वाम दलों के सामने वजूद का संकट

left party in india
Last Updated: मंगलवार, 2 अप्रैल 2019 (18:33 IST)
लोकसभा चुनाव, एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता बरकरार रहने के भाजपा के दावे की हकीकत बताएगा, तो वहीं वामदलों सहित तमाम क्षेत्रीय दलों के सियासी वजूद का भविष्य भी इसी चुनाव से तय होगा।

आगामी लोकसभा चुनाव उत्तर से दक्षिण तक लगभग हर राज्य में बसपा, सपा जैसे तमाम क्षेत्रीय दलों के लिए सियासी फलक पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती बन कर सामने आया है। वहीं राष्ट्रीय पार्टियों में शुमार माकपा और भाकपा के लिए इस चुनाव में न सिर्फ अपने संख्या बल को बढ़ाने बल्कि अपनी विचारधारा को बचाने की भी चुनौती है। संख्या बल के लिहाज से वामदल संसद में अपने न्यूनतम स्तर पर हैं और राज्य विधासभाओं में पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की सत्ता गंवाने के बाद वामदल अब सिर्फ केरल में ही सिमट कर रह गए हैं। ऐसे में अपने राजनीतिक सफर के सबसे मुश्किल भरे दौर से गुजर रहे वामदलों के लिए लोकसभा चुनाव में सियासी साख बचाने की चुनौती दिनों दिन बड़ी होती जा रही है।

वाम दलों की रणनीति
वाम दलों ने मोदी सरकार को भारत की साझी सांस्कृतिक विरासत के लिए खतरा बताकर समूचे विपक्ष को एकजुट करने की निर्णायक पहल शुरू की। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और भाकपा महासचिव एस सुधाकर रेड्डी का स्पष्ट मानना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में स्थानीय हित एवं वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर समूचे विपक्ष का एकजुट होना ही एकमात्र रास्ता है। येचुरी इसे विपक्ष के लिए वजूद का संकट बचाने की मजबूरी नहीं, बल्कि मोदी सरकार से उपजे राष्ट्रीय अस्मिता के संकट से देश को बचाने का सूत्र मानते हैं। उनका कहना है कि इस संकट की गंभीरता को समझ कर ही सपा, बसपा जैसे 'नैसर्गिक शत्रु' भी चुनावी गठबंधन करने को रजामंद हुए हैं।

यह सही है कि वामदलों ने परस्पर विरोध की राजनीति पर चलने वाले क्षेत्रीय दलों को मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन यह भी सच है कि पिछले पांच साल में भाजपा के तमाम राज्यों में सत्तारूढ़ होने से इन दलों के लिए उपजे वजूद के संकट ने भी विपक्ष को एकजुट होने की मजबूरी का अहसास कराया है।


का उतार-चढ़ाव भरा सफर
भारत में वामपंथ के राजनीति सफर के उतार-चढ़ाव को दो कालखंड में बांट कर समझना आसान होगा। पहला आजादी के बाद भारत में जनवादी आंदोलनों से शुरू हुआ वामपंथ का राजनीतिक सफर और दूसरा 1990 के दशक में नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के साथ वामपंथ के लाल सलाम की हुंकार का कमजोर पड़ना।

पहले लोकसभा चुनाव में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी ने जहां 16 सीटें जीती थीं वहीं 2004 में गठित 14वीं लोकसभा में वाम दलों की ताकत 61 तक पहुंच गई। उस सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के महज दस साल के भीतर ही वाम दल पिछले चुनाव में महज नौ सीटों पर सिमट गए। लोकसभा में वाम दलों की यह न्यूनतम सदस्य संख्या है।


लेकिन इस पतन से पहले वाम दलों के नाम कुछ उपलब्धियां भी हैं। सन 1957 में वामपंथियों ने पहली बार केरल में विधानसभा चुनाव जीता था। ये पहला मौका था जब दुनिया में कोई भी कम्युनिस्ट सरकार मतदान द्वारा चुनकर सत्ता में आई थीं। इसके बाद 1977 में वामदलों का पश्चिम बंगाल में जीत के साथ सत्ता पर 35 साल तक काबिज रहने का सफर शुरू हुआ। इसी दौरान केरल और त्रिपुरा वामपंथ के मजबूत गढ़ भी बने। राज्यों में मजबूत राजनीतिक पकड़ के बूते वाम दल भारतीय संसद के दोनों सदनों में छह दशक तक अपनी मजबूत आवाज से केंद्र सरकार को भी समय-समय पर हलकान करते रहे।

