मोटिवेशनल : दत्तात्रेय के 24 गुरुओं से आप भी ले सकते हैं प्रेरणा, जानिए प्राचीन सीख की प्रासंगिकता

प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति एवं आधुनिक भारतीय समाज में इसकी प्रासंगिकता
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र की एक आत्मा होती है। इंग्लैंड की आत्मा साम्राज्य है, अमेरिका की आत्मा वैभव है, फ्रांस की आत्मा फैशन है, जापान की आत्मा तकनीक है... लेकिन भारत की आत्मा ‘ज्ञान’ है। ज्ञान अजर-अमर तत्व है। गीता (4/38) में भी कहा गया है कि इस सम्पूर्ण सृष्टि में ज्ञान समान पवित्र अन्य कुछ नहीं है। अतः भारत में ज्ञान की उपासना और ज्ञानार्जन को सर्वोच्च महत्व दिया गया है और ज्ञान से रहित व्यक्ति को पशु के समान बताया गया है।

शिक्षा, ज्ञान और बुद्धि जैसे आधारभूत तत्व मूल रूप से विद्या के अंतर्गत आते हैं। विद्या शब्द की उत्पत्ति ही ‘विद्’ से हुई है जिसका अर्थ है ज्ञान प्राप्त करना। भारत में ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा मात्र इसलिए नहीं की जाती क्योंकि वे ज्ञान की देवी हैं अपितु उनकी पूजा इसलिए भी होती है क्योंकि वे स्वरों की देवी होने के बाद भी, सतत वीणा पर अभ्यास करती रहती हैं। इससे सिद्ध होता है कि भारत में ज्ञानार्जन के साथ-साथ ज्ञान की पुनरावृत्ति को भी हमेशा से विशेष महत्व दिया गया है।
वर्तमान दौर में लगातार शिक्षा का स्वरूप बदलता जा रहा है। विद्यार्थी शिक्षित तो हो रहा है पर दीक्षित नहीं, क्योंकि वह अपनी मूल शिक्षा से दूर हो, केवल व्यावसायिक शिक्षा पद्धति को अपना रहा है। शायद यही कारण है कि वह अपने शिष्यत्व को खोता जा रहा है जिससे उसमें जिज्ञासु और आभारी भाव गौण हो चला है। गौरतलब है कि प्राचीन भारत में शिक्षा के सर्वोच्च स्रोत वेद-वेदांग उपनिषद, आदि माने गए हैं जिनकी शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी। गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति के कारण ही देश में अनेक असाधारण विद्वान हुए। स्वामी दयानंद ने गुरुकुल के संबंध में कहा है कि – ‘गुरुकुलशिक्षाया ब्रह्मचर्य प्राणभूतम, धार्मिकता तस्याः शरीरम् राष्ट्रीयता च तस्याः सौन्दर्यम्’, अर्थात् गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का प्राण तत्व ब्रम्हचर्य है, इसका शरीर धार्मिकता है एवं इसका सौन्दर्य राष्ट्रीयता है। इसका आशय यह, कि गुरुकुलों में छात्रों का मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास सम्यक रूप से होता था। मनुष्य के लिए यह उचित था कि वह येन-केन प्रकारेण शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रयत्न करे। इस हेतु सभी ज्ञानेन्द्रियों से सतत ज्ञानार्जन करने का निर्देश दिया गया था। श्रीमद् भागवत के एक प्रसंग में भी यह सिद्ध होता है कि शिक्षा प्राप्ति किसी भी साधन से हो, उसमें संकोच नहीं करना चाहिए।

