क्या श्रीलंकाई जहाज अग्निकांड से बचा जा सकता था? इस पर्यावरणीय आपदा से क्या मिला सबक

Last Updated: शुक्रवार, 9 जुलाई 2021 (19:30 IST)
जीलॉन्ग (ऑस्ट्रेलिया)। के निकट एक नवनिर्मित में लगने की घटना के लगभग 2 महीने बीतने के बावजूद श्रीलंका में समुद्र तट पर सैकड़ों मृत कछुओं का बहकर आना अब भी जारी है।जहाज 'एक्स-प्रेस पर्ल' में 1486 कंटेनर थे और यह 2 हफ्तों तक जलता रहा था। इसके बाद जून की शुरुआत में यह डूब गया और श्रीलंका की सबसे बड़ी पर्यावरणीय आपदाओं में से एक का सबब बना।
रसायनों ने पानी को प्रदूषित कर दिया, समुद्री जीव मारे गए और उनका प्रजनन क्षेत्र बर्बाद हो गया। समुद्र में पहुंचे दूषित पदार्थों में नाइट्रिक अम्ल, सोडियम डाईऑक्साइड, तांबा और सीसा तथा प्लास्टिक की कई टन छोटी गोलियां हैं जिन्हें गलने में सदियां लग सकती हैं।

अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से मछली मारने पर निर्भर स्थानीय मछुआरों को मछली न पकड़ने के आदेश दिए गए हैं। अब पर्यावरण में बड़े पैमाने पर तेल रिसाव का खतरा मंडरा रहा है जिसे अंतरराष्ट्रीय सहायता से अधिकारी रोकने की कोशिश में लगे हैं।

स्थानीय पुलिस ने आपराधिक जांच शुरू की है। इस बीच सेंटर फॉर एनवॉयरमेंटल जस्टिस ने श्रीलंकाई सुप्रीम कोर्ट में मौलिक अधिकार याचिका दायर की है। आपदा के मद्देनजर कई लोगों ने यह बताने की कोशिश की कि आखिर गलती हुई कहां?

लेकिन इनमें एक व्यापक लेकिन अहम मुद्दों को काफी हद तक छोड़ दिया गया जिसे इस आपदा ने उजागर किया है : आर्थिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच तनाव। यह नौवहन को कभी-कभी अति-मुक्त व्यापार के दायरे से दूर और कभी-कभी नियमों से अछूता बना देता है।

मैं यह पता लगाने में मदद करूंगा कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर क्या गलती हुई और हम भविष्य में ऐसे हादसों को कैसे रोक सकते हैं।जब मालवाहक जहाज में आग लगती है। यह माना जाता है कि जहाज पर नाइट्रिक अम्ल रखे जाने की समुचित जानकारी तो दी गई थी लेकिन इसे अनुचित तरीके से पैक किए जाने या गलत तरीके से रखे जाने के कारण हुआ रिसाव एक्स-प्रेस पर्ल में आग लगने की वजह बना। नाइट्रिक अम्ल संक्षारक, विषाक्त और ज्वलनशील तरल है, और जहाज पर यह 25 टन था।

नाइट्रिक अम्ल दरअसल अमोनियम नाइट्रेट का एक अहम तत्व है। अमोनियम नाइट्रेट दुनियाभर में इस्तेमाल की जाने वाली लोकप्रिय खाद होने के साथ ही विस्फोटकों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल है।
जहाज पर लगने वाली आग चालक दल के सदस्यों की जिंदगी और पर्यावरण के लिए स्पष्ट जोखिम है। इसके बावजूद मालवाहक जहाजों पर अक्सर आग लग जाती है।

आग लगने के स्रोत बदल रहे हैं : कभी इंजनों से आग लगती थी लेकिन अब जहाज में रखे माल से ही आग लगने की संभावना बनी रहती है। चारकोल के बाद आग लगने की दूसरी सबसे बड़ी वजह इन माल को गलत तरीके से पैक किया जाना या उनमें रसायन होने को लेकर उचित घोषणा नहीं किया जाना।

वास्तव में, आंकड़े आग लगाने में सक्षम अघोषित या गलत रूप में घोषित खतरनाक सामान के 1,50,000 से अधिक वार्षिक मामलों की संभावना का संकेत देते हैं। नौवहन मार्ग के आधार पर मामले ज्यादा भी हो सकते हैं।

आग लगने के जोखिम की एक और वजह नौवहन कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा है जो मालवहन क्षमता और दक्षता पर आधारित है। इसकी वजह से मालवाहक जहाजों के आकार में काफी बढ़ोतरी देखी गई है जिससे आग लगने की आशंका में भी इजाफा हुआ है। जहाज के बड़े आकार से आग लगने की जगह का तत्काल पता लगा पाना भी मुश्किल हो जाता है जब तक कि वह काफी फैल न गई हो।