लेकिन दुनिया के तमाम देशों की तरह भारत में भी आर्थिक सुधारों के प्रति वामपंथियों का मुखर विरोध लोगों को लंबे समय तक रास नहीं आया। वाम शासन के दौरान कोलकाता और पश्चिम बंगाल ने हड़तालों का अभूतपूर्व दौर देखा। कभी भारत के समृद्ध राज्यों में गिना जाने वाला पश्चिम बंगाल खस्ताहाल होता गया। बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच पश्चिम बंगाल में वामदलों ने टाटा को गले लगाया और पश्चिम बंगाल के बाहर निजी कंपनियों का विरोध किया।

लोगों ने वामपंथियों की इस दोहरी नीति को नकार दिया। नतीजतन संसद से लेकर सड़क तक वामपंथ की आवाज ऐसी कमजोर पड़ी कि 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होने के बाद वाम दल संसद में महज नौ सीटों तक सिमट गए। फिर 2016 में त्रिपुरा की सत्ता से भी बाहर हुए वाम दलों के लिए अब अपनी विचारधारा, पहचान और पकड़ बनाए रखना भी मुश्किल हो गया है।


भारत में चुनाव सुधार से जुड़ी अग्रणी शोध संस्था एडीआर के संस्थापक सदस्य प्रो. जगदीप छोकर का कहना है कि वाम दल चुनावी दौड़ में संख्या बल के आधार पर भले ही पिछड़ गए हों लेकिन वामपंथी विचारधारा से समझौता नहीं करना इसका मजबूत पक्ष है। यह सही है कि बदलते समय के साथ विचारधारा को भी प्रगतिशील मानते हुए खुद को बदलने की व्यवहारिक जरूरत को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

सामंजस्य पर टिकी आगे की राह
माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य बृंदा करात के मुताबिक इस चुनाव में वामदलों ने अपने चुनाव अभियान के तीन प्रमुख लक्ष्य रखे हैं। पहला, सांप्रदायिकता से देश को मुक्ति दिलाने के लिए भाजपा को चुनाव में शिकस्त देना, दूसरा संख्या बल में वाम दलों को संसद में मजबूत करना और तीसरा देश में वैकल्पिक नीति वाली धर्म निरपेक्ष सरकार बनाना।

उनका मानना है कि यह लक्ष्य अन्य विपक्षी दलों के साथ सामंजस्य कायम करके ही हासिल किए जा सकते हैं। हालांकि राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी गठबंधन की वामदलों की पहल को कारगर बनाने में कांग्रेस के बाधक बनने से वामपंथी नेता क्षुब्ध हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार और अब केरल में गठबंधन से वामदलों को कांग्रेस द्वारा बाहर रखने से नारज सुधाकर रेड्डी ने तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही सवाल उठा दिया है। येचुरी और करात ने भी कांग्रेस के अड़ियल रुख को विपक्ष की एकता के लिए घातक बताया है।

कुल मिला कर वामदलों के लिए मौजूदा दौर का संघर्ष दोधारी तलवार पर चलने से कम नहीं है। एक तरफ चुनावी दौड़ में पिछड़ने के बाद वामदलों के संख्या बल को बढ़ाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ दक्षिणपंथ की पोषक भाजपा से विचारधारा का संघर्ष है।


इसके अलावा माकपा और भाकपा, दोनों दलों में इंद्रजीत गुप्ता, सोमनाथ चटर्जी, एबी बर्धन और हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे पिछली पीढ़ी के करिश्माई नेताओं की कमी, आपसी गुटबंदी और नौजवानों को जोड़ने वाले युवा नेतृत्व के लिए अत्यंत सीमित विकल्पों की मौजूदगी भी गंभीर चुनौती हैं। ऐसे में तमाम अंतर्द्वंद्व से घिरे वामदलों के लिए विपक्षी दलों के साथ सामंजस्य कायम कर फिलहाल विधायिका में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना ही वर्तमान चुनौती का फौरी समाधान है।

रिपोर्ट निर्मल यादव


 

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