इस प्रसंग में अत्रि और अनुसूया के पुत्र, विष्णु के अंश से अवतीर्ण, वतर्मान में महाराष्ट्र के अर्णा गाँव के निकट स्थित अत्रि आश्रम में जन्मे अवधूत दत्तात्रेयजी का वर्णन आता है। श्रीमद् भागवत में धार्मिक राजा यदु के वृतांत से दत्तात्रेय जी के शिक्षा ग्रहण का उल्लेख मिलता है, जो यह शिक्षा देता है कि अपने चरित्र के निर्माण के लिए शिक्षा ग्रहण के क्षेत्र को संकीर्ण नहीं बनाना चाहिए। चेतन प्राणियों में या स्थावर जगत में यदि थोड़ी भी अच्छाइयां हो तो उन्हें ग्रहण करना चाहिए और जो बुराइयों से दूर रहना चाहिए। आइए, जानते हैं इस कहानी के बारे में...
एक बार धार्मिक राजा यदु ने एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राम्हण को निर्भय रूप से विचरण करते देखा और उनसे उनकी निपुण बुद्धि के स्रोत की जानकारी चाही। उन अवधूत ब्रह्मवेत्ता दत्तात्रेयजी ने कहा कि राजन्, मैंने अपनी बुद्धि से गुरुओं का आश्रय लिया है। उनसे शिक्षा ग्रहण करके मैं इस जगत् में मुक्त भाव से स्वछन्द विचरण करता हूँ। इसके पश्चात दत्तात्रेय ने अपने 24 गुरुओं के नाम गिनाते हुए कहा कि
पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्निचन्द्रमा रविः ।

कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद गजः ॥
मधुहा हरिणो मीनः पिड्गला कुररोऽर्भकः ।
कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ॥
एते मे गुरवो राजंश्चतुर्विंशतिराश्रिताः।
शिक्षावृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षामिहात्मनः ॥
( श्रीमद् भा. 11 /7, 33)
अर्थात् हे राजन, मैंने पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र पतंग, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हिरण, मछली, पिंगलावैश्या, कुररपक्षी, बालक, कुंवारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट - इन 24 गुरुओं का आश्रय लिया है और इन्हीं के आश्रय से इस लोक में अपने लिए शिक्षा ग्रहण की है।

दत्तात्रेय जी द्वारा बताए गए इन 24 गुरुओं से ली गई शिक्षा भारत के संपूर्ण शिक्षा दर्शन की व्यापकता और उसके सारभूत तत्व का आज भी प्रतिनिधित्व करती हैं, और हमें बताती हैं कि हमारी मूल शिक्षा पद्धति ‘प्राकृतिक’ ही है – बस आज उसका स्वरुप बदल गया है। ये हैं वे सीखें:
•पृथ्वी से धैर्य और क्षमा की शिक्षा: मनुष्यों द्वारा पृथ्वी पर अनेक प्रकार के उत्पात किए जाते हैं लेकिन पृथ्वी इसकी प्रतिक्रिया में कदाचित व्याकुल नहीं होती। इसलिए धैर्यवान मनुष्य आक्रमणकारी के प्रति भी धैर्यवान रहते हैं और मात्र दूसरों के हित में सोचते हैं।

•वायु से संतुष्टि: शरीर में स्थित प्राणवायु आहार की इच्छा रखती है और उसे पाकर संतुष्ट हो जाती है। उसी प्रकार हमें उतना ही भोजन करना चाहिए, जितने से जीवन निर्वाह हो जाए। शरीर के बाहर रहने वाली वायु से यह शिक्षा मिलती है कि वायु कहीं भी भ्रमण करे लेकिन उसमें आसक्त नहीं होती है। वायु गंध को वहन करती है लेकिन फिर भी वायु तो शुद्ध ही होती है। इसी प्रकार पार्थिव शरीर से संबंध होने तक व्यक्ति को विभिन्न पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है लेकिन आत्मदर्शी मनुष्य इस पीड़ा से रहता है।

•आकाश से स्थिरता: अनेक प्रकार की वायुमंडलीय परिस्थितियों के बावजूद भी आकाश इनसे अछूता रहता है। इसी प्रकार लगातार सृष्टि और प्रलय होते रहते हैं, लेकिन मनुष्य उनसे आत्मरूप में स्थिर होकर अचल रहना चाहिए।

•जल से पवित्रता: तीर्थों में प्रवाहित जल प्रकृति ने पवित्र और निश्छल होता है, और इसके दर्शन, स्पर्श और यहां तक कि नाम के उच्चारण से भी मनुष्य पवित्र होते हैं उसी प्रकार मनुष्य का स्वभाव शुद्ध, पवित्र, मधुर और लोकपावन होना चाहिए, जिनके संपर्क में आने मात्र से व्यक्ति को शांति प्राप्त हो।

