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खतम होती भारतीयता, जाने भी दो यारो...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
सोच रहा हूं क्या खाऊं। आजकल कुछ माह से भूख नहीं लग रही। पता नहीं क्यों। शायद इसलिए कि वैसे भी टमाटर भी अब कहां देशी रहे। देशी लहसुन की जगह चाइनीज़ लहसुन ने ले ली है। देशी भुट्टे देखे बहुत दिन हो गए पीपल के पेड़ की तरह। तहसील चौराहे पर बरगद हुआ करता था। शहरीकरण के चलते काट दिया गया। अब हर घरों के सामने कैक्टस, पॉम्स आदि किस्म के अंग्रेजी पौधे नजर आते हैं। ये गुलमोहर कहां का है? आजकल बहुत कम दिखाई देता है।
 
कहीं सुनने में आया था कि बकरा और मुर्गा खाने के अतिप्रचलन के चलते अब पुराने देशी बकरों और मुर्गों की नस्ल लगभग खत्म हो चली है। मीनार है, दिनार है या अन्य कोई। मछलियां पकड़ने वाले आजकल समुद्र में दूर तक जाते हैं। तालाब और नदियों की मछलियों में विदेशी नस्ल को तैराया गया है। सफेद रंग और लाल मुंह के सूअर गलियों में घूमते रहते हैं। बेचारे भारतीय सूअरों का अस्तित्व संकट में है। धीरे-धीरे देशी खत्म। देशी तो अब दारू ही मिलती है, हालांकि वह भी नकली।
 
वे गलियां और वे चौबारे जिसे गांव में सेरी और चौपाल भी कहते हैं, अब तो फव्वारेदार सर्कल हैं। सीमेंट की तपती सड़कें हैं। प्लास्टिक के वृक्ष हैं। अब किसी घर से हींग, तेजपान पत्ता या केसर की सुगंध नहीं आती। एसेंस है। वेनिला है। शोर भी अब देशी कहां रहा? अंग्रेजी स्टाइल में शोर होता है। न चिट्टी आई, न पत्री आई और न आया टेलीग्राम... सीताराम... सीताराम... सीताराम... सीताराम...। अब तो मेल, वॉट्सएप ये एफबी पोस्ट आया है। खोलो मोबाइल और जुड़ जाओ स्काइप से।
 
ओह... इन अखबारों के शब्दों को क्या हुआ। पता ही नहीं चला। ये भी धीरे-धीरे... टीवी, फिल्म से अब अखबार भी!!! इसका मतलब यह कि हमारी सोच भी अब देशी नहीं रही। कुछ लोग चाहते हैं कि हम में अरबों का खून दौड़े...। वे ऐसा क्यूं चाहते हैं? कुछ लोग चाहते हैं कि हम में अंग्रेजों का खून दौड़े...। पूछो कि वे ऐसा क्यूं चाहते हैं? क्या भविष्य में वीर्य आयातित होगा?
 
क्या इन हिन्दुओं को यह नहीं मालूम कि हम भारतीय हैं? और पूछो इन मुसलमानों से कि तुम कब से अरबी हो गए? हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक हमारा रंग न तो अंग्रेजों जैसा है, न अरबों जैसा और न ही हम चाइनीज लगते हैं। चाइनीज को अपने चाइनी होने में कोई ऐतराज नहीं। अरब के शेख को अरबी होने पर गर्व है। अंग्रेज तो पैदाइशी ही गर्व से भरा-ठूंसा रहता है। आखिर क्या हो गया इन भारतीयों को? हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और बौद्ध में बंटे भारतीयों के बीच शायद अब अरबी, अमेरिकी, ब्रिटेनी, जापानी और चाइनीज मिलकर भारत में नया बाजार तलाश रहे हैं।
 
देशी मछलियों से वैसे भी हम भारतीयों का जी उचट गया है, क्योंकि ये मछलियां अंग्रेजों के सपने देखने लगी हैं। सोचता हूं कि एक परमाणु बम मेरे हाथ में होता तो क्या होता? मैं कतई अश्वत्थामा नहीं बनता लेकिन... जाने भी दो यारो। फिर मिलेंगे।

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