह, बच्चों की तरह ठुनक उठी वह। बच्चे बावले भी तैयार होकर आ गए थे।
 
गुमसुम गुमसुम बैठी ही थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। अब कौन आया ! देखा, बरसों पुरानी दोस्त "कीर्ति" खड़ी थी, हर पहली बारिश, सावन की तरह झूम के दरवाज़े पर आ जाती थी, घर के कड़े पहरे और काम काज सबके बीच से गोटियां जमाती ऐसे उड़ा ले जाती कि कोई चूं भी न करे, गांधी हॉल के झूलों, सराफे की चाट, और 'रीगल' की एक मूवी के बीच, हर पहली बारिश का पहला दिन यादगार बना लेते थे हम दोनों और कम्बख़्त गाजर मूली की तरह झूठ बोल, मुझे वापिस दादी अम्मी के पास जमा भी करा जाती थी। 
 
" नीचे कार खड़ी है चल! " उसका वही अंदाज़ 
 
 नहीं यार! अब ससुराल से ऐसे कैसे पॉसिबल है..... मैं वही सहमी-सहमी।
 
" अंधी! तुझे दिखता नहीं जुलाई आ गया, पूरा इंदौर सूखा है, जानती है क्यों ! सब तेरी वजह से!  मायके आ, मुझसे नहीं मिली!! सज़ा है उसकी। अरी कमबख़्त ! मेरा नहीं मौसम का तो लिहाज़ किया होता! अरी दो सहेलियां न मिले तो बारिश भी नहीं होती। डालो बच्चों को गाड़ी में, मेरे बच्चे तो मैं नानी के पास जमा करा आयी हूं" 
 
" पर बच्चे!  उनके अब्बू ! उनसे क्या कहूंगी मैं !" मेरे समझ में नही आ रहा था। 
 
" ओ  हरीश-चन्द्र! मेरे बच्चोँ के साथ खेलेंगे तेरे बच्चे! अभी ही नया झूला लगाया है अम्मा की छत पे। और तू तो मेरी देवरानी को खून देने जा रही है कौनसा सराफे की चाट खाने जा रही है!" उसने एक आंख दबा कर मुझे मुस्कुरा कर देखा। मैं धक-धक होते दिल से गाड़ी मैं बैठी; कमबख़्त  ऊंचे सुरों में गा रही थी : "मोहब्बत बरसा देना तुम सावन आया है…। " 

Show comments

सभी देखें

Monsoon Glow Secrets: उमस भरे मौसम में भी चेहरे पर रहेगा पार्लर जैसा निखार, नोट कर लें ये नेचुरल स्किन केयर टिप्स

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

घर पर BP चेक करते समय न करें ये गलतियां, जानें ब्लड प्रेशर नापने का सही तरीका

Monsoon Special Recipes: मानसून की 5 बेहतरीन रेसिपीज, देखते ही मुंह में आ जाएगा पानी

BP Control Tips: हाई ब्लडप्रेशर कम करने के घरेलू उपाय

सभी देखें

Chaturmas Fasting Rules: चातुर्मास में क्या खाएं और क्या नहीं, अपना लिए ये नियम तो होंगे 5 फायदे

सावन मास पर एक भावपूर्ण और मौलिक हिंदी कविता

सावन मास पर हिन्दी में बेहतरीन कविता

Shravan Essay: आस्था, प्रकृति और पवित्रता का उत्सव श्रावण मास, पढ़ें रोचक निबंध

London Trip: प्रधानमंत्री से पब्लिक तक मेट्रो, सिटी बस में सफर करते हैं

अगला लेख