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कविता : संजा के मीठे बोल

Updated: सोमवार, 27 सितम्बर 2021 (18:14 IST)
Sanja Festival Poem
 
गांवों में घरों की दीवारों पर 
ममता भरा आंचल का अहसास होता 
जब मंडती संजा 
 
दीवारें सज जाती पूरे गांव की 
और संजा बन जाती जैसे दुल्हन 
प्रकृति के प्रति स्नेह को 
दीवारों पर जब बांटती बेटियां
संजा के मीठे बोल भर जाते कानों में मिठास 
गांव भी गर्व से बोल उठता 
ये है हमारी बेटियां 
 
शहर की दीवारों पर 
टकटकी लगाएं देखती 
संजा के रंग और लोक गीत ऊंची अट्टालिकाओं 
में मेरी संजा मानों घूम सी गई है 
लोक संस्कृति की खुशियां क्यूं  
रूठ सी गई
 
लगता भ्रूण हत्याओं से मानों 
सुनी दीवारें भी रोने लगी है 
मेरी संजा मुझे न रुला बार-बार  
संजा मांडने का दृढ़ निश्चय 
लोक संस्कृति को अवश्य बचाएगा 
बेटियों को लोक गीत अवश्य सिखाएगा  
जब आएगी संजा घर मेरे
 
लेखक के बारे में
संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'

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