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हनुमानजी त्रेता में हुए फिर क्यों कहा जाता है- चारों जुग परताप तुम्हारा

Written By WD Feature Desk
Updated: गुरुवार, 3 अप्रैल 2025 (14:57 IST)
तुलसीदास रचित हनुमान चालीसा की एक चौपाई में कहा गया है कि चारों जुग प्रताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।(29)। इस चौपाई का अर्थ है- आपका प्रताप चारों युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग) में फैला हुआ है, सम्पूर्ण संसार में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान हैं।.... सवाल यह उठता है कि क्या हनुमानजी का जन्म त्रेतायुग में हुआ था, यदि नहीं तो फिर तुलसीदासजी ने ऐसा क्यों लिखा? उनकी सतयुग में तो उपस्थिति नहीं थी।
 
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई॥
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥
 
1. सतयुग-1: पौराणिक मान्यता अनुसार सतयुग में हनुमानजी, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है, रुद्र रूप में विद्यमान थे और उन्होंने सृष्टि के कल्याण के लिए रुद्र रूप धारण किया था। कहते हैं कि एक बार धरती से जल तत्व सूखकर गायब हो गया तो सभी देवी और देवाता भगवान शिव के पास गए और कहने लगे की धरती पर जल पुन: कैसे आएगा तो शिवजी ने 11 रुद्रों को बुलाया और उनसे पूछा कि आपमें से कोई ऐसा है जो संसार को पुन: जल तत्व प्रदान कर सके। 10 रुद्रों ने इस कार्य को करने से मना कर दिया परंतु हर नाम के 11वें रुद्र ने कहा कि मेरे करतल में जल तत्व का पूर्ण निवास है। मैं संसार को पुन: जल तत्व प्रदान कर सकता हूं, परंतु इसके लिए मुझे अपना शरीर गलाना होगा। तब शिवजी ने उसे वरदान दिया कि तुम्हारा शरीर गलने के बाद तुम्हें नया शरीर और नया नाम मिलेगा। मैं संपूर्ण रूप से तुम्हारे शरीर में निवास करूंगा जो सृष्‍टि के कल्याण के लिए होगा। हर नामक रुद्र ने अपना शरीर गलाकर संसार को जल से भर दिया और उसी जल से महाबली वानर का जन्म हुआ जिसे बजरंगबली कहा गया। यह घटना सतयुग के अंतिम और चौथे चरण की है। कहते हैं कि सतयुग के चौथे चरण में युग संधिकाल में हनुमानजी का जन्म हुआ था। शिवजी ने ही हनुमानजी को राम नाम जपने की सलाह दी थी।ALSO READ: जय श्री हनुमान चालीसा | Shree Hanuman Chalisa Hindi
 
2. त्रेतायुग में हनुमान: त्रेतायुग में तो पवनपुत्र हनुमान ने केसरीनंदन के रूप में जन्म लिया और वे राम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे। वाल्मीकि 'रामायण' में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का उल्लेख मिलता है।
 
3. द्वापर में हनुमान: द्वापर युग में हनुमानजी भीम की परीक्षा लेते हैं। इसका बड़ा ही सुंदर प्रसंग है। महाभारत में प्रसंग है कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ नहीं हटा पाते हैं। इस तरह एक बार हनुमानजी के माध्यम से श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र और गरूड़ की शक्ति के अभिमान का मान-मर्दन करते हैं। हनुमानजी अर्जुन का अभिमान भी तोड़ देते हैं। अर्जुन को अपने धनुर्धर होना का अभिमान था।
 
4. कलयुग में हनुमान: यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से हनुमानजी का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगेगी। कलियुग में हनुमानजी ने अपने भ‍क्तों को उनके होने का आभास कराया है। ये वचन हनुमानजी ने ही तुलसीदासजी से कहे थे- 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।' कलियुग में हनुमानजी गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं।ALSO READ: Hanuman ji: क्या हनुमान जी प्रकट होने वाले हैं?
 
5. सतयुग-2: हनुमानजी इस कलयुग या कल्प के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। हनुमानजी को धर्म की रक्षा के लिए अमरता का वरदान मिला था। इस वरदान के कारण आज भी हनुमानजी जीवित हैं और वे भगवान के भक्तों तथा धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे। इसके बाद सतयुग का प्रारंभ होगा और तब हनुमानजी सतयुग में भी रहेंगे।

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