अगले तीस वर्षों में तीन गुना ज्यादा बढ़ सकते हैं डिमेंशिया के मरीज

DW| Last Updated: सोमवार, 17 जनवरी 2022 (08:30 IST)
रिपोर्ट : चार्ली एलन शील्ड

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 3 दशक में भूलने की बीमारी यानी डिमेंशिया के मामलों में 3 गुना तक बढ़ सकते है। डिमेंशिया के शुरुआती लक्षणों की पहचान कैसे होगी और इससे बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

डिमेंशिया की पहचान एक भयानक सपने के सच होने जैसा है। पीड़ित व्यक्ति गंभीरता से सोचने, याद रखने और तर्क करने की क्षमता खो देते हैं जिसकी वजह से दैनिक जीवन का चलना मुश्किल हो जाता है। वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने, संवाद और दैनिक कामों के लिए संघर्ष करते हैं। यह दुर्बल करने वाली बीमारी है और इसके बारे में समझ बहुत ज्यादा नहीं है।

'द लैंसेट जर्नल' में छपे एक नए रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, अगले 3 दशक में डिमेंशिया से पीड़ित लोगों की संख्या 3 गुनी हो जाएगी। यानी साल 2050 तक डिमेंशिया से पीड़ित लोगों की संख्या 5.7 करोड़ से बढ़कर 15.2 करोड़ से अधिक हो जाएगी।

हालांकि यह एक गंभीर भविष्यवाणी है। डिमेंशिया का खतरा कई चीजों से होता है हालांकि ये चीजें बदली जा सकती हैं। इसका मतलब है कि व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव कर उसमें डिमेंशिया के विकास की संभावनाओं को प्रभावित किया जा सकता है।

तो, हम इस गंभीर स्थिति से बचने के लिए क्या कर सकते हैं? इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, जोखिम बढ़ाने वाले इन कारकों पर विचार करें:

डिमेंशिया कोई खास बीमारी नहीं है। यह एक सामान्य शब्द है जिसका उपयोग न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी के नवीनतम चरण का वर्णन करने के लिए किया जाता है। यानी जब व्यवहार में आए परिवर्तनों को बदलने में बहुत देर हो जाती है।

हालांकि, डिमेंशिया की वजह बनने वाले तमाम कारक फिर भी इतने सक्रिय नहीं होंगे कि उससे कोई नुकसान हो। जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर न्यूरोडीजेनेरेटिव डिजीज की डिमेंशिया विशेषज्ञ मरीना बोकार्डी कहती हैं कि इनमें से कुछ को बदला जा सकता है और अपने जीवन जीने के तरीके में बदलाव के जरिए कई कारकों को रोका जा सकता है।

डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, 'यदि हम प्रतिवर्ती स्थितियों को ठीक करने का मौका चूक जाते हैं तो वे डिमेंशिया का कारण बन सकते हैं।'

यह ठीक से पता लगाना मुश्किल है कि डिमेंशिया की वजह बनने वाले न्यूरोलॉजिकल क्षति का कारण क्या है। वैज्ञानिकों ने कई कारकों की पहचान की है जिनसे डिमेंशिया होने की आशंका होती है। डिमेंशिया रोकथाम पर लैंसेट आयोग ने 12 मुख्य जोखिमों को सूचीबद्ध किया है- शिक्षा का निम्न स्तर, उच्च रक्तचाप, सुनने की क्षमता में कमी, धूम्रपान, मोटापा, अवसाद, शारीरिक गतिविधि की कमी, मधुमेह और कम सामाजिक संपर्क। इसके अलावा अत्यधिक शराब का सेवन, मस्तिष्क की गहरी चोटें और वायु प्रदूषण। हाल के शोध ने यौन हमले और डिमेंशिया के बीच एक कड़ी को भी उजागर किया है।

बोकार्डी कहती हैं कि अच्छी खबर यह है कि इन जोखिमों में से अधिकांश को व्यवहार में बदलाव के माध्यम से कम किया जा सकता है। वो कहती हैं, 'यदि हम व्यक्तिगत रूप से या हमारी सरकारें इन जोखिम कारकों को कम करने के लिए कुछ ठोस काम करती हैं, तो हम डिमेंशिया के कम से कम 40 फीसदी मामलों को रोक सकते हैं।'

तो, हम डिमेंशिया से कैसे बच सकते हैं?