•अग्नि से निर्लिप्तता: अग्नि तेजस्वी और ज्योतिर्मय होती है। उसे संग्रहित नहीं किया जा सकता और वह सर्वभक्षी होने के बाद भी निर्लिप्त है। इसी प्रकार मनुष्य ने संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त होना चाहिए। अग्नि किसी दिशा से उत्पन्न हो लेकिन वह ऊपर की ओर ही उठती है, इसी प्रकार, हमारे जीवन में कितनी भी समस्याएं आएं, हम उनका समाधान खोजकर उससे उभर कर, सीख ले कर ही आगे बढ़ते हैं।
•चन्द्र से अविचलता: काल के प्रभाव से चंद्रमा की कलाओं में परिवर्तन होता रहता है लेकिन वास्तव में चंद्रमा न घटता है, न बढ़ता है। उसी प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य की जितनी भी अवस्थाएँ है, वे सब दैहिक हैं। आत्मा तो सदैव समरूप है। मनुष्य ने इन दुःखों और कष्टों से अविचलित रहकर आत्मा तत्वों में रमण करना चाहिए।

•सूर्य से अनुकूलता: सूरज अपनी किरणों से जल खींचता है और समुचित समय पर उसे बरसा देता है। उसी प्रकार आवश्यक है कि हम इंद्रियों के द्वारा समय के अनुकूल विषयों का ग्रहण और उत्सर्जन करें, किन्तु बिना आसक्ति।

•कबूतरों से मोह का अन्धकार: एक बार, एक कबूतर का जोड़ा अपने बच्चों को घोंसले में छोड़कर दाने की तलाश में गया। जब कबूतर लौटे तो उन्होंने देखा कि उनको बच्चों को एक शिकारी ने जाल में फंसा लिया है। बच्चों के स्नेह में अंधा होकर कबूतरनी ने भी अपने आप को जाल में जानबूझकर फंसा दिया और फिर पत्नी के स्नेह में कबूतर भी फंस गया। मोह के अंधकार के कारण कबूतर दंपत्ति नष्ट हो गए। मनुष्य कई बार अपने घर-गृहस्थी के जाल में फंसकर सुरक्षित स्थिति प्राप्त होते हुए भी पतित हो जाते हैं। अत्यंत स्नेह बुद्धि की स्वतंत्रता विलुप्त कर देती है।
•अजगर से निर्मोही होना: बुद्धिमान मनुष्य ने अजगर के समान बिना मांगे, स्वतः ही जो कुछ मिल जाए चाहे वह रूखा सूखा हो, चाहे बहुत मधुर या स्वादिष्ट हो, चाहे अधिक हो या कम हो, उसे खाकर अपना जीवन निर्वाह करना चाहिए, क्योंकि पूर्वानुसार सुख और दुख की प्राप्ति सामान्य रूप से होती रहती है।

•समुद्र से असीम स्थिरता: समुद्र सदैव प्रसन्न, गंभीर, अथाह, अपार और असीम होता है। भारी वर्षा के बाद भी समुद्र वर्षा ऋतु में बढ़ता नहीं और भयंकर गर्मी में भी समुद्र घटता नहीं। उसी प्रकार मनुष्य को सांसरिक पदार्थ मिले या न मिले, प्रसन्न या उदास नहीं होना चाहिए।
•पतंगे से सावधानी: पतंगा दीपक के रूप पर मोहित होकर आग में जल जाता है, वैसे ही अपनी इन्द्रियों का वश में न रखने वाला मनुष्य अंधकार में गिरकर नष्ट हो जाता है।

•मधुमक्खी से लालसा का त्याग: मधुमक्खी की यह विशेषता होती है कि वह सभी प्रकार के पुष्पों से सार ग्रहण करती है – चाहे पुष्प छोटा हो या बड़ा। इसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य ने छोटे-बड़े सभी से सारतत्व से ग्रहण करना चाहिए। साथ ही मनुष्य ने मधुमक्खी के समान संग्रही नही होना चाहिए अन्यथा उसका संग्रहित धन उसके जीवन के साथ उसके जीवन के साथ नष्ट हो जाता है।
•हाथी से भ्रम से मुक्ति: शिकारी हाथियों के कुल में से किसी एक हाथी को जाल में या गड्ढे में फंसा देते हैं, जिससे अन्य हाथी मोह में पड़कर स्वयं को भी बंधन में डाल देते हैं। उसी प्रकार मनुष्य में स्वजनों के मोह या मोहजनित भ्रम से बचना चाहिए। यही बंधन का कारण बन जाता है।

