करवा चौथ पर व्रत के साथ पूरे वर्ष एक-दूसरे की मुस्कान बनाए रखने का संकल्प: कृष्णा गुरुजी
करवा चौथ जीवनसाथी के मंगल और दीर्घायु की कामना करने का पर्व है। लेकिन आज कई जगह इसकी आत्मीय भावना पर प्रदर्शन, महंगे उपहारों की अपेक्षा और दूसरों से तुलना हावी होती दिखती है। हमें इस पर्व को आत्म-चिंतन का अवसर बनाना चाहिए कि पिछले एक वर्ष में हमने अपने जीवनसाथी को कितना समझा, उसकी पसंद का कितना सम्मान किया और उसकी मुस्कान के लिए क्या किया? कलियुग पुराण के दृष्टिकोण से संदेश: जीवनसाथी की पसंद पर ध्यान दें; अपनी निजी आस्था को केवल प्रदर्शन और उपहार की आशा तक सीमित न रखें।
शास्त्रों में करक व्रत का उल्लेख
नारद पुराण के पूर्वभाग (अध्याय 113) में कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करक व्रत का वर्णन मिलता है। इसमें गणेश पूजन, करक अर्पण, दान तथा चंद्रोदय पर अर्घ्य देकर भोजन करने का उल्लेख है। धर्मसिंधु में भी करकचतुर्थी का संदर्भ मिलता है। इस धार्मिक परंपरा की मूल भावना को समझते हुए इसे आज के दांपत्य जीवन से जोड़ना आवश्यक है।
"मुझे क्या मिलेगा?" के बजाय सोचें- "मैं क्या दे सकता हूँ?"
करवा चौथ पति के मंगल के लिए रखा जाने वाला एक निजी व्रत है। इसे केवल इस उम्मीद तक सीमित न करें कि मुझे कौन-सा उपहार मिलेगा। उपहार प्रेम की एक सुंदर अभिव्यक्ति हो सकता है, लेकिन यदि वही प्रेम का एकमात्र प्रमाण बन जाए, तो व्रत का मूल भाव पीछे छूट जाता है। जीवनसाथी से मिलने वाली वस्तु के साथ-साथ उसके मन को भी महत्व दें। सजना-संवरना, उत्सव मनाना और तस्वीरें लेना अपनी जगह सही है, लेकिन दूसरों के उपहारों और आयोजनों से अपने संबंध की तुलना करना अनावश्यक निराशा पैदा कर सकता है। व्रत का मुख्य केंद्र जीवनसाथी के प्रति शुभ भावना और आत्मीयता ही होना चाहिए।
करवा चौथ: पूरे वर्ष के व्यवहार पर आत्म-चिंतन का दिन
एक दिन उपवास रखने के साथ-साथ पूरे वर्ष के अपने व्यवहार पर भी विचार करें। एक ही छत के नीचे रहते हुए हमने कितनी बार बिना टोके जीवनसाथी की बात सुनी? उसकी थकान को समझा? उसकी पसंद को प्राथमिकता दी? और कठिन समय में उसका साथ दिया? उन्होंने कहा, “अपने आप से पूछें- मेरे साथ रहने पर मेरा जीवनसाथी कितना सहज और प्रसन्न महसूस करता है? उसकी मुस्कान बनाए रखने के लिए मैंने क्या किया? जहाँ कमी रह गई हो, वहीं से अगले वर्ष का संकल्प शुरू करें। करवा चौथ का यह आत्म-चिंतन रिश्ते में नया अपनत्व ला सकता है।”
आज पति-पत्नी दोनों पर लागू होती है यह जिम्मेदारी
आज पति और पत्नी दोनों नौकरी, व्यवसाय और घर की जिम्मेदारियाँ संभाल रहे हैं। इसलिए देखभाल और समर्पण का दायित्व केवल पत्नी पर ही नहीं रह सकता। यदि पत्नी पति की दीर्घायु की कामना करती है, तो पति को भी पत्नी के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करनी चाहिए तथा व्यवहार में उसका साथ देना चाहिए। पति-पत्नी को मित्रों की तरह एक-दूसरे की जरूरतें समझनी चाहिए। खुशी बनाए रखने का प्रयास दोनों ओर से होना चाहिए। इसका अर्थ अपनी इच्छाएँ दबाना या हर बात मान लेना नहीं है, बल्कि सम्मानपूर्वक बात करना और मिलकर समाधान निकालना है।
पसंद का ध्यान रखें, जिम्मेदारियाँ बाँटें
यदि जीवनसाथी को माता-पिता के साथ समय बिताना पसंद है, तो दोनों परिवारों के बुजुर्गों के प्रति अपनापन रखें। यदि उसे साथ बैठकर भोजन करना, टहलना या दिनभर की बातें साझा करना प्रिय है, तो उसके लिए नियमित समय निकालें। घर के काम बाँटना, विश्राम का ध्यान रखना और सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे का सम्मान करना भी प्रेम के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
यदि भोजन का त्याग करते हैं, तो उसके साथ कटु वचन, उपेक्षा और अनावश्यक तुलना छोड़ने का भी संकल्प लें। यह संकल्प केवल करवा चौथ की शाम तक ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष निभाएँ। अपने जीवनसाथी से पूछें- मैं ऐसा क्या करूँ जिससे तुम्हारा जीवन अधिक सुखद हो सके? केवल प्रसन्नता को ही आयु बढ़ने की निश्चित गारंटी मानना उचित नहीं है, परंतु प्रेमपूर्ण वातावरण, देखभाल और परस्पर सहयोग से जीवन को बेहतर बनाना निश्चित रूप से संभव है। दीर्घायु की कामना के साथ-साथ जीवनसाथी के स्वास्थ्य और विश्राम पर ध्यान देना भी अत्यंत आवश्यक है।
कलियुग पुराण के दृष्टिकोण से करवा चौथ का संदेश है- व्रत श्रद्धा से रखें, जीवनसाथी की पसंद का ध्यान रखें और एक-दूसरे की मुस्कान बनाए रखने का संकल्प पूरे वर्ष निभाएँ। पर्व की सुंदरता आपके बाहरी प्रदर्शन से अधिक आपके आंतरिक व्यवहार में दिखनी चाहिए।

