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Written By DW
Last Modified: बुधवार, 26 जून 2013 (14:12 IST)

आफत, दर्द और इंतजार का पहाड़

आफत, दर्द और इंतजार का पहाड़ -
PTI
उत्तराखंड में भारी वर्षा और भूस्खलन से हुई तबाही के बाद बाहर से आए यात्रियों को निकालने का काम युद्धस्तर पर हुआ है, लेकिन स्थानीय ग्रामीण बुरे हाल में है।

प्राकृतिक आपदाओं के पिछले डेढ़ सौ सालों के ज्ञात इतिहास में उत्तराखंड सबसे बड़ी त्रासदी का सामना कर रहा है। सबसे बड़ी इसलिए कि उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक एक साथ इतनी बड़ी आफत पहले कभी नहीं आयी। करीब 600 मौतों की पुष्टि राज्य सरकार के अधिकारी कर चुके हैं, लेकिन आशंका है कि यह आंकड़ा दो हजार से ऊपर जाएगा।

टिहरी के चोपड़ियाल गांव के डबराल परिवार की दास्तान दिल दहला देने वाली हैं। 10 सदस्यों का ये परिवार केदारनाथ की यात्रा पर था। 16 जून की रात दर्शन के बाद ये लोग रामबाड़ा के एक होटल में रुके थे। प्रलय की बाढ़ होटल ही बहा ले गयी। परिवार के नौ लोग बह गए। परिवार में एक महिला शशि डबराल ही किसी तरह जीवित बच पाई। पांच बड़े और चार बच्चे थे। इस महिला का पति, उसके बच्चे, सास ससुर, जेठ जेठानी और उनके बच्चे उस भीषण बाढ़ में बह गए।

शशि डबराल घायल है और उनका ऋषिकेश के पास जौलीग्रांट अस्पताल में इलाज चल रहा है। अपनी दास्तान सुनाते हुए उनका कहना था कि होटल का कमरा हिलने की आवाज आई, अचानक दीवारें गिर गईं और और पानी का सैलाब फूट आया। सब लोग बहने लगे। वो किसी चीज को पकड़ कर थोड़ा किनारे लग गईं। लेकिन आंखों के सामने सब बह गए। अगले दिन हेलीकाप्टर ने सीढ़ी डालकर उन्हें निकाला।

इस तरह की कई दास्तानें हैं जो उत्तराखंड में आई कुदरती आफत के बाद किसी तरह जीवित बच गए लोग सुना रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली से वसीम बेग अपने दोस्त अजय शुक्ला और उनकी पत्नी की तलाश में देहरादून में डटे हुए हैं। उनका कहना है कि वे दोस्त को ढूंढकर रहेंगे। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के राजशेखर मिश्र अपने मां पिता की खोज में भटक रहे हैं।

सहस्त्रधारा हैलीपेड पर जैसे ही कोई हेलीकॉप्टर उतरता है वो बेसब्री और व्याकुलता से नीचे उतरने वालों को देखते हैं। मां पिता नहीं दिखते तो दौड़कर वहां बैठे अधिकारियों के पास पहुंचते हैं। बिलख कर बताते हैं कि 16 जून की रात गौरीकुंड से मां का फोन आया था, कहती थीं बहुत बारिश है। तो मैंने कहा अच्छा ठीक है तुम रुक जाओ। बस उसके बाद कोई फोन नहीं आया कोई खबर नहीं आई। कहां जाऊं, क्या करूं।

उत्तराखंड की चार धाम यात्रा में बिहार, झारखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, तमिलनाड और कर्नाटक समेत कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं। अकेले केदारनाथ में इस साल एक दिन में करीब 14-15 हजार यात्री जा रहे थे। कई यात्री लापता हैं, उनकी खोज में उनके परिजन भटक रहे हैं और जिन्हें जीवित न रह पाने की सूचना मिल रही है वे डबडबाई आंखों और भारी मन के साथ अपने घरों को लौट रहे हैं।
जिन्हें सूचना नहीं मिल सकी है वे आस की बहुत नाजुक डोर के साथ यहां रुके हुए हैं। इस बीच दिन-रात लोगों को निकालने की कोशिश की जा रही है। सेना के ऑपरेशन सूर्या होप के तीसरे चरण के तहत पैदल मार्ग से लोगों को निकाला जा रहा है।

उधर एक बड़ी चुनौती राहत सामग्री पहुंचाने की बनी हुई है। देहरादून से बड़ी मात्रा में खाने पीने का सामान, दवाएं, ईंधन और केरोसीन तेल जा तो रहा है लेकिन कई ट्रक रास्ते में ही फंसे हुए हैं और कई जिला मुख्यालयों में ही जाकर अटक गए हैं। उनके वितरण को लेकर कोई सिस्टम मुस्तैदी से काम नहीं कर रहा है। इसकी एक वजह सरकारी मशीनरी की सुस्ती है, तो एक बड़ी वजह ये भी है कि प्रभावित इलाकों तक जाने वाले रास्ते टूट गए हैं। घोड़ों खच्चरों के जरिए भी सामान नहीं पहुंच पा रहा है।

इस बीच कुदरती आफत में मदद के लिए कई लोग आगे आए हैं। देश के दूसरे राज्यों की सरकारें तो आर्थिक मदद कर ही रही हैं, निजी कंपनियां भी आगे आई हैं। और कई संगठनों ने राहत कोष बनाए हैं। अमेरिकी दूतावास ने भी डेढ़ लाख डॉलर की फौरी मदद भेजी है। हिमालयी सूनामी कही जा रही इस आपदा को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों और संगठनों की मदद का अभी इंतजार है।

रिपोर्ट: शिवप्रसाद जोशी, देहरादून
संपादन: महेश झा