•शहद निकालने वाले से लोभ का त्याग: लोग बड़ी कठिनाई से धन संग्रह अवश्य करते हैं लेकिन वे उसका उपयोग नहीं कर पाते। मधुमक्खियां बड़े परिश्रम से शहद एकत्र करती है लेकिन मधुहारी अर्थात् शहद निकालने वाला मधुमक्खी के उपभोग के पहले ही उसे निकाल लेता है और वह स्वयं भी उसका उपभोग करने के स्थान पर धन के लोभ में उसे अन्य व्यक्तियों को बेच देता है। लोभ और संग्रह की वृत्ति से मोहग्रस्त व्यक्ति भी स्वयं के कष्ट के द्वारा अर्जित और एकत्रित धन का उपभोग नहीं कर पाते।
•हिरण से आकर्षण का त्याग: कुशल शिकारी गीत गाकर या वाद्य यंत्र बजाकर हिरण को मोहित कर लेता है और उसे जाल में फंसा लेता है। मनुष्य ने श्रुति मधुर, विषय वासना की ओर प्रवृत्त करने वाले गीत, नृत्य, नाद, वचन या शब्द से विरक्त रहना चाहिए अन्यथा वह बंधन और नाश का कारण बन जाता है।

•मछली से संयम: बांस में लगे हुए मांस के टुकड़े के लोभ से मछली अपने प्राण गंवा देती है। उसी प्रकार स्वाद का लोभी मनुष्य भी अपनी जिह्वा के वश में प्राण गंवा देता है। विवेकशील मनुष्य वह है जो अपनी जिह्वा को वश में रखता है।
•पिंगला से निराशा पर नियंत्रण: पिंगला नामक वैश्या को अपने व्यवसाय में निराशा होने पर वैराग्य उत्पन्न हो गया था। उसने एक गीत गाया था, जिसका अर्थ यह था कि मनुष्य आशा की फांसी पर लटक रहा है। इसे तलवार के समान काटने वाली कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है। कभी-कभी निराशा भी वैराग्य का कारण बन जाती है। दत्तात्रेयजी ने कहा कि ‘आशा हि परमं दुःखं, नैराश्यं परमं सुखम्’ ।। (श्रीमद् भागवत् 11/8/44)।

•कुरर पक्षी से प्रिय वस्तु का त्याग: कुरर नामक पक्षी एक मांस का टुकड़ा लेकर उड़ा। उस टुकड़े को लेने अनेक पक्षी कुर को ही मारने के लिए तैयार हो गए। कुरर ने टुकड़ा जमीन पर गिरा दिया तो सभी पक्षी उस टुकड़े की और दौड़ पड़े और कुरर मुक्त भाव से आसमान में उड़ गया। प्रिय वस्तु का संग्रह दुःख का कारण है। बुद्धिमान मनुष्य वह है जो अनन्त सुख स्वरूप आत्म तत्व की प्राप्ति के लिए त्याग कर के सुखी हो जाए। त्याग और अपरिग्रह से ही निश्चिंतता आती है।

•बालक से निश्छलता: बालकों का स्वभाव होता है कि वे मान-अपमान का ध्यान नहीं रखते। घर और परिवार की चिन्ता से रहित होते हैं और आत्मरागी होते हैं। संसार में दो ही प्रकार के व्यक्ति सुखी हो सकते हैं- भोलाभाला बालक तथा गुणातीत मनुष्य।

•कन्या से एकांत का सुख: एक घर में कुंवारी कन्या थी। घर वाले कहीं बाहर गए हुए थे। उस समय कन्या को देखने वर पक्ष के लोग आए। कन्या उस समय घर में धान कूट रही थी और उसके हाथ में बहुत सी चूड़ियां थी, जो आवाज़ कर रही थीं। उसने विचार किया कि अतिथियों के आने के समय इस प्रकार की आवाज आना उचित नहीं है। अतः उसने केवल एक-एक चूड़ी पहनकर धान कूटा। जहां अनेक लोग रहते हैं वहां कलह स्वाभाविक है। एकांत में ही सुख प्राप्त होता है।
•बाण बनाने वाले से लक्ष्यप्राप्ति: एक बाण बनाने वाला बड़े ध्यान से बाण बना रहा था। उसके सामने से राजा की सवारी निकल गई लेकिन वह अपने कर्म में इतना लीन था कि उसका ध्यान ही नहीं गया। अभ्यास के द्वारा अपने मन को वश में करके सावधानी से हमें मात्र लक्ष्य की ओर केन्द्रित करना चाहिए।

