कांटे के मुकाबले में फंसी भोपाल सीट पर उम्मीदवारों को डरा रही है वोटरों की खामोशी

वेबदुनिया की ग्राउंड रिपोर्ट

विकास सिंह| पुनः संशोधित शुक्रवार, 10 मई 2019 (20:11 IST)
भोपाल। कांटे के मुकाबले में फंसी पर इस बार मुकाबला दो सियासी दलों के बीच ना होकर दो विचारधाराओं के बीच नजर आ रहा है। भाजपा ने भोपाल से हिंदुत्व के बड़े चेहरे साध्वी को चुनावी मैदान में उतारा तो कांग्रेस ने अपने सबसे बड़े चेहरे और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय को चुनावी मैदान में उतारकर इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई वाली सीट में बदल दिया।
दिग्विजय सोलह साल बाद एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं। सोलह साल पहले भाजपा की हिंदुत्व छवि वाली फायर ब्रांड नेता उमा भारती से चुनाव हारने के बाद दिग्विजय का मुकाबला फिर एक बार एक साध्वी से हो रहा है। साध्वी प्रज्ञा के चुनावी मैदान में आने के बाद पूरा मुकाबला ध्रुवीकरण की सियासत में बदल गया है। 1989 से बीजेपी के कब्जे वाली भोपाल लोकसभा सीट संघ के गढ़ के रूप में पहचानी जाती है।
पिछले 30 सालों से इस सीट को जीतने के लिए कांग्रेस ने जो भी दांव चला वह बेकार ही रहा है। इस बार इस सीट पर सिंह के उतरने से चुनावी मुकाबला दिलचस्प जरूर हुआ, लेकिन बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को चुनावी मैदान में उतारकर पेंच फंसा दिया। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर अपने हर रोड शो और चुनावी सभा में हिंदुत्व का मुद्दा जोर-शोर से उठाती रहीं। हिंदू आतंकवाद के मुद्दे पर वह दिग्विजय पर भगवा को बदनाम करने की साजिश रचने का आरोप लगाती हैं।

वहीं, पूरे चुनाव में इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर नजर आए। पूरा चुनाव विकास के विजन पर लड़ने वाले दिग्विजय प्रचार के आखिरी दिनों में कंप्यूटर बाबा के 'हठयोग' और साधु-संतों के रोड शो में होने के कारण चर्चा में रहे। वहीं चुनाव प्रचार के आखिरी दिन साध्वी प्रज्ञा की जीत के लिए सुंदरकांड का होना और उसमें खुद साध्वी का शामिल होना इस बात को साफ दर्शाता है कि जीत-हार का फैसला भी वोटों के ध्रुवीकरण पर निर्भर करेगा।
वरिष्ठ पत्रकार का नजरिया : भोपाल लोकसभा सीट के बारे में मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ला कहते हैं कि चुनाव प्रचार में भले ही दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों ने वोटरों को रिझाने की पूरी कोशिश की हो, लेकिन वोटिंग से ठीक पहले वोटर पूरी तरह खामोश हैं। जिससे अभी भी कुछ भी कह पाना मुश्किल है। दोनों उम्मीदवारों के बीच चुनावी मुकाबला कांटे का है और जीत-हार का अंतर भी बहुत अधिक नहीं होगा।
दिग्विजय और साध्वी प्रज्ञा दोनों ही बड़े चेहरे चुनावी मैदान में उतरे हैं इसलिए इस बार भोपाल लोकसभा सीट पूरे देश की निगाहों में है। शुक्ला कहते हैं कि इस बार भोपाल लोकसभा चुनाव में जनता से जुड़े मुद्दे पूरी तरह गायब रहे और पूरा चुनाव सांप्रदायिक और ध्रुवीकरण पर केंद्रित रहा जो कि लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

सीट का सियासी समीकरण : भोपाल लोकसभा सीट में भोपाल की सात विधानसभा सीट और सीहोर जिले की एक विधानसभा सीट आती है। पिछले साल दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भोपाल जिले की तीन सीटों पर कब्जा कर लिया, जिसमें हुजूर, गोविंदपुरा, नरेला, और बैरसिया पर भाजपा का कब्जा और भोपाल मध्य, भोपाल दक्षिण-पश्चिम, भोपाल उत्तर पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी।

भोपाल के जातिगत समीकरण की बात की जाए तो भोपाल के 5 लाख मुस्लिम वोटरों के अलावा ओबीसी वोटर 4 लाख, ब्राह्मण वोटर करीब 4 लाख, ठाकुर वोटर करीब 1 लाख 40 हजार और एससी-एसटी के करीब तीन लाख वोटर हैं।

इसके अलावा सिंधी मतदाताओं की संख्या भी करीब ढाई लाख से अधिक है, जो बीजेपी का वोटर माना जाता है। भोपाल लोकसभा मे 8 विधानसभा क्षेत्र आते हैं, इनमें से दो ग्रामीण इलाके हैं और से 6 शहरी क्षेत्र हैं। इनमें से तीन पर कांग्रेस का और पांच पर बीजेपी का कब्जा है।

2014 में मोदी लहर से बीजेपी ने यह सीट 3 लाख से अधिक वोटों से जीती थी और अब बीजेपी की परीक्षा अपनी बढ़त को बनाए रखने की है। अब देखना होगा भोपाल की जनता अपना मुस्तकबिल किसके हाथों में सौंपती है।
सीट का इतिहास : भोपाल में अब तक 16 बार लोकसभा चुनाव हुए हैं। यहां से सबसे ज्यादा बीजेपी के सुशील चंद्र वर्मा 4 बार सांसद रहे। 1952 से 1977 तक कांग्रेस का इस सीट पर कब्जा था। 1977 में जनता दल की लहर में मुस्लिम नेता आरिफ बेग चुनाव जीते थे।

1980 में शंकरदयाल शर्मा दोबारा चुनाव जीते। 1984 में कांग्रेस केएन प्रधान चुनाव जीते। 1989 से बीजेपी के कब्जे में आई इस सीट पर अब तक भगवा झंडा लहरा रहा है। 1999 में मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने यहां से भाजपा का परचम लहराया। वहीं 2004 से 2014 तक कैलाश जोशी सांसद रहे और 2014 में आलोक संजर ने तीन लाख से अधिक वोटों के साथ भोपाल सीट पर भाजपा का झंडा फहराया।

 

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