शोध के मुताबिक कई जोखिम शारीरिक, सामाजिक और मानसिक गतिविधियों में कमी की वजह से भी उत्पन्न होते हैं।

नियमित व्यायाम और स्वस्थ आहार जैसे, चीनी और वसा में कमी, धूम्रपान और अधिक शराब पीना रोक कर मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अवसाद से जुड़े जोखिमों को कम किया जा सकता है। अच्छी नींद लेना भी इससे बचाव में मदद करता है। साल 2021 में जारी एक बड़ी रिसर्च के नतीजे बताते हैं कि 50 और 60 के दशक के लोग जो पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं, उनके जीवन में एक समय के बाद डिमेंशिया होने की संभावना अधिक होती है।

कुछ शोध से यह भी पता चलता है कि नृत्य भी मस्तिष्क में तंत्रिकाओं के नुकसान के लिए एक शक्तिशाली प्रतिरक्षी हो सकता है। न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में 75 से अधिक उम्र के 469 लोगों पर किए गए एक रिसर्च के नतीजे में पाया गया कि 'नाच ही एकमात्र शारीरिक गतिविधि थी जो डिमेंशिया के रिस्क को कम करने से जुड़ी थी।'

शोध के मुताबिक, मन और शरीर दोनों को सक्रिय करके, नाच दोतरफा लाभ देता है। स्मृति, समन्वय और अनुभूति के जरिए नाच मस्तिष्क को स्वस्थ रखता है तो वहीं इसके जरिए होने वाली शारीरिक गतिविधि हृदय रोग के जोखिम को भी कम कर सकती है। हालांकि, कुछ कारकों का विशेषाधिकार और अवसर से अधिक लेना-देना है, जैसे कि निम्न शिक्षा स्तर, मस्तिष्क की चोटें, हमला, वायु प्रदूषण और कुछ मामलों में मोटापा। ये जोखिम इतनी आसानी से कम नहीं किए जा सकते।

शुरुआती लक्षणों का पता लगाना और उपचार

अक्सर, जब तक मरीज़ अपने दैनिक जीवन पर एक न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी के प्रभाव को नोटिस करना शुरू करते हैं, मसलन स्मृति दोष और कंपकंपी जैसे लक्षणों का दिखना, तब तक काफी देर हो चुकी होती है क्योंकि इन लक्षणों के दिखने का मतलब होता है कि बीमारी कई साल से काम कर रही है। मस्तिष्क परिवर्तन वाले रोगों जैसे अल्जाइमर से जुड़े प्रोटीन का निर्माण रोग के लक्षण दिखने से 15 से 20 साल पहले ही शुरू हो जाते हैं।

बोकार्डी कहती हैं कि इसीलिए जल्दी पता लगाना इतना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उपचार में आसानी होती है। डिमेंशिया के शुरुआती चरण भूलने की बीमारी से शुरू होते हैं, व्यक्ति समय का क्रम भूलने लगता है और परिचित जगहों को याद नहीं रख पाता है। चिंता और अवसाद भी शुरुआती संकेत के रूप में काम कर सकते हैं, खासकर युवा रोगियों के लिए।

बहुत से लोग गंभीर बीमारी से पीड़ित हुए बिना इन चीजों का अनुभव कर सकते हैं। बोकार्डी सलाह देती हैं कि यदि आप खुद के बारे में कुछ इस तरह सोचना शुरू कर देते हैं कि 'ओह, यह वास्तव में मैं नहीं हूं', तो यह स्थिति काफी चिंताजनक हो जाती है।

वो कहती हैं कि यह स्थिति किसी पीड़ित व्यक्ति की अपने परिवार वालों के बारे में भी हो सकती है, 'यदि आप परिवार के सदस्यों के व्यवहार में ऐसे परिवर्तन देखते हैं कि वे खुद को नोटिस नहीं कर सकते हैं या छिप सकते हैं, तो ऐसी स्थिति में तत्काल डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।'

बोकार्डी कहती हैं कि जो कुछ भी आप करते हैं उसे अनदेखा ना करें। उनके मुताबिक, यदि किसी को तंत्रिका तंत्र की बीमारियों का इलाज हुआ हो तो उसे अकेलेपन का शिकार नहीं होना चाहिए और लक्षण दिखने पर तत्काल उपचार की कोशिश करनी चाहिए, अन्यथा इससे स्थिति और खराब हो सकती है।

वो कहती हैं, 'डिमेंशिया का डर और सामाजिक बदनामी लोगों को वह करने से रोकती है जो आपको वास्तव में करनी चाहिए। सामाजिक संपर्क बनाए रखें, सक्रिय रहें, जो कुछ भी आप कर सकते हैं वो करते हैं तो आप इससे बच सकते हैं।'



और भी पढ़ें :