•सर्प से अकेलेपन की शक्ति: सर्प अकेले ही विचरण करता है। न मण्डली बनाता है न मठ। वह अकेले गुफा में रहता है, न सहायता मांगता है न बोलता है। जो मनुष्य बहुत कम बोले, जहाँ भी स्थान मिले वहीं आराम करे और अकेलेपन में सुखी रहे, उससे शक्तिशाली कोई नहीं।
•मकड़ी से सत्य: मकड़ी अपने मुंह से जाल बनाती है, उसमें रहती है और पुनः उसे खा लेती है। जीवन का सत्य यही है और यही प्रकृति है। इसी से सृष्टि में कर्ता, धर्ता एवं हर्ता हैं। सत्य यही है।

•भृंगी कीट से एकाग्रता: भृंगी नामक कीड़े की विशेषता होती है कि वह अन्य कीट को ले जाकर दीवार पर अपने रहने की जगह में बंद कर देता है और वह कीड़ा भय से उसी का चिन्तन करते-करते शरीर का त्याग किए बिना उसी शरीर से तदरूप हो जाता है। अर्थात् यदि प्राणी स्नेह से, द्वेष से या भय से भी जानबूझकर एकाग्र रूप में अपना मन किसी में लगा दे, तो उसे उसी वस्तु का स्वरूप प्राप्त हो जाता है।
दत्तात्रेयजी ने उपर्युक्त 24 गुरुओं का वर्णन करने के पश्चात राजा से कहा कि केवल गुरु से यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता। उसके लिए अपनी बुद्धि से भी बहुत कुछ सोचने, समझने की आवश्यकता होती है।
इन 24 गुरुओं के उदाहरण से भारतीय शिक्षा का यह आधारभूत दर्शन सामने आता है कि हम यदि उन्मुक्त भाव से शिक्षा ग्रहण करें तो छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे, सभी स्त्रोतों से ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए बस ज़रूरी है उन्मुक्त भाव, पूर्वाग्रह से मुक्ति, और शुद्ध दृष्टि। प्राचीन भारत का शिक्षा का यह मूलभूत दर्शन विश्व के किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था के दर्शन के लिए आधारभूत तत्व का निर्माण करता है।
शिक्षा का स्पष्ट विवेचन कठोपनिषद् में किया गया था जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को सच्चा और स्वस्थ नागरिक बनना चाहिए तथा सत्य का उपासक होना चाहिए। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया कि शिक्षा का उद्देश्य मस्तिष्क में ग्रन्थों का भरकर रखना नहीं है, अपितु उससे ज्ञान प्राप्त करना है।

आधुनिक युग में जिस प्रकार धर्म का पर्यायवाची शब्द Religion लिया जाता है, उसी प्रकार शिक्षा का पर्यायवाची शब्द Education लिया जाने लगा है। ये दोनों अनुवाद सत्य नहीं है। Education शब्द का अर्थ है - नियमबद्ध ऐसी पढ़ाई जिससे जीवन के किसी विशेष कार्य में भाग ले सके, वहीं शिक्षा का अर्थ है सीखना, अध्ययन करना, ज्ञान प्राप्त करना और किसी कला में निपुणता होना।

मुण्डकोपनिषद् में शिक्षित उसे बताया गया है जिसमें मानवता, विनम्रता और अप्रगल्भता हो। शिक्षित का अर्थ क्षेत्रज्ञ, विज्ञ और प्रवीण होता है। शिक्षा शब्द जिस धातु से बना है उसका अर्थ ही देना होता है। भारतीय शिक्षा दर्शन का यह उच्च आदर्श आज भी पश्चिम के देशों द्वारा प्राप्त किया जाना शेष है। भारत में शिक्षा की निष्पत्ति मनुष्य के अखण्ड व्यक्तित्व का निर्माण करना बताई गई है। इस दृष्टि से भारत का शिक्षा दर्शन परब्रम्ह स्वरूप बन जाता है।
डॉ. अनन्या मिश्र, मैनेजर – कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन्स



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