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निर्भया केस : ये फांसी अगर मिल भी जाए तो क्या है...

डॉ. छाया मंगल मिश्र
- डॉ. छाया मंगल मिश्र
 
संस्कृत साहित्य में कहा गया है कि

 'ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा।
निष्कृतिर्विहिता राजन् कृतघ्ने नास्ति निष्कृति ।।

ब्राह्मण के हत्यारे, सुरा-पान करने वाले, चोरी करने वाले तथा खंडित व्रत वाले प्राणी के लिए शास्त्रों में प्रायश्चित का विधान है, किन्तु कृतघ्न के लिए कदापि नहीं।

'कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम्।     
अश्रद्धेय: कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः '।।१७३/२०

कृतघ्न प्राणी के लिए कहां यश है,कहां सुख है, कहां स्थान है एवं कहां उसके लिए श्रद्धा है, अर्थात् कहीं भी उसे कुछ भी प्राप्त नहीं है। यहां तक कि शास्त्रों द्वारा बताया गया प्रायश्चित भी उसके लिए नहीं है। कृतघ्न की बहुत निंदा शास्त्रों में की गई है और यही कृतघ्नता का निंदनीय कर्म होता आया है बार बार लगातार सृष्टि की समस्त मातृशक्ति के लिए...

निर्भय और अभय के बीच का अंतर ही भूलने लगे हैं क्या हम? ‘भय’ शब्द का अर्थ घोल कर पी गए? ‘निर्भया’ कोई नई बात नहीं। काले कांड के दोजख को जिसने जीते जी भुगता उसका नाम ‘निर्भया’ कर देने से कोई देश की बेटियां निर्भय नहीं हो गईं। जबकि पापभागी हैवानियत से भरे दरिंदों को आप लगातार ‘अभयदान’ दिए जा रहे हो। सारी दुनिया थूक रही है हम पर, हमारी मातृशक्ति के प्रति कृतघ्नता पर।

सुनो रक्त बीजों, कब तक राजनीति की आंच पर अपनी बेटियों की इज्जत की अग्नि पर अपने भूंगड़े भूंजते रहोगे? शर्म करो तुमने भी किसी नारी की कोख से ही जन्म लिया है।

हमेशा नारी की आड़ में न्याय का फुटबाल खेल खेलने वालों, इंसाफ की देवी भी एक नारी का रूप है। आंख पर पट्टी बांध कर सती गांधारी-सा रूप मान कर अपने धृतराष्ट्र रुपी कुंठा भरे क़ानून की आड़ में निर्भया के इंसाफ को द्रौपदी बना कर लगातार उसका चीरहरण किये जा रहे हो। मत भूलो, इसी घटना ने महाभारत को जन्म दिया था। हमेशा इंसाफ के तराजू में डंडी मारने की कृतघ्नता आपको अंतहीन विनाश की ओर धकेल रही है।

सृष्टि की समस्त महिला जाति आज शर्मसार है।  दरिंदों के हिमायती या तो न्याय के दलाल हैं या कानून के भक्षक। जिस देश की नारियों की आंखों में आंसू होते हैं वह देश कभी फल-फूल नहीं सकता। जिस दिन इंसाफ की देवी ने हमारे हक में ये आंखों पर बंधी पट्टी उतार फेंकी और हाथों में तराजू की जगह बारूद की स्याही भरे अग्नि कलम से इस देश के तिरंगे पर अपना इंसाफ लिख दिया तो विश्व के नक़्शे पर हम केवल काला धब्बा नजर आएंगे।

इंसाफ तो देना होगा, पर अब मिलने वाला इंसाफ क्या निर्भया की आत्मा को स्वीकार होगा? क्योंकि ये तो वही स्थिति है कि मरीज ऑक्सीजन की कमी से मर गया। और मरे बाद उसके कमरे को ऑक्सीजन से भर दिया गया हो। पूछ रही है निर्भया की आत्मा, आखिर क्यों??? क्या इस क्यों का जवाब है हमारे पास....तुम्हारे पास....किसी के पास...नहीं ....नहीं न...तो सिर्फ ये कि बेटी हम शर्मिंदा हैं....तेरे कातिल अभी जिंदा हैं...

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