बेहतर प्रशिक्षण और तौर तरीकों को अपनाकर जहाजों पर अग्नि सुरक्षा उपायों में सुधार किया जा सकता है। एसओएलएएस (सेफ्टी ऑफ लाइफ एट सी) नियमों से जहाज पर अग्निशमन उपायों का संचालन होता है। लेकिन ये अब पुराने हो चुके हैं और 1980 में अमल में आए इन नियमों में संशोधन की आवश्यकता है जो एक्स-प्रेस पर्ल जैसे अति विशाल जहाजों के मौजूदा दौर के अनुरूप हों।

2 बंदरगाहों की कहानी : एक्स-प्रेस पर्ल जहाज में रखे नाइट्रिक अम्ल में रिसाव का पता कतर में हमाद बंदरगाह पर चला, लेकिन उसने कंटेनर को उतारने के जहाज के अनुरोध को खारिज कर दिया। जहाज ने बाद में यही अनुरोध गुजरात में हजिरा बंदरगाह से भी किया लेकिन वहां भी कंटेनर को उतारने की इजाजत नहीं मिली।

दोनों में से किसी भी बंदरगाह ने अगर कंटेनर को उतारने की इजाजत दे दी होती तो समुद्र में इस आपदा से बचा जा सकता था। उन्होंने इनकार क्यों किया? और ऐसी परिस्थितियों में उनकी क्या प्रतिबद्धताएं थीं? आधिकारिक जांच में उनके कृत्यों पर गौर किए जाने की संभावना नहीं है, जो मुख्य रूप से आग लगने के कारण और चालक दल द्वारा उठाए गए कदमों पर केंद्रित होगी। हालांकि ये जवाब नौवहन संचालन की बेहद मुश्किलभरी परिस्थितियों का खुलासा करते हैं।

दोनों ही बंदरगाहों ने दावा किया कि उनके पास रिसाव वाले कंटेनर को उतारने के लिए जरूरी मानवशक्ति और उपकरण नहीं थे। हालांकि यह कल्पना करना मुश्किल है कि दोनों बंदरगाहों की कॉर्पोरेट वेबसाइटों के मुताबिक, हाल में बने, अत्याधुनिक और अच्छी तरह से संसाधन सुविधा वाले इन केंद्रों के पास नाइट्रिक अम्ल के रिसाव से निपटने के लिए साधन नहीं होंगे।
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बंदरगाह खतरनाक सामग्री वाले पोत को ठहराने से इस वजह से संकोच कर सकते हैं कि उनके पास आपात और आपदाकालीन योजना और तैयारी न हो। खतरे और पर्यावरण नीतियों को अपनाना एक बात है, लेकिन इन्हें वास्तव में क्रियान्वित करना बिल्कुल अलग चीज है।
ऐसा करने के लिए संभावित खतरे के मद्देनजर प्रशिक्षण देने और आवश्यक उपकरण व संसाधन रखने की आवश्यकता होगी। बंदरगाहों के बीच प्रतिस्पर्धा ने भी इस चुनौती को बढ़ा दिया है। बंदरगाह अपने यहां से ज्यादा से ज्यादा जहाजों की आवाजाही का लक्ष्य रखते हैं ऐसे में कंटेनरों की सामग्री का भौतिक परीक्षण संभव नहीं।

इस मुद्दे से निपटने के 3 तरीके हैं :अंतरराष्ट्रीय समुद्री खतरनाक सामानों के विनियमों का सख्त प्रवर्तन, जो उनके संचालन व भंडारण को नियंत्रित करते हैं। इन नियमों को लागू करने वाले आपूर्ति श्रृंखला कर्मियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण। जिन देशों से मालवाहक जहाज चल रहे हैं और नौवहन कंपनियों द्वारा सख्त प्रतिबंध जारी करना।

क्या चालक दल के सदस्य शरण मांग सकते थे? एक्स-प्रेस पर्ल हादसे की जांच से यह खुलासा होगा कि कोलंबो बंदरगाह पर जब पोत आग की लपटों में घिरा था तब क्या चालक दल के सदस्यों ने प्राथमिकता के आधार पर जगह दिए जाने की मांग की थी। आमतौर पर संकटग्रस्त जहाजों को प्राथमिकता दी जाती है लेकिन राष्ट्र उस स्थिति में जहाज को प्रवेश की इजाजत से इनकार कर सकते हैं अगर उनसे पर्यावरण या लोगों की सुरक्षा को गंभीर खतरा होने का अंदेशा है।

पोतों के बड़े आकार और उनमें रखे माल की वजह से होने वाले खतरे की अनिश्चित प्रकृति के मद्देनजर प्रवेश की इजाजत देने से इनकार करना सामान्य नियम है। यह महत्वपूर्ण है कि हम एक्स-प्रेस पर्ल को समुद्र में एक जहाज में आग लगने के एक और हादसे की तरह मानकर भूल न जाएं। इस घटना को बदलाव का वाहक बनना चाहिए।(द कंवरसेशन)
सांकेतिक फोटो



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