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मजेदार चटपटी कविता- मेले में मज़ा नहीं आया...

Updated: गुरुवार, 28 फ़रवरी 2019 (11:51 IST)
रौनक थी बड़ी; हमें कुछ नहीं भाया,
मेले में मज़ा नहीं आया।
 
चहल-पहल; धक्का-मुक्की; रेलमपेल,
ऊंचे-ऊंचे झूले, बच्चों की रेल,
मां के हाथों सा ना किसी ने झुलाया
मेले में मज़ा नहीं आया...
 
खाई आलू चाट; पी कोकाकोला,
ली ठंडी सोफ़्टी, चूसा बर्फ़ का गोला,
पहले जैसा स्वाद नहीं किसी में आया।
मेले में मज़ा नहीं आया...
 
महंगे-महंगे सामानों पे धावा बोला,
खूब की खरीददारी भरा अपना झोला,
खिलौनों का वो सुख मगर नहीं पाया।
मेले में मज़ा नहीं आया...

 
देखो ये बच्चे कैसे इठलाते हैं
मेले में आते ही खुश हो जाते हैं
हम चालीस पार हुए अब जाते हैं
दर्पण देख आज समझ ये आया
मेले में मज़ा 'क्यों' नहीं आया।
 
कवि-पं. हेमन्त रिछारिया
लेखक के बारे में
पं. हेमन्त रिछारिया
ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया ज्योतिष प्रभाकर उपाधि से सम्मानित हैं। विगत 12 वर्षों से ज्योतिष संबंधी अनुसंधान एवं ज्योतिष से जुड़ी गलत धारणाओं का खंडन कर वास्तविक ज्योतिष के प्रचार-प्रसार में योगदान दे रहे हैं। कई ज्योतिष आधारित पुस्तकों का लेखन।.... और पढ़ें

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